पाई-पाई जोड़ झारखंड की इन महिला मजदूरों ने जमा किए 96 करोड़ रुपए, अब नहीं लगाती साहूकारों के चक्कर

झारखंड में मजदूरी करने वाली महिलाओं के लिए बैंक में पैसे जमा करना किसी सपने जैसा था। जब से यहां सखी मंडल की शुरुआत हुई तबसे ये महिलाएं मजदूरी करके सप्ताह में 10 रुपए बचत करने लगीं। कुछ महिलाओं से शुरू हुई इस मुहिम ने आज बदलाव की कहानी गढ़ दी है।

Neetu SinghNeetu Singh   17 July 2018 1:04 PM GMT

पाई-पाई जोड़ झारखंड की इन महिला मजदूरों ने जमा किए 96 करोड़ रुपए, अब नहीं लगाती साहूकारों के चक्कर

रांची (झारखंड)। भरी दोपहरी में लकड़ी बेचकर सात किलोमीटर पैदल चलकर आयी वनमालिन देवी भले ही बहुत मेहनत से दिन के 100 रुपए कमाकर लाई हो लेकिन वह स्वयं सहायता समूह में हफ़्ते के दस रुपए बचत करना कभी नहीं भूलती क्योंकि वह जानती है कि रोजाना 100 रुपए दिहाड़ी कमाने वाली महिला को जरूरत पड़ने पर कभी कोई उधारी नहीं देगा। वनमालिन की तरह झारखंड की 16 लाख से ज्यादा ग्रामीण महिलाएं छोटी-छोटी बचत कर रही हैं, इनके द्वारा शुरू की गयी इस छोटी सी बचत से अब इनके खाते में 96 करोड़ से ज्यादा रुपए जमा हो गये हैं।

दिन के 15 घंटे काम करने वाली वनमालिन देवी (45 वर्ष) साड़ी के आंचल से अपना पसीना पोंछते हुए कभी अपनी किस्मत को तो कभी गरीबी को कोस रही थी, "जिंदगीभर हमारी किस्मत में लकड़ी बेचना ही लिखा है, गरीबी की वजह से माँ-बाप ने पढ़ाया नहीं, कम उम्र में शादी हो गयी। रोज तीन बजे सोकर उठ जाते हैं हर दिन लकड़ी बीनने से लेकर बेचने तक आठ से 10 घंटे लग जाते हैं, 12-14 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है तब कहीं जाकर 100 से 150 रुपए की लकड़ी बिकती है।"


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वनमालिन देवी के लिए जंगल से लकड़ी बीनना कोई नया काम नहीं है। वनमालिन देवी को अब अपनी बढ़ती उम्र से भी निराशा हो रही थी उन्होंने बताया, "अब इस उम्र में लकड़ी बीनने का काम नहीं होता पर क्या करें मजबूरी है। रोज लकड़ी बेचकर पेट भरने भर का ही कमा पाते हैं। हमारे पास बचत के नाम पर समूह में हफ़्ते की 10 रुपए बचत है। अब इतनी तसल्ली है कि अगर कभी बीमार पड़ गये तो कर्ज लेने के लिए साहूकारों के आगे गिड़गिड़ाना नहीं पड़ेगा, समूह से पैसा लेकर अपनी इलाज करा सकते हैं।"

वनमालिन देवी रामगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 36 किलोमीटर दूर गोला ब्लॉक के बड़की हेसल गाँव की रहने वाली हैं, ये पहाड़ी क्षेत्र में जंगलों के बीच बसा हुआ एक गाँव है। जहां पर अधिकतर परिवारों की रोजी-रोटी का मुख्य जरिया जंगल की लकड़ी पर ही आधारित है। यहां की 65 महिलाओं से जब गाँव कनेक्शन संवाददाता ने बात की तो उनके पास अपनी तमाम परेशानियाँ थी, मुश्किलें थी, गरीबी की वजह से मूलभूत संसाधनों का अभाव था। इन सबके बावजूद इनके चेहरे पर समूह में बचत करने का एक सुकून जरुर था, इनके पास जमापूंजी के नाम पर स्वयं सहायता समूह में इनकी बचत थी।

कुंती देवी (50 वर्ष) ने खुश होकर कहा, "अब यही बचत हमारे बुढ़ापे का सहारा है। अगर समूह से न जुड़ते तो एक फूटी कौड़ी भी न जोड़ पाते। जब साहूकारों से कर्जा लेते थे अगर समय से न चुकाया तो उनकी बातें सुननी पड़ती थी, बहुत बुरा लगता था।" ये व्यथा सिर्फ वनमालिन देवी की नहीं है बल्कि यहां की 16 लाख महिलाओं की कहानी वनमालिन से मिलती जुलती ही है।

झारखंड के 24 जिलों के 217 ब्लॉक में 16 लाख 85 हजार 161 गरीब परिवारों को सखी मंडल से जोड़ा गया है। झारखंड स्टेट लाईवलीहुड प्रमोशन सोसाईटी के अनुसार इनके बचत खाते में 96 करोड़ 35 लाख रुपए जमा है। राज्य में 1 लाख 34 हजार 725 स्वयं सहायता समूह है। दीन दयाल अंत्योदय योजना के तहत राज्य में 70,321 सखी मंडलों को बैंक ऋण उपलब्ध कराया गया। सात लाख से ज्यादा परिवारों की आजीविका को सशक्त किया गया।

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झारखंड में मजदूरी करने वाली महिलाओं के लिए बैंक में पैसे जमा करना किसी सपने जैसा था। जबसे यहाँ सखी मंडल की शुरुआत हुई तबसे ये महिलाएं मजदूरी करके सप्ताह में 10 रुपए बचत करने लगीं। कुछ महिलाओं से शुरू हुई इस मुहिम ने आज बदलाव की कहानी गढ़ दी है। दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय आजीविका मिशन के जरिए देशभर में 48.8 लाख स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया। स्वयं सहायता समूह को परियोजना राशि के रूप में करीब 4,459 करोड़ रुपए दिए गये हैं। पिछले पांच वर्षों में इन समूहों को 1.57 लाख करोड़ रुपए का बैंक ऋण उपलब्ध कराया गया।

ग्रामीण विकास विभाग के विशेष सचिव एवम झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के सीईओ परितोष उपाध्याय बताते हैं, "सखी मंडल से ग्रामीण महिलाओं को जोड़ने का मुख्य उद्देश्य इनकी गरीबी दूरकर इन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त करना है। ये महिलाएं मेहनत मजदूरी करके स्वयं सहायता समूह में हफ्ते में 10 रुपए से 50 रुपए तक बचत करती हैं। इनकी छोटी-छोटी बचत से शुरू हुए इस प्रयास से आज इन महिलाओं के खातों में करोड़ों रुपए बचत के इकठ्ठा हो गये हैं।" उन्होंने आगे कहा, "इन्हें केवल बचत करना ही नहीं सिखाया जाता है बल्कि समूह से कम पैसे में लोन लेकर कैसे खुद का रोजगार शुरू करें इसके लिए भी प्रेरित किया जाता है। हर हफ़्ते इनके समूह की होने वाली बैठक में इन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जाती है, जिससे ये महिलाएं अपने हक के लिए जागरूक होकर आवाज़ उठा सकें।"


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वनमालिन की तरह रांची जिला मुख्यालय से लगभग 17 किलोमीटर दूर अनगड़ा ब्लॉक के सपारोम गाँव की रहने वाली अंजू लकड़ा (40 वर्ष) अपने ब्यूटी पॉर्लर दुकान के चबूतरे पर बैठी थी। यहाँ से गुजरने वालों के लिए महज वो एक पॉर्लर की दुकान थी। लेकिन अंजू के लिए वो उसकी जमा पूंजी थी और जीविका का साधन भी। अंजू ने कहा, "अगर आज ये दुकान न होती तो मैं आज भी कहीं ईंट गारा का काम कर रही होती। भरी दुपहरिया की मजदूरी छोड़कर दुकान खोलना हमारे लिए मुश्किल था। लेकिन समूह से कर्ज लेकर दुकान खोल ली, अब मजदूरी के लिए 10 किलोमीटर दूर नहीं जाना पड़ता है।"

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स्वयं सहायता समूह में ऐसे जुड़ती हैं महिलाएं

हर समूह में 10 से 15 महिलाएं होती हैं। इन महिलाओं को स्वयं सहायता समूह में जोड़ने के लिए झारखंड स्टेट लाईवलीहुड प्रमोशन सोसाईटी का स्टाफ़ इन्हें प्रेरित करता है। महिलाओं के इस समूह से ही किसी महिला को कोषाध्यक्ष तो किसी को सचिव बनाया जाता है। बाकी महिलाएं समूह की सदस्य होती हैं। हर हफ्ते बैठक कर ये बचत करती हैं। इनके समूह का खुद का एक बैंक खाता होता है जिसमें इनके बचत के पैसे जमा होते हैं। शुरुआत की बचत ये महिलाएं पांच या दस रुपए हफ्ते से करती हैं, कुछ साल बाद ये बचत 20-50 रुपए हफ़्ते की हो जाती है।


समूह में जुड़ने के छह महीने बाद महिला कभी भी ले सकती है कम ब्याज पर कर्ज

स्वयं सहायता समूह में जुड़ने के छह महीने बाद कोई भी महिला कभी भी समूह से कर्ज ले सकती हैं जिसमें सभी महिलाओं की सहमति जरूरी होती है। इन्हें ये कर्ज मामूली दर एक से डेढ़ प्रतिशत पर दिया जाता है। जो इनके लिए न्यूनतम दर होती है। जब ये साहूकारों से कर्ज लेती थी तो वो अपने मन के मुताबिक ब्याज लेता था।

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कर्ज लेने के लिए इन्हें अब साहूकारों के नहीं लगाने पड़ते चक्कर

जो महिलाएं जरूरत पड़ने पर कभी साहूकारों के चक्कर लगाती थी और ज्यादा ब्याज पर कर्ज लेती थी। अगर कर्ज इन्होंने समय से न वापस किया तो इन्हें साहूकार की प्रताड़ना सहनी पड़ती थी। लेकिन अब वही महिलाएं अपनी खुद की छोटी बचत से दूसरों को कर्ज देने में सक्षम हो गयी हैं। अब इन्हें साहूकारों का मनमाना कर्ज नहीं चुकाना पड़ता और न ही उनकी बंधुआ मजदूरी करनी पड़ती। सात लाख से ज्यादा परिवारों को रोजगार से जोड़ा गया है, अब इनमें से ज्यादातर महिलाएं मजदूर नहीं बल्कि सफल उद्यमी बन गयी हैं।

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