‘धन्नो’ पर दवाई असर नहीं की तो ज़हर देना पड़ा

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बागपत/ लखनऊ। जिस ‘धन्नो’ पर महमूद के पूरे परिवार का पालन पोषण जुड़ा हुआ था उसी धन्नो (घोड़ी) को महमूद ने खुद मरवा दिया। धन्नो को ग्लैंडर नाम की बीमारी हो गई थी, जिसका कोई इलाज नहीं है।

पिछले पांच वर्षों से धन्नो की मदद से शामली जिले के सिलावर गाँव में रहने वाले महमूद बागपत जिले में फखरपुर के एक ईंट भट्ठे पर ढुलाई का काम करते थे। महमूद बताते हैं, ‘‘कुछ समय से धन्नो बीमार चल रही थी, डॉक्टर को भी दिखाया था लेकिन वो ठीक नहीं हो रही थी। फिर उसकी जांच का सैपल डॉक्टरों ने लिया जिसके बाद पता चला की उसे ग्लैंडर बीमारी थी। उसे जहर देकर मारना पड़ा।’’ बागपत में महमूद की धन्नो के साथ 55 और घोड़ों के रक्त के नमूने लेकर जांच को भेजे गए हैं। ईंट- भट्ठों पर समूह में काम करने वाले पशुओं के लिए खतरे की घंटी है।

19वीं जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में अश्व प्रजाति (घोड़ा, गधा, खच्चर) के 2 लाख 51 हजार पशु है। ग्लैंडर जीवाणु जनित रोग लाइलाज़ बीमारी है। जो बरसात से पहले फैलती है। बीमारी से पीिड़त पशु को मारना ही पड़ता है। अगर कोई पशुपालक इस बीमारी से ग्रसित पशु के संपर्क में आता है तो यह मनुष्यों में भी फैल जाती है। इस बीमारी का अब तक कोई टीका विकसित नहीं किया जा सका है।

घोड़े, गधों और खच्चर में होने वाली घातक बीमारी ग्लैंडर से बागपत समेत पश्चिमी यूपी के छह जिले इसकी चपेट में हैं। पिछले दिनों मेरठ (150), बुलंदशहर (74), हापुड़(49), गाजियाबाद (715), नोएडा (87) बागपत (89) के पशुओं के सैंपलों को राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान संस्थान (हिसार) भेजे गए थे, जिसमें कई पशुओं में रोक बीमारी के विषाणु पाए गए हैं।

लखनऊ स्थित पशुपालन विभाग के रोग नियंत्रण एवं प्रक्षेत्र के निदेशक डॉ. एन के सिंह ने बताया, “कुछ में सैंपल पहले ही पॉजिटिव पाए गए थे, अब एक बागपत और चार गाजियाबाद में सैंपल पॉजिटिव आए हैं। बागपत में घोड़ी को मार दिया गया है, गाजियाबाद से सैंपल लेकर दोबारा जांच के लिए भेजे जाएंगे, पुष्टि होने पर उन्हें भी मारना ही पड़ेगा।”

बागपत के पशुपालन विभाग ने इस जानलेवा बीमारी के वर्ष 2009 के एक्ट का हवाला देते हुए घोड़ी को मारने के निर्देश दिए थे। सीवीओ डॉ. राजपाल ने बताया कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। यह जानवरों के साथ-साथ मनुष्यों को भी अपनी चपेट में ले सकती है इसलिए इससे ग्रसित जानवर को तत्काल मारना पड़ता है। अब पांच किमी के दायरे में आने वाले घोडे़ और खच्चरों सहित अन्य पशुओं की जांच के लिए सैंपल भी भेज दिए है, अब उनकी रिपोर्ट का भी इंतजार है। इसके साथ-साथ एसपी सहित तीनों एसडीएम को पत्र लिखा गया है कि ज़िलें में बाहरी घोड़े और खच्चरों पर प्रतिबंध रहेगा। 

राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान संस्थान,हिसार (हरियाणा) के प्रधान वैज्ञानिक डॉ.एस के खुराना बताते हैं, इस बीमारी के सैंपल पूरे भारत से हमारे संस्थान में आते है। उत्तर प्रदेश के भी कई सैंपल आए हैं, जिनमें से कुछ सैंपलों की पुष्टि करके भेज दिया गया है कुछ की जांच चल रही है। यह बीमारी घोड़ों से मनुष्य में होती है लेकिन इतनी जल्दी होती है तो घबराने की जरूरत नहीं है। वर्ष 2000 के बाद कोई मामला ऐसा नहीं आया है जिसमें इस बीमारी से कोई व्यक्ति मरा हो।” अपनी बात को जारी रखते हुए खुराना आगे बताते हैं, “वर्ष 2006 में महाराष्ट्र में इस बीमारी के संक्रमण के बाद सैकड़ों घोड़ों, गधों और खच्चरों को मारना पड़ा था। लेकिन यूपी सरकार ने उससे सीख नहीं ली। अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस बीमारी को अब गंभीरता से लिया जा रहा है।”  

घोड़ी मालिक को दिया मुआवजा 

लखनऊ पशु निदेशालय के निर्देश पर घोड़ी मालिक महमूद को एस्केड योजना के तहत 25 हजार रुपए का मुआवजा भी दिया गया। क्योंकि इस तरह की जानलेवा बीमारी में पशु को मारने का प्रावधान तो है, लेकिन मालिक को मुआवजा भी दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि महमूद का कहना है, “घोड़ी की कीमत तो अस्सी हजार की थी, बहुत नुकसान हो गया है।” 

पांच किमी के दायरे के सभी घोड़े के खून की होगी जांच

सीवीओ डॉ. राजपाल सिंह ने बताया कि अन्य जानवरों को यह बीमारी न हो यह सुनि्श्चिचत करने के लिए आसपास के सभी भट्ठों के जानवरों का खून टेस्ट किया जाएगा। 55 घोड़ों के खून का नमूना लिया गया है। बाकी जानवरों के खून की जांच शीघ्र ही करा ली जाएगी।

रिपोर्टर - सचिन त्यागी

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