‘फांसी लटकने वाले अधिकांश ग़रीब’

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नई दिल्ली (भाषा)। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मौत की सजा पाने वाले तीन चौथाई से अधिक दोषी आर्थिक, शैक्षिक तथा सामाजिक रुप से पिछड़े वर्ग के हैं या धार्मिक अल्पसंख्यक हैं। 

दिल्ली राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के ‘सेंटर फॉर डेथ पेनल्टी’ की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मौत की सजा पाने वाले दोषियों में से 80 फीसदी से अधिक कैदियों को जेलों में ‘‘अमानवीय और अत्यधिक शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है।’’

इन कैदियों की त्वचा सिगरेट से जलाई गई, उनकी उंगलियों के नाखूनों में सुइयां घुसाई गईं, निर्वस्त्र रखा गया, गुप्तांगों में लोहे की छड़ें या शीशे की बोतलें डाली गईं, पेशाब पीने को बाध्य किया गया, हीटर पर पेशाब करने को बाध्य किया गया, तारों से बांधा गया और बुरी तरह पीटा गया।

इस अध्ययन में भारत की जेलों में बंद मौत की सजा पाने वाले कैदियों का सामाजिक व आर्थिक ब्यौरा दिया गया है। इसमें कहा गया है कि करीब तीन चौथाई कैदी आर्थिक रुप से अत्यंत कमजोर हैं और इनमें से ज्यादातर तो अपने परिवार के प्रमुख या एकमात्र आजीविका चलाने वाले हैं।

रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि देश में 12 महिला कैदियों को भी मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है और ये महिला कैदी भी सामाजिक एवं आर्थिक रूप से से पिछड़े वर्ग में आती हैं।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई, उनमें से 23 फीसदी तो कभी स्कूल गए ही नहीं और 61.6 फीसदी ने उच्चतर माध्यमिक तक की शिक्षा भी पूरी नहीं की। 

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर ने रिपोर्ट के संबंध में पैनल के एक विचारविमर्श के दौरान कहा, ‘‘अगर आरोपी अशिक्षित है तो उसके बचाव पर इसका प्रभाव पड़ता है।’’ इस रिपोर्ट में उन 385 कैदियों का जिक्र है जो देश की विभिन्न जेलों में बंद हैं और जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई है, उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 79 कैदी ऐेसे हैं जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई है।

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