'धंधा कैसे करें! अब तो मुफ्त की मिट्टी भी नहीं मिलती'

धंधा कैसे करें! अब तो मुफ्त की मिट्टी भी नहीं मिलतीgaon connection, गाँव कनेक्शन

सतीश कश्यप

बाराबंकी। एक समय था जब गाँवों की शादी बारातों में अधिकतर मिट्टी के कुल्लहड़ों और बर्तनों का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन आज के आधुनिक युग में थर्मोकोल और प्लास्टिक के ग्लासों ने इन मिट्टी के कुल्लहड़ों की जगह ले ली है। इसका सीधा असर कुम्हारों की चाक की रफ़्तार पर पड़ा है।

बाराबंकी ज़िला मुख्यालय के सबसे भीड़भाड़ वाले क्षेत्र छाया चौराहे के पास सत्यप्रेमी कस्बा है। इस कस्बे में एक मोहल्ला कुम्हारन टोला के नाम से जाना जाता है। यहां के निवासी रामनरेश कुम्हार (65 साल) के घर पर आज भी मिट्टी के बर्तन तैयार किए जाते हैं। रामनरेश का बड़ा बेटा ब्रजेश अपने पिता के पुश्तैनी धंधे को आज भी जि़ंदा किये हुए हैं और चाक चलाकर पूरे परिवार का पेट भरते हैं।

रामनरेश बताते हैं ''सबसे बड़ी समस्या यह है कि शहर में मिट्टी के जो भी तालाब थे वो पट गए हैं, यहां सभी जगह बड़े-बड़े मकान बन गए हैं और अब तो खेतों से भी मिट्टी लाने में पुलिस बहुत परेशान करती है। हम धंधा कैसे करें, अब तो मुफ्त की मिट्टी भी नहीं मिलती। 

कुम्हारन टोले में कुम्हार बिरादरी के दर्जनों परिवारों के सैकड़ों लोग रहते हैं। इनमे से ज्यादातर कुम्हार बिरादरी ने अपने पुस्तैनी धंधे को बंद कर दूसरे धंधों में हाथ आज़माना शुरू कर दिया है। लेकिन यहां पर कुछ परिवार ऐसे भी हैं,जो आज भी अपने पुस्तैनी धंधे को जिंदा रखे हुए है।

दूसरी समस्या के बारे में टोले के रामचंदर (54 साल) ने बताया,''यहां पर अगर किसी तरह मिट्टी मिल भी जाती है, तो मिट्टी के बर्तनों को पकाने के लिए ईंधन भी महंगा मिलता है। इसलिए अब आर्डर मिलने पर ही माल तैयार किया जाता है नहीं तो चक्का बंद रहता है।"

सरकार ने ज़िले में रहने वाली कुम्हार बिरादरी को सरकारी तालाब का 10 साल मछली पालन का पट्टा देकर रोज़गार को जिंदा रखने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। इसमें तालाबों से कुम्हार को मिट्टी निकालने की पूरी छूट दी जाती है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अब कुम्हार ने मिट्टी के बर्तन बनाना कम कर दिया है क्योंकी अब वहां भी मिट्टी के बर्तनों की मांग बहुत कम हो गई है।

वहीं नगर कोतवाली के बड़ेल गाँव में भी कुम्हार प्रजापति (50वर्ष)  बताते हैं, ''यहां कुम्हार बिरादरी के आधा दर्जन से अधिक परिवार रहते हैं, जबसे प्लास्टिक और फाइबर के ग्लासों का शादी ब्याह में चलन बढ़ा है तभी से हम लोगों का धंधा कम पड़ गया है।" 

सरकार ने भले ही पॉलिथीन पर बैन लगाकर लोगों के स्वास्थ्य के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की पहल की है लेकिन इसी क्रम में अब प्लास्टिक के ग्लासों पर भी सरकार को पहल करने की जरुरत है, जिससे कुम्हारों की चाक की रफ़्तार एक बार फिर तेज हो सके।

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