शाम होते ही सजती है डॉक्टरों की मंडी

ठेले पर क्लीनिक, चार मरीज और सिर्फ एक टेढ़ी सुई

स्टोरी-प्रशांत पंत/भास्कर त्रिपाठी; फोटो-ईशान कुमार


शाहपुर (लखनऊ)। नीले रंग का फ्रॉक पहने एक बच्ची तेज बुखार की वजह से बेसुध पड़ी थी। डॉक्टर का इंतजार करते हुए बच्ची की 9 साल की बड़ी बहन ने उसके माथे पर सफेद रंग का गीला कपड़ा रखा हुआ था। कुछ ही देर में डॉक्टर साहब वहां आए और बुखार से तप रही बच्ची को इंजेक्शन लगा दिया।


यह नज़ारा किसी हॉस्पिटल का नहीं है। बच्ची भी किसी बिस्तर या स्ट्रेचर पर नहीं बल्कि एक लकड़ी की तिपहिया ठेलिया पर लेटी थी। जिसपर अपना सामान लादकर डॉक्टर साहब बाजार के दिन अपनी दुकान लगाने आते हैं।


लखनऊ के दक्षिण में महज 25 किमी की दूरी पर एक गॉँव है शाहपुर। जिसके चौराहे पर हर बृहस्पतिवार और रविवार की शाम को लगने वाली बाजार में सब्जी और कपड़ों के साथ ही, डॉक्टरों की भी मंडी लगती है।


बाजार के दिन यहां चार-पांच लोग अपनी छोटी-सी मेज पर सस्ती दवाईयों की कुछ बोतलें और पैकेटें सजा कर बैठते हैं और लोगों का इलाज करते हैं। अपने-आप को डॉक्टर कहने वाले इन लोगों में से कुछ तो अगल-बगल गॉँव के ही हैं। इन्होंने ना तो कोई डिग्री ली है और न ही ट्रेनिंग। फिर भी गॉँव वाले अपनी बीमारी लिए इन्हीं के पास आते हैं। कारण पूछने पर शाहपुर निवासी, 38 साल के पवन कुमार कहते हैं, च्च्सरकारी अस्पताल यहां से 10 किमी दूर है और वो भी वहां कोई मिलता नहीं। अब हमको बिटिया के बुखार की दवाई लेनी है। इनसे न लें तो कहां जाएं।ज्ज् पवन ने जिस अस्पताल का जिक्र किया, वो शाहपुर से 10 किमी की दूरी पर स्थित इटौंजा कस्बे में है।


दरअसल सरकारी मानकों के अनुसार दो प्राथमिक केन्द्रों के बीच की दूरी 10 किमी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। जिसे मानते हुए प्रशासन ने शाहपुर के 10 किमी के दायरे में आने वाले क्षेत्र, जैसे कुम्हरावां, महोना और गोधना में स्वास्थ्य केंद्र बनवाए हैं। पर संसाधनों की कमी के चलते ये अस्पताल ज्यादातर बंद ही रहते हैं।


राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना (एनआरएचएम) की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में 5823 स्वास्थ्य उप-केन्द्रों और 700 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की कमी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रदेश के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के लिए सोलह सौ से ज्यादा डॉक्टरों की कमी है। अस्पतालों में नर्सों और टेक्नीशियनों की बहाली करने की भी जरूरत है।


इस बारे में जब गॉँव कनेक्शन संवाददाता ने लखनऊ के सीएमओ डॉ. एसएनएस यादव से फोन पर बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा, च्च्भाई अब ऐसे तो हम नहीं बता पाएंगे, आप हमें और डीएम को लेटर लिखकर दीजिए तब देखेंगे इस मामले में।ज्ज्


बाजार में बैठने वाले डॉक्टरों में से एक हैं श्रीराम। जिस गॉँव की बाजार में अपनी डॉक्टर की दुकान लगाते हैं, वहां के पूर्व प्रधान भी रह चुके हैं। इस नाते सब इन्हें दद्दू बुलाते हैं।


बाजार के कोने में बड़े से पेड़ के नीचे, सफेद रंग की प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठे श्रीराम को लोगों ने चारों तरफ से घेरा हुआ है। उनके आगे दवाईयों की मेज पर एक टेढ़ी सूई वाला इंजेक्शन रखा हुआ है जो पिछले आधे घंटे में चार लोगों की मर्ज का इलाज कर चुका है।


उसी भीड़ में से लाल साड़ी पहने हुई, फू लमती (29) नाम की महिला अपना हाथ दिखाते हुए श्रीराम से पूछती हैं, च्च्दद्दू मेरी उंगली दर्द करती है?ज्ज् फुट भर की दूरी से ही देखकर श्रीराम जोर से बोले, च्च्पांच इंजेक्शन लगेंगे, और कोई दवा नहीं है इसकी। बताओ?ज्ज् थोड़ा झिझकते हुए फू लमती फि र पूछती हैं, च्च्कौन सी बीमारी है यह?ज्ज् श्रीराम बोले, च्च्खून का दौडऩा कम है। इलाज नहीं हुआ तो कहो पहले हाथ में जकडऩ हो, फि र पूरे शरीर में।ज्ज्


श्रीराम की ही तरह बाजार में एक और डॉक्टर हैं प्रेम चन्द्र। इनके गले में आला है और आंखें ग्राहक तलाश रही हैं। तभी एक महिला अपने पति के साथ आती हैं। महिला की उम्र ज्यादा नहीं है, लेकिन कमजोरी और बीमारी की वजह से उसके गले से आवाज मुश्किल से ही निकल पा रही थी। इसीलिए बगल में बैठा महिला का पति बीमारी के बारे में बताता है। जांच-पड़ताल के बाद डॉक्टर साहब कहते हैं, च्च्इन्हें तो टॉयफायड है।ज्ज् फि र उन्हें बिना किसी नाम-नम्बर की एक पर्ची, दवाईयां लिखकर थमा दी जाती है। बदले में अच्छी-खासी फीस ऐंठ ली जाती है। कमोबेश यही हाल बाजार में बैठे बाकी के झोलाछाप डॉक्टरों की मेजों पर भी था।


अशिक्षा और स्वास्थ्य केन्द्र जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में गॉँव वालों के पास इन फर्जी डॉक्टरों के पास जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता, जिसका ये लोग भरपूर फायदा उठाते हैं।


अपनी सफाई में श्रीराम कहते हैं, च्च्हम कोई हार्ड ऐन्टिबायोटिक नहीं रखते हैं। हमारे यहां मरीज सही भले ही न हो पर उसको रिएक्शन नहीं होता। और कोई सीरियस केस होता है तो उसको शहर रेफर कर देते हैं।ज्ज् डॉक्टरी की मान्यता के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं, च्च्साल तो याद नहीं पर वही कुछ 2008 या 2009 में स्वरोजगार योजना के अन्र्तगत, स्वास्थ्य कार्यकर्ता की टे्रनिंग ली थी।ज्ज्


जिन साहब को अपने ट्रेनिंग का साल तक नहीं याद उनके हाथ में मरीजों की पूरी जिंदगी है। अपनी पैरवी करते हुए आखिर में श्रीराम कहते हैं, च्च्सही कौन है आजकल यहां से लेकर बख्शी का तालाब तक सब हमारी तरह चोर ही मिलेंगे आपको।ज्ज्