‘सैराट’: मराठी सिनेमा की अंतर्राष्ट्रीय उड़ान

‘सैराट’: मराठी सिनेमा की अंतर्राष्ट्रीय उड़ानgaon connection

हा फिलहाल में मराठी फिल्म “सैराट” ने देशभर में ही नहीं कई विदेशी फिल्मोत्सवों में भी धमाल मचा रखा है। महाराष्ट्र में फिल्म व मनोरंजन टैक्स न होने और बॉलीवुड फिल्मों के एक तिहाई टिकट दर होने के बावजूद यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नए-नए करिश्माई रेकॉर्ड बनाते हुए हिन्दी बॉलीवुड फिल्मों को भी टक्कर दे रही है और बड़ी बात यह की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली मराठी फिल्म भी बन गई है।

फिल्म की लीड रिंकू राजगुरु को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। वह सिर्फ 14 साल की है। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के अकलुज गाँव की रिंकू की किस्मत इस फिल्म ने रातोंरात बदल दी। वे अकलुज के ‘जीजामाता कन्या प्रशाला’ की स्टूडेंट है और दसवीं में पढ़ती है। हाल ही में उन्होंने 9वीं क्लास में 81% मार्क्स हासिल किए हैं। आमिर खान, सुभाष घई, रितेश देशमुख, आयुष्मान खुराना समेत कई बड़े एक्टर्स सैराट फिल्म और रिंकू की एक्टिंग की तारीफ कर चुके हैं। 

दिगदर्शक नागराज मंजुले की यह तीसरी फिल्म है। पहली शॉर्ट फिल्म ‘पिस्तुल्या’ को भी राष्ट्रीय पुरस्कार का गौरव प्राप्त हुआ था। तत्पश्चात पहली फीचर फिल्म ‘फंड्री’ ने भी 61वें राष्ट्रीय पुरस्कार को अपने नाम किया और ‘सैराट’ ने भी वही क्रम जारी रखा है। फिल्म देश की ऐसी पहली फिल्म है जिसका संगीत देश के बाहर हॉलीवुड में रिकॉर्ड हुआ है जिसका निर्देशन अजय-अतुल ने किया है। सबसे बड़ी बात फिल्म का लगभग सारा कास्ट-क्रू पहली दफा फिल्मी पर्दे पर काम कर रहा है और सभी खेत खलियान और गाँवों से ताल्लुकात रखते हैं इस कड़ी में फिल्म के लीड्स परश्या यानी की आकाश थोसर और आर्ची यानी की रिंकू राजगुरु का अभिनय सच में अप्रतिम है।

फिल्म महाराष्ट्र के सोलापुर से है, कहानी वही की है और शूट लोकेशन भी यही है। खैर... सैराट वह फ़िल्म है जिसे देखकर अपनी अन्तरात्मा थोड़ी सी रो लेती है। जीवन की इस आपा धापी में सब अपनी ज़िंदगी बेहतर बनाने में जुटे हैं लेकिन “बेहतर” का मतलब सिर्फ खोखली आधुनिकता है जो समाज में प्रतिस्पर्धी बनाने में जुट गई है। वो अपनी जात या अपनी वर्ग व्यवस्था अभी तक तोड़ नहीं पाई जो सदियों पहले से शुरू है। उस व्यवस्था में इंसानियत का दम तो घुट रहा है लेकिन भीड़ के कारण उसका शोर कहीं गूंज नहीं पाता है। हम उस समाज से ताल्लुक रखते हैं जो अपने बच्चों को शिक्षा तो आधुनिक देते है लेकिन टेक्नोलॉजी की इस दुनिया में उसे अपने धर्म और जात में जकड़कर अपने पुराने और खोखले विचारों की जंजीरों से बांध देते हैं।

ये वो समाज है जो उस फ़िल्म की संगीत की धुन पर नाच कर अपनी तसल्ली कर लेता है लेकिन बदलने का नाम नही लेता। “आर्ची” और “परश्या” उन समाज का प्रतिनिधित्व करते है जो रोज़ मर्रा की जिंदगी से थक चुके हैं फिर भी प्रेम का अहसास उनमें फूट फूट कर भरा है। तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए भी शायद ही ऐसे कम लोग होते हैं जिसके साथ उम्मीद का दामन टिका रहता है। झूठी प्रतिष्ठा उन सब पर हावी हो जाती है जिसमें उस प्रतिष्ठा को ललकारने का साहस किया है। 

रिपोर्टर :राहुल खंडालकर

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