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कर्ज के चंगुल से मुक्त हो चुकी हैं ये महिलाएं, महाजन के आगे अब नहीं जोड़ने पड़ते हाथ

केसमानी की तरह झारखंड की 16 लाख से ज्यादा सुदूर गाँव की ग्रामीण और आदिवासी महिलाएं अब साहूकारों के चंगुल से मुक्त हो चुकी हैं। ये मेहनत मजदूरी करके समूह में सप्ताह के 10 रुपए बचत करती हैं, जरूरत पड़ने पर डेढ़ रुपए सैकड़ा पर कर्ज ले लेती हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   12 Sep 2018 7:31 AM GMT

कर्ज के चंगुल से मुक्त हो चुकी हैं ये महिलाएं, महाजन के आगे अब नहीं जोड़ने पड़ते हाथ

पलामू (झारखंड)। केसमानी देवी आज भी ये बताते हुए अपने आंसुओं को नहीं रोक पाईं जब उन्हें एक बार साहूकार से कर्ज लेने के लिए कितनी मिन्नतें करनी पड़ी थी तब कहीं जाकर उन्हें 10 रुपए सैकड़ा ब्याज पर कुछ रुपए मिले थे। समूह में जुड़ने के बाद अब ये शान की जिन्दगी जीती हैं क्योंकि कर्ज लेने के लिए अब इन्हें साहूकारों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते ये कर्ज के बोझ से मुक्त हो चुकी हैं।

केसमानी देवी (62 वर्ष) को आज ये भी याद नहीं है कि उनकी शादी किस उम्र में हुई थी। अपने बीते दिनों को याद करते हुए केसमानी भावुक हो जाती हैं, "कोड़ा (धान की भूसी) खाकर पेट भरते थे, चावल पर्व पर खाने के लिए बचाकर रखते थे। एक साड़ी में सात जगह कपड़ा जोड़कर तन ढका है, घर में शीशा तक नहीं था जिसमें चेहरा देख सकें। तब के जमाने में जंगल से गेठी खाकर ही पेट भरते थे।" कुछ सालों पहले तक झारखंड में ये स्थिति सिर्फ केसमानी की ही नहीं थी बल्कि इनकी तरह लाखों आदिवासी महिलाओं की जिन्दगी इनसे मिलती-जुलती थी। इन आदिवासियों की जिन्दगी सुबह से शाम तक दो जून की रोटी जुटाने में ही गुजर जाती थी।


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साड़ी के आंचल से आंसू पोछते हुए केसमानी कहने लगीं, "अब तो सब ठीक हो गया है, समूह से लोन लेकर खेत में बोरिंग करवाई। इतनी सब्जी रोज बाजार में बेच आती हूँ जिससे रोज का खर्चा आराम से चल जाए। तीन बेटियों को इंटर कराया, बेटे को मैट्रिक कराया। समूह में जुड़ने के बाद कभी हमें कर्ज लेने के लिए महाजन के आगे हाथ जोड़कर नहीं खड़ा होना पड़ा, बस यही हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी है।" केसमानी पलामू जिला मुख्यालय से सतबरवा ब्लॉक से लगभग 30 किलोमीटर दूर जोगिया पोखरी गाँव की रहने वाली हैं। केसमानी की तरह झारखंड की 16 लाख से ज्यादा सुदूर गाँव की ग्रामीण और आदिवासी महिलाएं अब साहूकारों के चंगुल से मुक्त हो चुकी हैं। ये मेहनत मजदूरी करके समूह में सप्ताह के 10 रुपए बचत करती हैं, जरूरत पड़ने पर डेढ़ रुपए सैकड़ा पर कर्ज ले लेती हैं।

महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करने के लिए दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत देशभर में 48.8 लाख स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया। स्वयं सहायता समूहों को परियोजना राशि के रूप में करीब 4,459 करोड़ रुपए दिए गये। पिछले पांच वर्षों में इन समूहों को 1.57 लाख करोड़ रुपए का बैंक ऋण उपलब्ध कराया गया। जिससे इनकी आजीविका सशक्त हो और इन्हें साहूकारों के आगे कर्ज लेने के लिए हाथ न फैलाना पड़े। केवल झारखंड में ही 15,733 गाँवों में करीब 1,32,531 सखी मंडलों का गठन कर उन्हें आजीविका के साधनो से जोड़ा गया। राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत झारखंड में 24 जिले के 215 प्रखंड के 15 लाख 96 हजार गरीब परिवारों को सखी मंडल से जोड़ा गया।

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केसमानी की तरह हसरत बानों भी महाजन से कर्ज लेने को लेकर अपना अनुभव साझा करती हैं, "महाजन और हमारे बीच में बहुत बड़ा फासला था, हम उनके बराबर बैठ नहीं सकते थे। हर बात पर उनकी जी हजूरी करनी पड़ती थी। अगर घर पर आ जाएं तो मेहमानों की तरह खातिरदारी करनी पड़ती थी। उनके सामने न तो हंस सकते थे और न ही खुलकर बोल सकते थे।" अपनी आटा चक्की मील पर तराजू पर आटा की बोरी तौलती हुई हसरत बानो (42 वर्ष) के चेहरे पर खुशी और आत्मविश्वास साफ़ तौर पर दिख रहा था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "महाजन के चंगुल से कभी छूट पाएंगे ऐसा सोचा नहीं था, समूह में जुड़ने के बाद इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि समूह से हमें इतना कर्जा मिल जाएगा जिससे हम कोई रोजगार शुरू कर सकते हैं। समूह से 40 हजार रुपए लोन लेकर ये आटा चक्की लगाई है। सात बच्चों को इसी की कमाई से पढ़ाया लिखाया है।" हसरत बानो मूल रूप से पलामू जिले के मेदिनीनगर ब्लॉक के खनवाँ गाँव की रहने वाली हैं।


झारखंड के 24 जिलों के 217 ब्लॉक में 16 लाख 85 हजार 161 गरीब परिवारों को सखी मंडल से जोड़ा गया है। झारखंड स्टेट लाईवलीहुड प्रमोशन सोसाईटी के अनुसार इनके बचत खाते में 96 करोड़ 35 लाख रुपए जमा है। राज्य में एक लाख 34 हजार 725 स्वयं सहायता समूह है। दीन दयाल अंत्योदय योजना के तहत राज्य में 70,321 सखी मंडलों को बैंक ऋण उपलब्ध कराया गया। सात लाख से ज्यादा परिवारों की आजीविका को सशक्त किया गया।

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विशेष जनजाति की मोहरमानी कुंवर (65 वर्ष) ने अपने सफेद बालों को दिखाते हुए कहा, "दूसरों की गाय चराते थे तब हमें खाना मिलता था, बीमार पड़ने पर दूसरे गाँव साहूकार से कर्ज लेने जाते तो वो घंटों इन्तजार करवाता। 10-12 रुपए ब्याज पर जो कर्ज लेते वो कभी चुका नहीं पाते इसलिए फिर उसके यहाँ काम करने लगते, जिसका हमें कोई पैसा नहीं मिलता था।" उन्होंने कहा, "समूह ने हमें इन साहूकारों से मुक्ती दे दी है, अब हम अपना काम कुछ काम करते हैं या फिर दिहाड़ी मजदूरी। अब पैसों के लिए मजदूरी करते हैं पहले कर्जा चुकाने के लिए बंधुआ मजदूरी करते।"

हसरत बानो और केसवानी की तरह झारखंड की लाखों महिलाओं के लिए महाजन के चंगुल से मुक्त होना इतना आसान नहीं था क्योंकि गरीबी की वजह से ये पीढ़ी दर पीढ़ी साहूकारों के कर्ज के बोझ तले दबे थे। एक बार कर्ज लेने के बाद इनके लिए उबरना बहुत मुश्किल था। ये ताउम्र साहूकारों के यहाँ मजदूरी करके गुजार देते। झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा जब झारखंड की महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करने के लिए स्वयं सहायता समूह में जोड़कर इन्हें बचत करना सिखाया गया तो इनका आत्मविश्वास बढ़ गया। बचत करने से शुरुआत हुई स्वयं सहायता समूह की इस पहल से इन महिलाओं ने न केवल बचत करना सीखा बल्कि साहूकारों से भी छुटकारा पा लिया।

सिर्फ साहूकारों से मुक्ति ही नहीं बल्कि रोजी रोटी का भी किया इंतजाम


समूह में जुड़ने के बाद बसंती देवी ने सिर्फ जरूरत पड़ने पर ही समूह से कर्ज नहीं लिया बल्कि अपनी आजीविका को मजबूत करने के लिए समूह से 17,000 रुपए लोन लेकर किराना की दुकान खोली। ये वर्ष 2016 में पार्वती आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ी थी। चौका बर्तन करने तक सीमित रहने वाली बसंती देवी (30 वर्ष) ने दो महीने पहले समूह से कर्ज लेकर दुकान खोल ली है जिससे हर दिन 700-1000 रुपए की बिक्री हो जाती है।

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ये बताती हैं, "अब बेटे का नाम प्राइवेट स्कूल में लिखवाया है। घर बैठे दुकान से दिन के 200-300 रुपए बच जाते हैं। धीरे-धीरे कर्जा चुका देंगे। समूह से कर्ज लेने में अपनी शान रहती है, यहाँ कर्ज लेने के लिए हाथ नहीं जोड़ने पड़ते बस समूह में अपनी बात रखनी पड़ती है, सबकी सहमति से कर्ज मिल जाता है।"

खेतों में भैस चरा रही चन्द्रकला देवी (40 वर्ष) ने भी समूह से कर्ज लेकर 35,000 रुपए की एक भैस 2016 में थी अब इनके पास तीन भैसें हो गयी हैं। खुश होकर बताती हैं, "एक दिन में 11 लीटर दूध होता है जिसे 40 रुपए लीटर बेच देते हैं। महीने में इतना पैसा घर बैठकर कमा लेते हैं जिससे महीने का खर्चा आराम से पूरा हो जाता है। दूध बेचकर कर्ज का पैसा चुका दिया और महीने के खर्च का इंतजाम भी भैस से हो गया।"

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