घर, स्वास्थ्य और असुरक्षा बेटियों के पैर की बन रही बेड़ी

घर, स्वास्थ्य और असुरक्षा बेटियों के पैर की बन रही बेड़ीgaoconnection

लखनऊ। रत्नादेवी की शादी 14 साल में घरवालों ने दबाव डालकर करा दी थी और आज 18 वर्ष की रत्ना पढ़ाई लिखाई के समय में अपने साथ एक परिवार और बच्चे का बोझ उठा रही है। यही हाल उसके दो घर छोड़कर रहने वाली कल्पना गौड़ (17 वर्ष) का भी है जब उसके भाई पढ़ने के लिए घर से निकल रहे होते हैं तो कल्पना उनके लिए खाना पका रही होती है। 

लखनऊ से लगभग 35 किमी दूर मोहनलालगंज ब्लॉक के बाजूपुर गाँव की रहने वाली कल्पना की पढ़ाई कक्षा आठ के बाद सिर्फ इसलिए छुड़ा दी गई क्योंकि गाँव में उसके उम्र की ज्यादा लड़कियां नहीं थीं जो उसके साथ रोज स्कूल जा सकें। कल्पना बताती हैं,‘‘कक्षा आठ तक तो सरकारी स्कूल में पढ़ लिए पर उसके बाद स्कूल घर से दूर था और घरवालों ने कहा घर का कामकाज सीखें, कौन सी नौकरी मिलेगी पढ़कर। शादी ब्याह ही करना है तो फिर मैं घर का काम करने लगी और बगल में सिलाई सीखने लगी।’’

रत्ना और सीता की तरह ज्यादातर ग्रामीण लड़कियां परिवार में लैंगिक भेदभाव के कारण अशिक्षित रह जाती हैं। उनका खुद का परिवार उनके पढ़ने लिखने में बाधा बन रहा है। परिवार में लड़कों की पढ़ाई को ही प्राथमिकता दी जा रही है। देशभर में शिक्षा पर काम करने वाली राष्ट्रीय स्तर के गैर सरकारी संगठन प्रथम की वर्ष 2013 की सालाना रिपोर्ट असर के अनुसार प्रदेश में 11 से 16 वर्ष की लगभग 31 फीसदी लड़कियां स्कूल जाना छोड़ देती हैं। लड़कियों के स्कूल छोड़ने के मामले में राजस्थान पहले और उत्तर प्रदेश दूसरे नम्बर पर है।

स्कूलों में मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं का न मिलना भी लड़कियों को स्कूल छोड़ने का बहुत बड़ा कारण बन रहा है। लखनऊ से लगभग 37 किमी दूर उत्तर दिशा में मगठ गाँव की रहने वाली प्रियंका वर्मा (18) बताती हैं, ‘‘मेरे स्कूल में शौचालय की हालत बहुत खराब है,पूरे स्कूल में केवल एक महिला शौचालय है जिसमें पानी तक नहीं आता। स्कूल में पीने का पानी भी बहुत गंदा है। बीमार होने के डर से ज्यादातर बच्चे अनुपस्थित रहते हैं।’’ 

किशोरावस्था में लड़कियों के अंदर कई तरह के शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते हैं जिन्हें वो सबसे बताने से हिचकिचाती है। जिन स्कूलों में पुरूष अध्यापक ज्यादा होते हैं वहां लड़कियां और भी ज्यादा संकोच करती हैं। ग्रामीण अंचलों में लड़कियों के स्कूल छोड़ने का कारण बताते हुए बाराबंकी के राजकीय विद्यालय की अध्यापिका कंचन वर्मा बताती हैं,‘‘ग्रामीण क्षेत्रों के लगभग सभी स्कूलों में आपको ये आंकड़ा आसानी से दिख जाएगा कि लड़कियां लड़कों से कम कक्षाएं करने आती हैं। सरकारी योजनाओं के कारण ज्यादातर लड़कियां दाखिला तो करा लेती हैं लेकिन पढ़ने बहुत कम ही आती हैं।’’ वो आगे बताती हैं, ‘‘उनके स्कूल छोड़ने का कारण उनका परिवार और स्वास्थ्य होता है। आज भी लड़कियों के लिए घर का काम सीखना प्राथमिकता होती है। दूसरा मासिक में गाँव की लड़कियां स्कूल बिल्कुल नहीं आती क्योंकि वो इस समय असहज महसुस करती हैं।’’

जनगणना 2011 के अनुसार भारत के ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की साक्षरता दर 46 फीसदी है जबकि लड़कों की 70 फीसदी है। अलग-अलग समुदायों में साक्षरता दर का अनुपात अलग-अलग है। हिन्दुओं में महिलाओं की साक्षरता दर 53 फीसदी है और पुरुषों की 76 है। अल्पसंख्यक वर्ग में महिलाओं की साक्षरता दर 50 फीसदी है और पुरुषों की 67 फीसदी है। 

महिलाओं की शिक्षा पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था एजुकेट गर्ल्स के जनरल मैनेजर परवेज़ बताते हैं, ‘‘लड़कियों की शिक्षा आज भी गाँव के लोगों के लिए कोई गंभीर विषय नहीं है, जिसपर वो चिंतन करें। लड़कियों की शिक्षा के लिए सरकार भी लगातार प्रयास कर रही है कई योजनाओं का लालच देकर उनका रुझान शिक्षा के प्रति बढ़ाने का प्रयास जारी है।’’ वो आगे बताते हैं, ‘‘लेकिन जब तक मां ये निर्णय लेने में सक्षम नहीं होगी कि उसकी बेटी के लिए घर के काम के साथ पढ़ना भी जरूरी है, गाँव की बेटियों का भविष्य चूल्हे चौके तक ही सीमित रहेगा।’’

खेलने और पढ़ने की उम्र में लड़कियाें की शादी के पीछे कहीं न कहीं एक बड़ा कारण बढ़ते अपराध हैं।  मोहनलालगंज से लगभग 17  किमी दूर बरूवा गाँव की रहने वाली आरती (17 वर्ष) की शादी मात्र 15 वर्ष पर हो गई थी क्योंकि गाँव में कई घटनाएं छेड़खानी की हो रही थीं।  आरती बताती हैं,‘‘शादी बहुत पहले हो गई थी लेकिन विदाई अब हुई है। मां का कहना था शादी करके घर चली जाओ तभी तसल्ली होगी। कक्षा सात के बाद स्कूल बंद कर दिया।’’

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