'प्रिय प्रधानमंत्री जी': सूखे पर विशेषज्ञों ने पीएम को दिखाया आइना

प्रिय प्रधानमंत्री जी: सूखे पर विशेषज्ञों ने पीएम को दिखाया आइना

भारत के गाँवों और देहातों के बड़े भाग में लोग हर दूसरे-तीसरे साल में सूखे का सामना कर रहे हैं जिस पर हम सभी अपनी सामूहिक चिंता व्यक्त कर रहे हैं। भारत के वो क्षेत्र जहां बारिश की उम्मीद में किसान बैठे थे वहां बारिश कम हुई जिससे वहां अनाज की कोई पैदावार नहीं है और हुई भी तो न के बराबर। सिंचाई के लिए भूजल का स्तर गिरने और जलाशय के सूखने की वजह से भी सिंचाई में दुविधा उत्पन्न हो रही है। इन सबकी वजह से देश में कृषि संबंधी आपदा जैसा माहौल है जिससे कृषि विकास भी बीते कुछ वर्षों से कम हुआ है जिसके निकट में सुधार होने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। इस आपदा का परिणाम ये है कि बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं, बचपन बर्बाद हो रहे हैं, शिक्षा में अड़चनें आ रही हैं, लोग कैंप लगाकर जीवन जीने के लिए मजबूर हैं और शराबखानों में भीड़ जुट रही है।

बूढ़े और कमजोर, मरने के लिए पीछे छूट गए हैं। जानवर, जिनके लिए चारा नहीं बचा है, उन्हें या तो कौड़ी के भाव बेच दिया गया या फिर छुट्टा छोड़ दिया गया खुद के चारे का जुगाड़ करने के लिए। पीने के पानी के स्रोत सूख चुके हैं। 

सूखे से उपजी इस त्रासदी पर केंद्र और राज्य सरकार द्वारा ज़मीनी स्तर पर उठाए गए कदम बिखरे हुए हैं। उनमें त्वरित कार्यवाहियों की इच्छा और संवेदना, दोनों की कमी है। ऐसे समय में मनरेगा के ज़रिए जितना काम कराया जा सकता था, उससे बहुत कम हुआ है, मजदूरी भी महीनों तक अटकी रहती है। इससे भी बुरी सच्चाई तो ये है कि तीन साल बीत जाने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एक्ट को लागू करने में नगण्य रुचि दिखा रही हैं। अगर ये एक्ट लागू हो गया होता तो गरीब राज्यों की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या को उनकी महीने भर की आवश्यकता को लगभग आधा अनाज मुफ्त में मिल जाता। सूखे की स्थिति में खाद्या सुरक्षा का अधिकार एक सामान रूप से सबके लिए लागू कर दिया जाना चाहिए।

हमने ये भी पाया कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों में परिवारों के पलायन कर जाने के बाद पीछे छूट रहे बुज़ुर्ग, बच्चों, दिव्यांगों और अन्य कमज़ोर लोगों को अनाज पहुंचाने का कोई प्लान सरकारों के पास नहीं है। आंगनबाड़ियों को इस दौरान ऐसे लोगों को राशन पहुंचाने के लिए अपग्रेड करके नोडल केंद्र बना दिया जाना चाहिए, पर ऐसा भी नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सूखाग्रस्त क्षेत्रों में मिड-डे मील भी सालभर बनना था, छुट्टियों में भी, पर ये भी विरले ही देखने को मिलता है। पीने के पानी की व्यवस्था, साथ में सुनिश्चित करना कि दूरस्थ क्षेत्रों में ट्यूबवेल सही से काम कर रहे हों, या ज़रूरत हो तो वहां पानी वाहनों के ज़रिए पहुंचाया जाता, इस दिशा में भी कोई खास कदम नहीं उठाए गए। चारे का भण्डार और पशुओं के लिए कैंप बनाने के प्रयास भी नहीं किए गए। इनमें से बहुत से काम सूखे के समय राज्यों द्वारा उठाए जाने वाले रूटीन कदम होते थे, और लगभग हरबार ये व्यवस्थाएं तत्काल प्रभाव से की जाती थीं, लेकिन वर्तमान में इन्हें शायद ही तवज्जो दी जा रही है।

किसी सूखाग्रस्त क्षेत्र के लिए केंद्र सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता होती है कि वहां व्यक्ति को ज्यादा से ज्यादा काम उपलब्ध कराया जाए। इसके विपरीत केंद्र सरकार ने तो इस वर्ष इतना भी फंड नहीं उपलब्ध करवाया कि पिछले साल के जितना ही जो कि सारकारी आंकड़ों के हिसाब से 233 करोड़ व्यक्ति-दिन है। अभी के प्रति व्यक्ति-दिन के खर्च के स्तर के हिसाब से 50,000 करोड़ रुपए की आवश्यकता है। फिर भी केंद्र ने 38,500 करोड़ रुपए पूरे साल के लिए उपलब्ध कराए हैं, इसमें से भी करीब 12,000 करोड़ रुपए बकाया देने में खर्च हो जाएंगे।

महीनों तक मजदूरी न देकर तैयार हुआ इतना बकाया भी सबूत है उस मानसिक प्रताड़ना का जिसे करोड़ों मनरेगा मजदूरों को झेलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अपर्याप्त फंड का हवाला देकर बेरोज़गारी भत्ता और देरी से भुगतान का तय मुआवज़ा भी नहीं दिया जा रहा है। इन सबका परिणाम ये कि मनरेगा एक्ट और उसके तहत कामगारों का मिलने वाली कानूनी सुरक्षाएं विफल साबित हो रही हैं। चेतावनी की बात तो यह है कि अगर वित्तीय आवंटन को बढ़ाया न गया तो सूखे के समय में देश में मनरेगा के विस्तार के बजाए, योजना सिमटने लगेगी।

खाना, पीने का पानी, पशुओं के लिए चारा और किसी इंसान की गरिमा को लेकर देश के करोड़ों लोगों के सामने खड़ी ये भीषण त्रासदी मान्य नहीं है। हमारी मांग है कि आपके नेतृत्व की केंद्र सरकार इन कमियों को मानें और सुधार के लिए त्वरित कदम उठाएं। त्वरित सुधार के लिए पारंपरिक सभी राहत कार्यों के साथ-साथ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एक्ट और मनरेगा को विस्तार देकर लागू किया जाना चाहिए।

नोट- प्रधानमंत्री के नाम 170 सामाजसेवियों और अर्थशास्त्रियों द्वारा हस्ताक्षरित पत्र

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