पांच हजार के लोन से शुरू किया मुर्गी फार्म, अब हर महीने 15 हजार की कमाई

इस महिला की देखा-देखी झारखंड के पहाड़ी इलाके में कई दूसरी महिलाओं ने मुर्गी पालन को रोजगार का जरिया बनाया है।

पांच हजार के लोन से शुरू किया मुर्गी फार्म, अब हर महीने 15 हजार की कमाई

सावित्री देवी, कम्यूनिटी जर्नलिस्ट

नागेडीह (झारखंड)। सिर्फ 5,000 रुपए का लोन लेकर शुरु किए गए मुर्गी पालन से एक महिला 15-20 हजार रुपए महीने की कमाई कर रही है। इस महिला की देखा-देखी झारखंड के पहाड़ी इलाके में कई दूसरी महिलाओं ने मुर्गी पालन को रोजगार का जरिया बनाया है।

मुर्गियां, बकरियां और भेड़ जैसे छोटे पशु झारखंड के गांवों में लगभग हर घर में नजर आएंगे। इन पशुओं की देखरेख की जिम्मेदारी घर की महिलाओं पर होती है। इन्हीं में से कुछ महिलाओं ने पशुपालन को रोगजार का जरिया बना लिया है। ऐसी ही एक महिला हैं रांची जिले के नागेडीह गांव की सुनैना देवी।


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झारखंड की राजधानी रांची से करीब 65 किलोमीटर दूर सिल्ली प्रखंड में पहाड़ों के बीच नागेडीह गांव है। इसी गांव में रहने वाली सुनैना देवी (32वर्ष) ने अपने घर के पास ही मुर्गी शेड बना रखा है, जिसमें इस वक्त 1100 चूजे हैं।

सुनैना देवी बताती हैं, "एक चूजा हम 35 रुपए का खरीदते हैं। जो 35-40 दिन में दो किलो का हो जाता है। और 100 रुपए किलो बिकता है। इस तरह अगर दाना, दवाई और बाकी चीजों को निकाल दें तो एक मुर्गे पर 100 रुपए बच जाते हैं। मुर्गी के काम से मुझे हर महीने करीब 15-20 हजार रुपए मिल जाते हैं।"

सुनैना की देखा-देखी इस गांव में 10 और महिलाओं ने ब्यॉलर (मुर्गी पालन) शुरु किया है। मुर्गी पालन से होने वाली कमाई से सुनैना ने अपने दोनों बच्चों को स्कूल भेजना शुरु किया है। लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था, कभी दो वक्त की रोटी के लिए सुनैना और उनके पति दूसरे के खेतों में मजदूरी किया करते थे। गृहस्थी चलाने के लिए वो मेहनत मजदूरी के साथ 2007 में स्वयं सहायता समूह से भी जुड़ीं। लेकिन बदलाव 2015 में शुरु हुआ जब सुनैना ने झारखंड स्टेट लाईवलीहुड प्रमोशन सोसायटी द्वारा बनाए गए समूह से जुड़ीं। सुनैना देवी के समूह का नाम झारखंड महिला समिति आमटीकरा टोला है।


सुनैना बताती हैं, "2015 में समूह से 5 हजार का लोन लिया और 300 चूजे खरीदे, जिन्हें बेचने पर 15 हजार रुपए मिले। इन चूजों से मिले पैसों से और चूजे खरीदे, इस बार 25 हजार रुपए मिले। मेरा काम चला तो समूह से 50 हजार का और लोन मिल गया, जिससे हमने से बड़ा शेड बनवाया।" समूह से मिली ट्रेनिंग का वो पूरा फायदा उठाती हैं, बड़ी मुर्गियां चूजों को नुकसान न पहुंचा दें इसलिए चूजों को साड़ी से बनाए छोटे से दरबे में रखती हैं। इन्हें मुर्गियां बेचने में दिक्कत नहीं होती हैं क्योंकि खरीददार घर तक पहुंच जाते हैं।

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झारखंड़ में ग्रामीण महिलाएं आजीविका का आधार हैं। वो घर में चूल्हा चौका से लेकर खेती के काम तक महिलाएं संभालती हैं। इन महिलाओं को आर्थिक रुप सशक्त बनाने के लिए राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत महिलाओं को सखी मंडल से जोड़कर छोटी-छोटी बचत और स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

झारखंड स्टेट लाईवलीहुड प्रमोशन सोसायटी के नॉलेज मैनेजमेंट एंड कम्यूनिकेशन सेल में प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव ज्योति रानी कुमार बताती हैं, "प्रदेश की लाखों महिलाएं सखी मंडल से जुड़कर अपनी जिंदगी को संवार रही है। ये महिलाओं को आर्थिक रुप से सशक्त करने की दिशा में छोटी-छोटी बचत से बड़ा प्रयास है।"

स्वयं सहायता समूह में 11-15 महिलाएं होती हैं। जो हर हफ्ते से 10 से 20 रुपए की बचत करती हैं। ये पैसा बैंक में जमा होता है और जरुरत के मुताबिक समूह की महिलाओं को दिया जाता है।

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सखी मंडल के काम करने के तरीके के बारे में ज्योति रानी कुमार बताती हैं," समूह जब तीन महीने पुराना हो जाता है तो रिवाल्विंग फंड (चक्रिय निधि) के 15 हजार रुपए मिलते हैं। छह महीने बाद सामुदायिक निवेश के 50 से 75 हजार रुपए मिलते हैं। इसी फंड से महिलाएं लोन के तौर पर पैसे लेती हैं। जिसका ब्याज मात्र 1 से डेढ़ फीसदी होता है।' वो आगे बताती हैं क्योंकि बकरी और मुर्गी पालन के पैसे दिलाने के साथ ही इन्हें सही पालन-पोषण और टीकाकरण की ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे इनकी कई मुश्किलें आसान हो गई हैं।

झारखंड में बकरी और मुर्गियों को एटीएम कहा जाता है, महिलाओं के मुताबिक जब उन्हें पैसे की जरुरत होती है उसे बेच देती हैं।

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