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महफ़िल

“लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने कहा, तुम अभी मत गाओ, तुम्हारी आवाज़ मेच्योर नहीं”

हिंदी फिल्मों में अपनी आवाज़ से जगह बनाने वाली अलका याज्ञनिक की आज सालगिरह है। 20 मार्च 1966 को कोलकाता में जन्मी अलका के स्वर पिछले तीन दशकों से हिंदी फिल्मों में गूंज रहे हैं। ये सफर कई मुश्किलों और परेशानियों से भरा हुआ है। अलका में गायकी की कला बचपन से ही थी, जिसे पहचान कर महज़ 6 साल की उम्र में उनकी मां शुभा याज्ञनिक उन्हें लेकर मुंबई आ गईं। ये वो दौर था जब फिल्मों में राजकपूर का सिक्का चलता था। लंबी कोशिशों के बाद शुभा राजकपूर से मिलने में कामयाब हो पाईं। राजकपूर ने उस 6 साल की बच्ची की आवाज़ सुनी तो वो हैरान रह गए, उस आवाज़ की खनक और खूबसूरती उन्हें बहुत पसंद आई, उन्होंने शुभा याज्ञनिक को सलाह दी को वो उस वक्त संगीत के सबसे बड़े नाम लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से मिलें। शुभा याज्ञनिक अपनी बेटी अलका को लेकर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के स्टूडियो पहुंचीं। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने जब अलका की आवाज़ सुनी तो कहा कि ये आवाज़ बहुत दूर तक जाएगी, लेकिन उनका ये भी मानना था कि क्योंकि अभी अलका की उम्र कम है इसलिए फिलहाल उनकी आवाज़ को किसी अभिनेत्री के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

अलका के करियर की शुरुआत साल 1979 में हुई जब उन्हें 'पायल की झंकार' में एक गाने की कुछ लाइंस गाने को मिली। इस छोटी से मौके से ही अलका ने साबित कर दिया कि वो उस वक्त की गायिकाओं की कतार में खड़े होने की प्रतिभा रखती हैं। तकरीबन दो साल बाद, 1981 में उन्हें अमिताभ बच्चन की फिल्म 'लावारिस' में 'मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है' गाने का मौका मिला, और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा

ये गाना जमकर हिट हुआ, लोग अलका को पहचानने लगे, लेकिन इस कामयाबी के बावजूद संगातकारों ने उन्हें संजीदगी से नहीं लिया, इस के बावजूद उन्हें काम की कमी रही। साल 1988 में उन्होंने फिल्म 'तेज़ाब' में "एक दो तीन" गाना गाया और वो भी ज़बरदस्त हिट रहा। अलका याज्ञनिक को बड़ी कामयाबी मिली साल 1989 में जब उन्हें आमिर खान की 'कयामत से कयामत तक' में गाने गाने का मौका मिला। इस फिल्म में उन्होंने 'ऐ मेरे हमसफर', 'अकेले हैं तो क्या गम है' और 'गज़ब का है दिन सोचो ज़रा' गया। फिल्म के संगीत को बहुत ज़्यादा सराहा गया और इस फिल्म के गीत आज तक लोगों की ज़ुबान पर हैं। इस फिल्म ने अलका की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।

अल्का के पास अब काम की कोई कमी नहीं थी, उन्हें लगातार काम मिल रहा था। एक के बाद एक गाने गाते हुए वो उस सपने के करीब पहुंच रही थी जिसे साथ लेकर वो कोलकाता से अपनी मां के साथ आई थी। लेकिन साल 1993 में अलका को एक गाने के लिए बहुत विरोध झेलना पड़ा। उस साल आई 'खलनायक' के एक गीत 'चोली के पीछे क्या है' को लेकर बहुत बवाल हो गया, इसे अश्लील और फूहड़ कहा गया। 42 राजनीतिक पार्टियां इस एक गाने के विरोध में एक साथ खड़ी हो गईं और इसे बैन करवाने की कोशिश करने लगीं। ये विरोध लंबे दौर तक चला लेकिन उसके बाद खुद बा खुद शांत हो गया, क्योंकि गीत आम जनता ने खूब पसंद किया था।

इस कड़ी में साल 1994 फिर से उनके लिए बेहद लकी साबित हुआ। 'कुछ कुछ होता है' बहुत बड़ी हिट साबित हुई। इसके लिए अलका को फिल्मफेयर से नवाज़ा गया। अब अलका की आवाज़ का सिक्का पूरे बॉलीवुड में चलने लगा था। साल 1999 में उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाज़ा गया।

अलका याज्ञनिक को उनकी सालगिरह के मौके पर गांव कनेक्शन की तरफ से बहुत मुबारकबाद