'गणित से भागो नहीं उससे दोस्ती करो'

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आदरणीय मुख्यमंत्री जी,

(भारत के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री के नाम)

गणित ग़रीब को और ग़रीब बना देता है। उसका सपना तोड़ देती है। गणित ने न जाने कितने छात्र-छात्राओं को मानसिक और सामाजिक रूप से कुंठित किया है। उन्हें अपराधी बना दिया है। मैं ख़ुद गणित में काफी कमज़ोर था इसलिए इस विषय की मार को नस-नस से जानता हूं। भारत में इसके डर का कारोबार चल रहा है। मैं नहीं कहता कि आप सभी लोग इसके बारे में नहीं जानते लेकिन आपका ध्यान दिलाने के लिए एक पत्र तो लिख ही सकता हूं।

मैंने एक फ़िल्म देखी है-निल बट्टे सन्नाटा। यह फ़िल्म सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए बच गए छात्रों के जीवन पर गणित के असर को समझने का प्रयास करती है। उस डर से सामना करती है जिसके कारण बच्चे अगली बेंच से पीछे की बेंच पर बैठने लगते हैं। फ़ेल होने लगते हैं और उनका बचपन नई-नई किस्म की आज़ादी या तरह-तरह के भटकावों की ओर जाने लगता है। फ़िल्म में मैंने गणित के डर से बग़ावत का एक सुंदर चेहरा भी देखा। गणित ने फ़ेल होने वाले छात्रों के बीच दोस्ती और मौज-मस्ती को उभरने का मौका भी दिया। मगर वो मौक़ा उन्हें आगे बड़े सपने देखने से रोक भी देता है।

चंदा सहाय कोई भी हो सकती है। लाखों की संख्या में चंदा सहाय जैसी माताएं असहाय देख रही हैं कि कैसे गणित और अंग्रेजी के भय से बच्चे पढ़ाई से दूर हो रहे हैं और फ़ेल हो रहे हैं। प्राइवेट स्कूलों के बच्चे अरबों रुपए ट्यूशन और कोचिंग में दे रहे हैं। आपके राज्यों में ख़राब तरीके से गणित पढ़ाने वाले मास्टरों और उनके शिकार बच्चों का ईमानदार सर्वे करा लीजिए तो पता चल जाएगा कि वर्षों से इस विषय के नाम पर कोमल मन को किस तरह से यातना दी जा रही है। कई राज्यों में दसवीं की परीक्षा में लाखों की संख्या में बच्चे फ़ेल हो रहे हैं। इससे कानून व्यवस्था से लेकर उत्पादकता तक पर असर पड़ता होगा।

निल बट्टे सन्नाटा आपका कुछ काम आसान करती है। यह फ़िल्म आत्मविश्वास पैदा करती है कि गणित पर विजय प्राप्त किया जा सकता है। बच्चे न सिर्फ गणित को जीत सकते हैं बल्कि अपनी ग़रीबी से निकलने का सपना भी देख सकते हैं। घरों में काम करने वाली चंदा सहाय पहले इस डर को समझती है और फिर जीतने का रास्ता निकालती है। चंदा नहीं चाहती कि बाई की बेटी बाई बने। वो पढ़े तो ठीक से पढ़े। उसकी बेटी अपेक्षा यही जानती है कि बाई आगे की पढ़ाई तो करा नहीं पाएगी तो पढ़ने का क्या फायदा। गणित में फ़ेल होने के कारण वो प्रयास भी छोड़ देती है।

चंदा कोचिंग संस्थानों के मकड़जाल में फंसने की तैयारी भी करने लगती है ताकि बेटी किसी तरह गणित में पास हो जाए। कलेक्टर बन जाए। एक मां का क्लास में जाने का फ़ैसला लाखों मांओं के लिए प्रेरणा बन सकता है। स्वरा के अभिनय ने किरदार को हर तरह से वास्तविक बनाया है। स्वरा की यह सबसे बेहतरीन फ़िल्म है। आजकल की कोई अभिनेत्री ऐसे किरदार में हाथ नहीं डालेगी जिसमें ग्लैमर न हो। निर्देशक और अभिनेत्री की ईमानदारी कही जा सकती हैं कि उन्होंने भी ग्लैमर डालने का प्रयास नहीं किया।

चंदा की बेटी का नाम अपेक्षा है और अपेक्षा को ख़ुद से कोई अपेक्षा नहीं। अपेक्षा, स्वीटी और पिंटू को गणित मार देता है। ये बेहद प्यारे बच्चे हैं और बिल्कुल फ़ेल होने वाले बच्चे की तरह। मैं ख़ुद इन तीनों में से एक रहा हूं। गणित का ख़ौफ़ आज भी इतना गहरा है कि पत्रकारिता में आने के बाद एक डाक्यूमेंट्री ‘क्या आपको मैथ्स से डर लगता है’ बनाई थी। प्राइम टाइम का एक शो किया था। हर समय सोचता हूं कि कैसे इस डर के बारे में लोगों से बात की जाए। एक योजना भी है कि गणित को लेकर सरकारी स्कूलों के लिए कुछ बनाऊँ।

पंकज त्रिपाठी ने प्रिंसिपल श्रीवास्तव जी की भूमिका को शानदार तरीके से जिया है। श्रीवास्तव जी गणित की कक्षा में पढ़ाते कम हड़काते ज़्यादा हैं। बहुत ख़ूबी से इस फ़िल्म ने गणित के मास्टर को एक सिस्टम के रूप में पेश किया है। एक उदार दिल ज़मींदार की तरह। जो पास होने वाले की पीठ पर हाथ रखता है और फ़ेल होने वाले को दुतकारता है। वो नए ख़यालात का आदमी है क्योंकि जब जागो तब सवेरा टाइप नारों के साथ अख़बार में छपता भी रहा है। वो एक मां चंदा सहाय को उसकी बेटी के क्लास में पढ़ने का मौक़ा भी देता है। इसके बावजूद वो ख़ुद को गणित मास्टरों के सिस्टम से आज़ाद नहीं कर पाता है। ज़्यादातर गणित मास्टर अहंकारी ज़मींदार होते हैं जिनका काम गणित के नाम पर बच्चों का आत्मविश्वास तोड़ना भर होता है।

निल बट्टे सन्नाटा का लेखक शायद मेरी तरह गणित से आक्रांत रहा होगा या इस डर को जानता होगा। इस फ़िल्म का एक और प्यारा किरदार है अमर। अमर गणित में तेज़ है मगर वो मास्टर के कारण नहीं। अमर पहले चंदा को फिर अपेक्षा, स्वीटी और पींटू से गणित की दोस्ती कराता है। अमर का किरदार बताता है कि जो बच्चे गणित में अच्छे हैं वो बस संयोगवश अच्छे हैं या अपवादस्वरूप।

अमर ज़मीन पर चित्र खींच कर वृत्त बनाकर परिधि और त्रिज्या के बारे में बताता है। कहता है गणित से भागो नहीं। दोस्ती करो। रटो नहीं समझो। इतनी ईमानदार फ़िल्म है कि वो बच्चों के मनोविज्ञान और कमज़ोरी पर बनी फ़िल्म तारे ज़मीं का ज़िक्र भी करती है। शुक्रिया के अंदाज़ में और यह बताने के लिए गणित का डर कहीं ज़्यादा बड़ी समस्या है।

आप सोच रहे होंगे कि मैं पत्र लिख रहा हूं या समीक्षा। दरअसल दोनों। इसलिए लिख रहा हूँ कि इस ख़ूबसूरत फ़िल्म को सभी सरकारी स्कूलों के बच्चों को दिखाने का इंतज़ाम कीजिए। सरकार की तरफ से प्रिंसिपलों को लिखिए कि वे इस फ़िल्म को दिखाएं। संस्थाओं से अपील कीजिए कि वे किसी एक सरकारी स्कूल के बच्चों को प्रायोजित करें ताकि वे इस फ़िल्म को सिनेमा हॉल में देख सकें तभी असर भी होगा। बेहद मनोरंजक फ़िल्म है। खूब मौज मस्ती है। न तो गणित के भय को बढ़ा चढ़ाकर बताया गया है न ही भय पर जीत की अतिरंजना है। फ़िल्म धीरे-धीरे बताती है कि क्या करना है। रूला भी देती है और हंसा भी देती है। कोई नैतिक शिक्षा नहीं देती बल्कि कहती है चलो गणित के संग चलते हैं।

वैसे तो गणित के मारे प्राइवेट स्कूलों के बच्चे भी है। इस विषय का भूत उतारना बहुत ज़रूरी है। हंसते खेलते उतर जाए ये सीखना है तो आप मुख्यमंत्रीगण भी अपने शिक्षा मंत्रियों, शिक्षा सचिवों और शिक्षा अधिकारियों के साथ देख आइएगा। प्राइवेट स्कूलों को भी यह फ़िल्म दिखानी चाहिए।

(लेखक एनडीटीवी में सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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