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फैशन नहीं, यहां गुलामी की जंजीरे तोड़ने के लिए गुदवाते हैं पूरे शरीर मेें टैटू 

स्वयं डेस्क

सोनभद्र। आदिवासियों का नाम आते ही जेहन में अर्द्ध नग्न पुरुष और महिलाएं, उनके हाथ में तीर कमान, सिर में पंख, चेहरे और शरीर पर अजीबो-गरीब टैटू व गले में अजीब तरह की माला के साथ की एक तस्वीर उभर आती है। आदिवासियों का टैटू गुदवाना शहरी फैशन की टैटू की तरह नहीं होता बल्कि मान्यताओं और गुलामी की जंजीरे तोड़ने की लिए वह इसे गुदवाते हैं।

सोनभद्र के आठ ब्लॉक में गोंड़, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुईया, भुनिया, सहरिया जैसे आदिवासी समुदाय निवास करते हैं। हर समुदाय के लोगों के शरीर पर अलग-अलग टैटू बने होते हैं।

यहां पूरे शरीर में टैटू बनवाने के पीछे है एक खास वजह

करीब 100 साल पहले उच्च जाति के लोगों द्वारा पिछड़ी जाति के हिन्दुओं पर हो रहे शोषण के विरोध में रामनामी संप्रदाय का गठन हुआ। पिछड़ी जाति के हिन्दुओं का मंदिरों में प्रवेश बंद कर दिया गया था, उन्हें अलग कुएं से पानी निकालना पड़ता था और ऐसी ही कई यातनाएं उन्हें झेलनी पड़ती थीं। इसके विरोध में इस जाति ने अपने पूरे शरीर पर राम के नाम का टैटू गुदवाना शुरू कर दिया। एक नया समाज ‘रामनामी समाज’ बना लिया।

सहरिया आदिवासी युवावस्था में गुदवाते हैं टैटू

दुद्धी ब्लॉक के सहरिया आदिवासी जनजाति के औरास सहरिया (62 वर्ष) शरीर पर गोदने की परंपरा को पिछले 50 बसंत से ज्यादा समय से निभा रहे हैं। अपने शरीर पर बने धुंधले हो चुके टैटू को दिखाते हुए औरास सहरिया बताते हैं, ‘मुझे कुछ खास ध्यान नहीं है कि कब मेरे शरीर में गोदना (टैटू) गुदाया गया था। हमारे पूर्वजों से ये प्रथा चली आ रही है। जब बच्चा युवावस्था में आता है तब उसकी पीठ पर गोदना गुदवाया जाता है अगर वह गोदना को सह लेता है तो वह लड़का मर्द बन जाता है। अपने गोदने से ही वह स्त्रियों को आकर्षित करता है।’

बैगा जनजाति में गोदना होता है स्त्रियों का श्रृंगार

बैगा जनजाति की आठ वर्ष की लड़कियों के शरीर में गोदना बनवाना शुरू होता है और शादी के बाद भी वे गोदना बनवाती रहती हैं। झुर्रियों से भरे चेहरे को चीरकर एक लंबी मुस्कान देती हुई बैगा जनजाति की महिला कुशुमा देवी (58 वर्ष) बताती हैं, ‘गोदना हमारी जनजाति की स्त्रियों का श्रृंगार होता है। हम गोदना गुदवाने को अपना धर्म मानते हैं। हमारे समाज में गोदना वाली स्त्रियों का समाज में मान बढ़ता है। शुरुआत में गोदना माथे (कपाल) पर फिर धीरे-धीरे शरीर के बाकी हिस्सों में गुदवाया जाता है।’

कुशुमा आगे बताती है कि गोदना बरसात के मौसम को छोड़कर बाकी किसी भी मौसम में गुदवा सकते हैं।

गोदना है एक्यूपंचर की तरह

गोंड जनजाति के बुजुर्ग राम अवतार (68 वर्ष) बताते हैं, ‘ऐसी मान्यता है कि जो बच्चा चल नहीं सकता, चलने में कमजोर है, उस के जांघ के आसपास गोदने से वह न सिर्फ चलने लगेगा बल्कि दौड़ना भी शुरू कर देगा।’ कुछ विद्वानों की राय में गोदना के जरिए शिराओं में प्रवाहित की जाने वाली दवाएं आजीवन भर शरीर को गंभीर बीमारियों से दूर रखती है। इस तरह से गोदना जापानी परंपरा के एक्यूपंचर की तरह है।

आमतौर पर आदिवासियों को भारत में जनजातीय लोगों के रूप में जाना जाता है। आदिवासी मुख्य रूप से भारतीय राज्यों उड़ीसा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल में निवास करती है। भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में संथाल, गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, बोडो, भील, खासी, सहरिया, गरासिया, मीणा, उरांव, बिरहोर वगैरह हैं।

अलग-अलग मान्यताएं

भील जनजाति के मुखिया प्रहलाद भील (54 वर्ष) बताते हैं, ‘हमारे कबीले में यह मान्यता है कि गोदने के कारण शरीर बीमारियों से बच जाता है। कबीले वाले स्वस्थ रहते हैं।’ मध्यप्रदेश में बैगा जनजातियों का मानना है कि गोदना या आधुनिक समाज का फैशन टैटू शरीर नहीं आत्मा का श्रृंगार है। छत्तीसगढ़ में यह माना जाता है कि गोदना गुदवाए बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। भीलों की मान्यता है कि शरीर को इससे कई बीमारियों से मुक्ति मिल जाती है।

विश्व में इस कला के असली प्रमाण ईसा से 1300 साल पहले मिस्र में, 300 वर्ष ईसा पूर्व साइबेरिया के कब्रिस्तान में मिले हैं। ऐडमिरैस्टी द्वीप में रहने वालों, फिजी निवासियों, भारत के गोंड और टोडो, ल्यू क्यू द्वीप के बाशिन्दों और अन्य कई जातियों में रंगीन गोदना गुदवाने की प्रथा केवल स्त्रियों तक सीमित है। ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों में विवाह से पहले लड़कियों की पीठ पर क्षतचिन्हों का होना अनिवार्य है।

इस तरह बनाई जाती है स्याही

गोदना एक विशेष प्रकार की स्याही से शरीर में गोदा जाता है। इस स्याही को बनाने के लिए पहले काले तिलों को अच्छी तरह भुना जाता है और फिर उसे लौंदा बनाकर जलाया जाता है। जलने के बाद प्राप्त स्याही जमा कर ली जाती है और इस स्याही से बदनिन (एक विशेष प्रकार की सूई) से जिस्मों पर मनचाही आकृति, नाम और चिन्ह गोदी जाती है। इसमें भिलवां रस, मालवनवृक्ष या रमतिला के काजल को तेल के घोल में फेंटकर उस लेप का भी इस्तेमाल किया जाता है।

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