जंगल भी बन सकता है कमाई का जरिया, झारखंड की इन महिलाओं से सीखिए

जंगल से निकलने वाली जड़ी-बूटियाँ जो कल तक जंगलों में पड़े-पड़े सड़ जाती थी लेकिन आज यही औषधियां झारखंड की महिलाओं की कमाई का जरिया बन गयी हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   25 March 2019 11:45 AM GMT

लातेहार (झारखंड)। जंगलों से निकलने वाली औषधियां कैसे कमाई का जरिया बन सकती हैं अगर आपको ये देखना है तो झारखंड के जंगलों में आइये, यहाँ की महिलाओं से मिलिए। जंगलों से निकलने वाली आयुर्वेदिक औषधियां जो कल तक जंगलों में सड़ जाती थीं लेकिन आज सखी मंडल की महिलाओं के लिए ये आजीविका का साधन बन गयी हैं।

झारखंड की एक आदिवासी महिला पेड़ पर चढ़कर जंगल में बहेरा गिरा रही थी और नीचे खड़ी कई महिलाएं उसे एक जगह इकट्ठा कर रहीं थीं। झारखंड के जंगलों का ये नजारा यहाँ सामान्य देखने को मिल जाता है। पर ये नजारा हमने पहली बार देखा था। दुबली पतली तीस वर्षीय अमृता देवी अपनी साड़ी का आंचल कमर में कसे हुए बिना किसी डर के डाल हिलाकर बहेरा गिरा रही थी।

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आपको इतने ऊपर पेड़ पर डर नहीं लग रहा मेरे पूंछने पर वो हंसते हुए बोलीं, "ये हमारा रोज का काम है। हम तो पेड़ों पर बचपन से ही चढ़ते आये हैं। अगर डरेंगे तो खाएंगे क्या, इसी से तो हमारी रोजी रोटी चलती है। हम तीन चार लोग मिलकर एक साथ जंगल जाते हैं कोई पेड़ पर चढ़कर गिराता है कोई बीनता है।" उन्होंने आगे कहा, "पहले गाँव देहात की बाजारों में इन सबका ज्यादा पैसा नहीं मिलता था इसलिए हम लोग बीनते नहीं थे। पहले ये चीजें जंगल में ही सड़ जाती थीं, गाय भैस भी चर जाती थी। लेकिन उत्पादक समूह बनने के बाद एक साथ हमारे घर से ही ये अच्छे दामों में बिक जाता है।"

अमृता देवी जंगलों से घिरे लातेहार जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर मनिका प्रखंड के कुई ग्राम पंचायत की रहने वाली हैं। देश भर में चल रही महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना के तहत इस प्रखंड में 70-75 गाँव की महिलाएं आयुर्वेदिक औषधियां और सुगंधित पौधे की खेती करती हैं और उत्पादक समूह बनाकर एक साथ ये उत्पाद बाजार पहुंचाती हैं। जिससे इन्हें अच्छा भाव मिल जाता है। झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा इस परियोजना का झारखंड में क्रियान्वयन किया जा रहा है। इससे तीन लाख से ज्यादा महिलाएं लाभान्वित हो रही हैं।

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बहेरा बीन रहीं सुमन देवी (28 वर्ष) बताती हैं, "हर्र-बहेरा यहाँ हर जंगल में मिल जाएगा पर इसकी यहाँ कोई पूंछ नहीं है। अगर हम लोग पहले इसे बाजार में बेचते थे तो चार पांच रुपए किलो बहुत मुश्किल से बिकता था। जबकि बहेरा पेड़ से गिराने से लेकर सुखाने तक बहुत मेहनत पड़ती है।"

उन्होंने आगे बताया, "जबसे उत्पादक समूह बन गया है तबसे सब लोग एक साथ इसे बेचते हैं अब 10-28 रुपए तक बिक जाता है। अच्छा भाव मिलने की वजह से अब हमारा मन भी लगता है। अब ये हमारी रोजी-रोटी का मजबूत जरिया बन गया है।"

एस गाँव की 127 महिलाएं जो खेती करती हैं या फिर जंगल से जड़ी-बूटियाँ एकत्रित करती हैं इनका एक उत्पादक समूह है जिसका नाम कुई आजीविका उत्पादक समूह है। पिछले साल इस उत्पादक समूह ने लगभग 40 टन बहेरा बेचा था। इस साल 70-80 टन तक बेचने का लक्ष्य रखा है। उत्पादक समूह की महिलाएं सब्जी उत्पादन से लेकर वनोपज की बिक्री सामूहिक रूप से ही करती हैं।

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इस परियोजना के फील्ड थीमैटिक कोआर्डिनेटर सुनील वैराग्य बताते हैं, "इस जिले में 80 ग्रामीण सेवा केंद्र हैं जहाँ पर उत्पादक समूह की महिलाएं आसानी से जाकर अपने उत्पादों को एक साथ बेच सकती हैं। एक साथ थोक उत्पाद होने की वजह से इन्हें इनके उत्पाद का अच्छा पैसा मिल जाता है।" उन्होंने आगे कहा, "इन ग्रामीण सेवा केन्द्रों पर सिर्फ वनोंपज से निकलने वाले उत्पाद ही नहीं बल्कि सब्जियों को भी उत्पादक समूह की महिलाएं एक साथ बेचती हैं जिससे बीच के बिचौलिए खत्म और किसानों को उनके उत्पादों का सही भाव मिल जाता है।"

हर्र-बहेरा एकत्रित करने में इन महिलाओं को लगता है बहुत समय

जंगल में कोई भी महिला अकेले नहीं जाती है। ये महिलाएं तीन चार एक साथ समूह में जाती हैं। कुछ महिलाएं पेड़ पर चढ़ती हैं तो कुछ इसे बीनती हैं। एक महिला को एक बोरी इकट्ठा करने में तीन चार घंटे लग जाते हैं। तेतरी देवी (24 वर्ष) कहती हैं, "एक कुंतल बहेरा इकट्ठा करने में तीन चार दिन लग जाते हैं। इसे 10-15 दिन सुखाने में लग जाता है। जनवरी-फरवरी इस दो महीने में एक महिला चार से पांच कुंतल हर्र-बहेरा मिलाकर जमा कर लेती हैं इसके बाद इसकी ग्रेडिंग करके इसे ग्रामीण सेवा केंद्र पर बेच देते हैं।"

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सहबतिया देवी (33 वर्ष) उत्पादक समूह के फायदे गिनाते नहीं थकीं उन्होंने बताया, "पहले हम लोगों को पता नहीं था कि जंगलों की इन चीजों को भी कभी कोई अच्छे दामों में खरीदेगा लेकिन अब उत्पादक समूह में जुड़ने के एक साल में ही माटी मोल बीकने वाली चीजों को इतना अच्छा भाव मिला तो हम लोग खुश गये। अब ये जंगली चीजों से हमारी अच्छी आमदनी हो जाती। इसमें केवल मेहनत लगती है लागत में कोई पैसा खर्च नहीं होता।"

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