बड़ी दूर से आए हैं!

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नई दिल्ली। एक छोटे से गाँव की तमाम सामाजिक और आर्थिक बंदिशों से निकलकर देश की राजधानी घूमने आईं 12 लड़कियों को दिल्ली ने क्या दिया, जवाब है सपने देखने का हौसला।

दिल्ली का पुराना किला घूम कर बाहर आईं आशिमा बानो (13 साल) की मानें तो ''गाँव में रहते थे तो यही सोचते थे कि लड़कियां ज्यादा कुछ नहीं कर सकती हैं, लेकिन दिल्ली आए तो देखा कि लड़कियां कितने विश्वास से अपने काम कर रही हैं, आ-जा रही हैं। ये सब देखकर यही लगा कि लड़की होकर भी हम बहुत से काम कर सकते हैं''

आशिमा उन 12 लड़कियों में से एक हैं जो दिल्ली से लगभग 550 किमी दूर उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले के छोटे से गाँव रामद्वारी से एजुकेशन टूर पर दिल्ली घूमने आई हैं। इस यात्रा का आयोजन करवाया इन लड़कियों के गाँव में संचालित एक गैर सरकारी संस्थान स्वतंत्र तालीम ने। स्वतंत्र तालीम इन 12 लड़कियों और इन जैसी रामद्वारी गाँव की कई और लड़कियों का स्कूल भी है। एक ऐसा स्कूल जो उन्हें डिग्री तो नहीं देता लेकिन जीवन की परिभाषा सिखाता है।  

''छह भाई, तीन भाई छोटे बाकी बड़े हैं, वो पढ़ रहे थे। पहले तो सोचना ही बंद हो गया था लेकिन अब फिर से सोचा है कि डॉक्टर बनेंगे, हम भी पढ़ाई करेंगे, आशमा की बातों में झलक रहा आत्मविश्वास इस बात का परिचायक था कि कैसे सिर्फ छह दिन की दिल्ली जैसे महानगर की यात्रा ने इन लड़कियों की सोच को बदला है। एक ऐसा महानगर जिसे आज-तक उन्होंने सिर्फ किताबों, अखबारों और टीवी पर देखा था।

रामद्वारी एक मुस्लिम बाहुल्य गाँव है और ये सभी लड़कियां उसी समुदाय से वास्ता रखती हैं। तमाम सामाजिक बंदिशों में रहने को अपना जीवन मान चुकी इन लड़कियों के लिए यह यात्रा सपने देखने का एक मौका था। 

''इतनी ऊंची बिल्डिंग पहली बार देखी, बहुत अच्छा लगा। गाँव में तो खेत या घर के काम में ही जुट जाते हैं, बाहर निकलने ही नहीं देते थे, यहां आए तो मन में आया कि अपने पैरों पर खड़ा होना है कक्षा आठ की छात्रा शकीना बानो हंसकर बताती हैं।  

चमक-दमक, सपने और संभावनाओं से भरे इस महानगर में बड़ी दूर से आई इन जिज्ञासू लड़कियों के लिए ये बिलकुल नई दुनिया थी जिसमें वो चेहरे पर खूबसूरत सी हंसी के साथ शामिल हो रही थीं। 

''यहां आए लड़कियों को बाहर निकलकर काम करते देखा, ये देखा कि उनमे कितना आत्मविश्वास है तो हमें भी हौसला मिला, यहां तो सिर्फ लड़कियां ही लड़कियां दिखती हैं काम पर जाते हुए, टहलते-घूमते, लोगों से बात करते हुए, जो हमारे यहां ऐसे देखने को नहीं मिलता, सायरा बानो (15 साल) बताती हैं। 

बारह लड़कियों के इस समूह ने स्वतंत्र तालीम के संस्थापक रिधि अग्रवाल, राहुल अग्रवाल और उनके संयोजक विनोद के साथ राष्ट्रपति भवन, कुतुब मिनार, लाल किला और पुराना किला देखा। पहली बार मेट्रो और शताब्दी जैसी ट्रेनों में बैठे। प्लेन में उड़े। विचारों की उड़ान और खुलापन देखा, प्रेरित होकर खुद के लिए सपने संजोए।

''मेट्रो सबसे अच्छी लगी, इसके अलावा लाल किला भी सुंदर लगा, राष्ट्रपति भवन का इतना भयंकर झूमर तो हम देखते ही रह गए। इसके पहले गाँव से लोग यहां आते थे और वापस जाकर हमें बताते थे कि दिल्ली ऐसा है, वैसा है तो हम सोचते थे कि क्या कभी हम पहुंच पाएंगे, लेकिन इसी तरह धीरे-धीरे आशा जुड़ने लगी और आ गए, कलीमुन्निशां (15 साल) ने बताया।

दूर एक छोटे से गाँव से आईं सपने देखने वाली लड़कियां। सब इतना आसान नहीं था इन लड़कियों की जिंदगी में। दरअसल ये सभी लड़कियां घरों में रहती थीं, जिन्हें पढ़ने के नाम पर सिर्फ उर्दू की शिक्षा की मंज़ूरी थी। फिर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अल्पसंख्यकों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए नालंदा योजना चलाई गई, जिसमें गाँव की कुछ लड़कियों को पढ़ने की अनुमति मिल पाई, लेकिन जल्द ही नालंदा योजना बंद हो गई, और लड़कियों की पढ़ाई अधर में लटक गई।  

''ऐसे ही गाँव में थे, न कोई सपना था, न ही पढ़ने की इच्छा। गाँव में ही पढ़े थे, फिर पढ़ाई रुकवा दी गई थी, लेकिन स्वतंत्र तालीम की वजह से दोबारा शुरू हो पाई है। वरना तो गाँव वाले कहते थे इनको उर्दू पढ़ा लो बस, बाकी घर का काम करें आशमा बानो ने बताया।

स्वतंत्र तालीम स्कूल के पढ़ाने का तरीका भी लड़कियों को पसंद आया आया, क्योंकि इस स्कूल में आम सरकारी स्कूल की तहर किताबें रटवाईं नहीं जाती थीं, बल्कि चीज़ें करनी सिखाई जाती थीं। दरअसल इस स्कूल में पढऩे वाले छह से चौदह साल के सभी बच्चों ने दाखिला आम सरकारी स्कूल में ले रखा है, और स्कूल के बाद वो स्वतंत्र तालीम के सेंटर पर पढ़ने आते हैं। मुख्यत: हिंदी-अंगरेज़ी, कला, विज्ञान और गणित की पढ़ाई के साथ-साथ सेंटर पर बच्चों को हस्तकला भी सिखाई जाती है।  

उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है कि वो इस तरह की यात्राओं और छोटे-छोटे कार्यक्रमों का आयोजन करने से पहले अपने हाथों से कोई सामग्री बनाएं और उसे अपने ही गांव-समुदाय के लोगों को बेचें। दिल्ली की यात्रा से पहले भी इन सभी 12 लड़कियों ने दो-दो जोड़ी कुर्ते बनाए थे।

''स्वतंत्र तालीम में हमने बच्चों की पढ़ाई में प्रैक्टिकल ज्ञान को महत्व दिया है। गाँव वाले पूछते हैं कि क्या पढ़ रहे हो तो बच्चों ने साथ में एक सोलर मोबाइल चार्जर बनाकर गाँव को जवाब दिया। पिता अपनी बैंक पासबुक नहीं समझ पाते तो बच्चे-बच्चियां पासबुक पढ़कर उन्हें ये बता देते हैं कि खाते से कुछ रुपए ज्य़ादा कटे हैं। इस सब से घरवालों का बच्चों पर और संस्था पर विश्वास बढ़ता है। स्वतंत्र तालीम के सह-संस्थापक राहुल कहते हैं साल 2013 में स्वतंत्र तालीम की नींव रखने से पहले राहुल भारती एयरटेल कंपनी में बतौर चार्टेड एकाउंटेंट काम कर रहे थे।

संस्था की दूसरी सह-संस्थापक रिधि भी टाइम्स ऑफ इंडिया और एडलवाइस जैसे बड़े संस्थानों के साथ काम कर चुकी हैं, और अपने कॉरपोरेट करियर को छोड़कर उत्तर प्रदेश के दूर-दराज़ के गाँवों में स्वतंत्र तालीम के दो केंद्र राहुल के साथ मिलकर संचालित कर रही हैं। 

स्वतंत्र तालीम पर परिवार वालों को इतना विश्वास हो चुका है कि अपनी बच्चियों को भेजने के लिए पहले तो हिचकिचाए लेकिन बाद में मान गए।  

''घर वालों ने जाने से रोका नहीं, कहने लगे जाओ हमारी ज़िन्दगी नहीं सुधरी तो तुम्हारी तो सुधर ही जाएगी", कक्षा आठ की छात्रा शहीदुन्निशां ने कहा।

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