‘पीले सोने’की चमक पड़ी फीकी

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इंदौर। देश के सबसे बड़े सोयाबीन उत्पादक मध्यप्रदेश में मौजूदा खरीफ सत्र के दौरान किसानों के इस तिलहनी फसल के मुकाबले अरहर (तुअर) सरीखी दलहनी फसलों को ज्यादा तवज्जो दिए जाने से बुवाई के समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। इसके मद्देनजर प्रदेश सरकार ने सोयाबीन का बुवाई लक्ष्य करीब पांच फीसदी घटा दिया है, जबकि दलहनी फसलों के लक्षित रकबे में 26.5 फीसदी वृद्धि की है।

प्रदेश के कृषि विभाग के संचालक मोहनलाल मीणा ने सोमवार को बताया, ‘किसानों के इस रूझान को देखते हुए हमने मौजूदा खरीफ सत्र में सोयाबीन के बुवाई लक्ष्य को घटाकर 56 लाख हेक्टेयर कर दिया है, जबकि दलहनी फसलों के लक्षित रकबे को बढ़ाकर 21.5 लाख हेक्टेयर कर दिया है। 

केंद्र सरकार की भी नीति है कि दलहनी फसलों को बढ़ावा दिया जाए।’ मीणा ने बताया कि वर्ष 2015-16 के खरीफ सत्र में सोयाबीन का रकबा करीब 59 लाख हेक्टेयर रहा था, जबकि लगभग 17 लाख हेक्टेयर में दलहनी फसलें बोयी गयी थीं।

पिछले सत्र में बुवाई के बाद लम्बे अंतराल तक मानसूनी बारिश नहीं होने से खासकर सोयाबीन की फसल को बड़ा नुकसान हुआ था। सोयाबीन मध्यप्रदेश की प्रमुख नकदी फसल है और किसानों में ‘पीले सोने’ के रूप में मशहूर है।

इस बीच, प्रसंस्करणकर्ताओं के संगठन सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के कार्यकारी निदेशक डीएन पाठक ने कहा कि मध्यप्रदेश में सोयाबीन के रकबे में पांच फीसदी की अनुमानित कमी से सोयाबीन प्रसंस्करण उद्योग को खास फर्क नहीं पड़ेगा।

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