'देशद्रोह' की सहिष्णुता, सरकार की बुजदिली होगी

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जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो पोस्टर लगाए गए, सेमिनार का आयोजन हुआ और सड़कों पर जो देशविरोधी नारे लगे वह देश के लोगों ने टीवी पर देखा। वर्ष 1962 में चीनी आक्रमण के समय सीपीएम ने चीन को बेगुनाह और भारत को हमलावर बताया था और स्वयं जवाहर लाल नेहरू ने लोकसभा में कहा था तुम उस जमीन की बात कर रहे हो जहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता। महावीर त्यागी ने अपनी टोपी उठाकर कहा था, पंडित जी तिनका तो यहां भी नहीं उगता तो क्या यह चीन को दे दूं। कहते हैं शिक्षण संस्थाओं में यह सब पहले भी होता रहा है तब तो इस पर लगाम बहुत पहले लग जाना

चाहिए थी। 

शिक्षण संस्थाओं को किसी उद्देश्य से बनाया जाता है। जेएनयू बनाने का भी उद्देश्य रहा होगा पर उसमें उच्चतम न्यायालय के फैसले को न्यायिक हत्या कहना, दुश्मन देश का जयकारा लगाना, भारत के खंड-खंड करने का लक्ष्य, जघन्य अपराधी की फांसी को शहादत कहना आदि तो शामिल नहीं रहे होंगे। श्रीनगर विश्वविद्यालय में भी यह होता है उससे दिल्ली की बराबरी नहीं हो सकती। वहां धारा 370 के कारण केन्द्र सरकार सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती। 

भारत विभाजन के पहले शिक्षा संस्थाओं की अलग-अलग भूमिका थी। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खां उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ विश्वविद्यालय की देन थे। बंगाल के सुहरावर्दी का सम्बन्ध भी कलकत्ता विश्वविद्यालय से रहा था। लेकिन अब उस तरह की विचारधारा की न तो जरूरत है और न बर्दाश्त करना चाहिए। सहिष्णुता के नाम पर हालात को यहां तक पहुंचने दिया गया यह पिछली सरकारों का निकम्मापन था। आशा है अब सहिष्णुता और कायरता में अन्तर समझ में आ जाएगा।  

हमारे देश में खुलकर बोलने, लिखने और रचनाकारों को पूरी आजादी रही हैं लेकिन उस आजादी का दुरुपयोग ऐसा कभी नहीं हुआ जैसा अब हो रहा है। हमारे पास वह सब कहने या करने का अधिकार है जिसे हम सही समझते हैं परन्तु जिससे देश और समाज का अहित न हो। अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को दुख पहुंचाने या देश को ही मिटाने की आजादी नहीं है। क्या अमेरिका के लोग ओसामा बिन लादेन और फ्रांस के लोग बगदादी का जयकारा लगाएंगे। क्या मुस्लिम देश इजराइल और पाकिस्तान के लोग भारत का जयकारा बोलेंगे? बोल दिए तो अन्जाम क्या होगा?

अभिव्यक्ति की आजादी का रचनात्मक उदाहरण हम सन्त कबीर में पाते हैं। उन्होंने हिन्दू-मुसलमान दोनों को खरी-खरी सुनाई पर उनके मरने के बाद दोनों ने उनका अन्तिम संस्कार करना चाहा। कबीर ने बिना भेदभाव के अन्याय और कुरीतियों की आलोचना की थी, बिना भय के निस्वार्थ भाव से अपनी बात कही थी। बुद्धिजीवियों का यही काम होना चाहिए, अभिव्यक्ति की आजादी का रचनात्मक उपयोग और यदि जेएनयू के तथाकथित छात्रों को देश विरोधी नारे लगाने की आजादी है तो सरकार का भी कार्रवाई करने का नैतिक और वैधानिक दायित्व है। 

यदि आप एक किताब लिखें और उसका नाम सोचें तो क्या उसका नाम श्रीमद्भगवत गीता, बाइबिल या कुरान शरीफ रख देंगे, यह जानते हुए भी कि इससे हिन्दुओं, मुसलमानों और ईसाइयों का दिल दुखेगा। अनावश्यक विवाद पैदा करने की आजादी नहीं दी जा सकती। पिछली सरकारों ने इसकी अनदेखी किया तो वह अपराध था। विघटनकारी और विध्वंसात्मक कामों की आजादी देना सहिष्णुता नहीं बुजदिली होगी।

सबसे खराब काम हुआ है विद्यालयों-विश्वविद्यालयों में राजनीतिक पार्टियों का अपनी छात्र शाखाएं खोलना और छात्रावासों को राजनीति का केन्द्र बनाना। दूसरा खराब काम हुआ राजनेताओं का अपने कुलपति बनवाना, जिनके पास नैतिक बल है ही नहीं। ऐसे लोगों के लिए  स्वायत्तता का कोई मतलब नहीं। समाज में सहनशीलता जरूरी है, परन्तु सहनशीलता की लक्ष्मण रेखा भी जरूरी है। आजादी का प्रयोग करने वाले जब सहनशीलता को कायरता समझने लगते है तो ऐसा ही होता है जैसा जेएनयू में हुआ। हम कुछ भी कहने तथा कुछ भी करने के लिए अपने को आजाद न मानें। आजादी के दुरुपयोग पर विराम लगना ही चाहिए। आजादी की सीमाएं नहीं पता हैं तो बतानी होंगी ।

sbmisra@gaonconnection.com

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