'अकाल की ओर बढ़ रहा है बुंदेलखंड'

अकाल की ओर बढ़ रहा है बुंदेलखंडgaonconnection, बुंदेलखंड का सूखा अकाल का रूप ले रहा है: रिपोर्ट

लखनऊ। एक नए सर्वे के मुताबिक उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैले बुंदेलखण्ड क्षेत्र में सूखे की स्थिति विकट होकर "अकाल" का रूप लेती जा रही है। पीने के पानी की स्थिति सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। सर्वे के अनुसार एमपी में आने वाले क्षेत्र में तो पानी की स्थिति खतरे के निशान को भी पार कर चुकी है। पशु मर रहे हैं।

सर्वे के अनुसार मध्य प्रदेश के सर्वे में शामिल जिलों- टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना और दतिया के तकरीबन 40% गाँवों में चालू हैंडपम्पों की संख्या घटकर एक या दो रह गयी है। उत्तर प्रदेश की स्थिति इस मामले में बेहतर है, वहाँ 55% गाँव 10 से ज्यादा चालू हैंडपम्पों की सीमा रेखा के ऊपर हैं। लेकिन यूपी में भी 14% गाँव ऐसे हैं जहाँ दो या उससे भी कम हैंडपम्प चालू स्थिति में हैं। हैंडपम्प महत्वपूर्ण सूचक हैं क्योंकि इनसे पूरे बुंदेलखंड के तीन चौथाई गाँवों के लिए मुख्य जलस्रोत हैं।

ये परिणाम बुंदेलखंड क्षेत्र के यूपी के सभी सातों जिलों और एमपी-बुंदेलखंड के छह में से चार जिलों में 'स्वराज अभियान' मुहिम के तहत किए गए सर्वे में इकट्ठा किए गए हैं। सर्वे में रेंडम चुने गए यूपी के 109 गाँवों और एमपी के 63 गाँवों का शामिल किया गया था।

सोमवार को जारी किए गए सर्वे की विज्ञप्ति के अनुसार, "सूखे के कारण समाज का निचला तबका भूख और ग़रीबी की कगार पर हैं। पशुचारा की कमी और जल संकट के कारण पशुओं के मौत की संख्या में भारी इज़ाफे की रिपोर्ट सामने आई है। ऐसे समय में लोग सरकार की ओर देखते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि दोनों राज्य सरकारों ने इस नाजुक मौके पर आँखें मूँद ली हैं"।

सर्वे रिपोर्ट के अनुसार जब पीने के पानी की स्थिति में सुधार के लिए दोनों ही राज्यों की सरकारों ने पुख्ता कदम नहीं उठाए। पिछले तीन महीनों में यूपी के 72% गाँवों और एमपी के 74% गाँवों में सरकार द्वारा कोई काम न होने की बात लोगों ने कही।

"उत्तर प्रदेश की सरकार ने कुछ विशेष घोषणाएँ इस क्षेत्र के लिए की हैं। मध्य प्रदेश की सरकार ने इस औपचारिकता को भी नहीं दिखाया। हालाँकि इन औपचारिक घोषणाओं का ज़मीनी स्तर पर कोई प्रभाव नहीं है", सर्वे विज्ञप्ति में कहा गया। 

इस सर्वे में यह भी कहा गया कि सूखा राहत के रूप में मनरेगा का पर्याप्त रूप से उपयोग नहीं हो रहा है। यूपी के प्रभावित जिलों के 29% गांवों में मनरेगा के तहत काम चल रहा है। तुलनात्मक रूप से एमपी का यही आँकड़ा 5% तक नीचे है। इस आँकड़े की पुष्टि मनरेगा के वेबसाइट से भी होती है जिसमें अप्रैल के महीने में दोनों राज्यों की स्थिति में भारी अंतर है।

सर्वे रिपोर्ट में कहा गया कि मध्य प्रदेश की सरकार ने इस क्षेत्र के लिए अभी तक कोई विशेष घोषणा या व्यवस्था नहीं की है। एमपी सिर्फ़ फ़सल नुकसान के मुआवज़ा देने में यूपी से बेहतर स्थिति में है। लगभग 30% गाँवों में किसानों को मुआवज़ा मिला है जो कि यूपी में महज़ छह फीसदी है।

नहीं मिल पा रहा दो समय का भोजन

सर्वे रिपोर्ट के अनुसार सूखे के कारण भूख और कुपोषण का ख़तरा रहता है। यूपी के बुन्देलखंड के 59% गाँवों में 10 से ज्यादा परिवारों को दो समय का भोजन भी नहीं मिलने की रिपोर्ट है। यही आँकड़ा एमपी में 35% गाँवों का है।

बढ़ रही पशुओं की मौत

पिछले हफ़्ते से यूपी के 56% गाँवों और एमपी के 44% गाँवों में पशु चारा और पीने के पानी की भारी कमी है। अधिकांशतः गाँवों में पशुओं की मौत की संख्या में असामान्य बढ़ोतरी हुई है। पिछले एक महीने में यूपी के बुन्देलखंड क्षेत्र के 41% गाँवों और एमपी के बुन्देलखंड क्षेत्र के 21% गाँवों में भूखमरी या ज़हर के कारण 10 से ज्यादा पशुओं के अप्राकृतिक मौत की रिपोर्ट है।

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