इन महिलाओं के हाथ का हुनर ऐसा कि बोल उठती हैं लकड़ियां

कोई महिला लकड़ी की लम्बाई नाप रही होती है तो कोई उसे अपने हाथों के हुनर से आकार दे रही होती है। दिनभर की मेहनत के बाद ये कभी लकड़ी से किसी की तस्वीर को उकेर देती हैं तो कभी दरवाजे पर लगने वाली नेमप्लेट बना देती हैं।

रामगढ़ (झारखंड)। झारखंड की आदिवासी महिलाएं अपने हाथ के हुनर से लकड़ियों को आकार देकर सजावट के कई सामान बना रहीं हैं। जो इनकी आजीविका का एक माध्यम बन गया है।

लकड़ी से नेमप्लेट बना रही गौसिया खातून बताती हैं, "सोचा नहीं था कि हम भी लकड़ियों से इतना अच्छा सामान बना लेंगे। ट्रेनिंग लेने के बाद पांच-छह महीने से बना रही हूँ। अपने हाथों से बना सामान देखकर बड़ी खुशी होती है।" गौसिया की तरह इस 'समृद्ध सखी केंद्र' पर 10 महिलाएं लकड़ियों को आकृति देने से लेकर मार्केटिंग तक का काम खुद सम्भालती हैं। इन्हें अपने बनाए प्रोडक्ट जहाँ भी बेचने को मिलते हैं ये वहां जाकर खुद ही बेचती हैं जिससे इनका आत्मविश्वास बढ़ रहा है और आमदनी भी बेहतर हो रही है।



रामगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर पतरातू ब्लॉक के तालाटाड़ गाँव में चल रहे 'समृद्ध सखी केंद्र' पर सुबह से शाम तक महिलाएं वुडेन क्राफ्ट का सामान बनाती नजर आती हैं। कोई महिला लकड़ी की लम्बाई नाप रही होती है तो कोई उसे अपने हाथों के हुनर से आकार दे रही होती है। दिनभर की मेहनत के बाद ये कभी लकड़ी से किसी की तस्वीर को उकेर देती हैं तो कभी दरवाजे पर लगने वाली नेमप्लेट बना देती हैं। घर के सजावट से लेकर ये इन लकड़ियों से बच्चों के खिलौने सबकुछ डिजायन करते हैं।

झारखंड में आदिवासी महिलाओं को वुडेन क्राफ्ट ट्रेनिंग का काम झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी सखी मंडल की महिलाओं को प्रशिक्षित करवा रही है। ये काम पीपल ट्री नाम की एक संस्था कर रही है। इस संस्था के संयोजक उत्पल साहू बताते हैं, "तीन साल से ज्यादा आदिवासी महिलाओं को प्रशिक्षित करने का काम कर रहा हूँ। ये महिलाएं डिजाइनिंग से लेकर मार्केटिंग तक का काम खुद सम्भालती हैं। हम इन्हें रॉ मटेरियल देते हैं जिससे ये विभिन्न डिजायन के कई सामान तैयार करती हैं।"


वुडेन क्राफ्ट से सामान बनाने का काम अभी झारखंड के तीन जिलों में पायलट के तौर पर शुरू हुआ है जिसमें पूर्वी सिंहभूम, गिरीडीह, रामगढ़ शामिल हैं। जल्द ही ये काम दूसरे जिलों में भी शुरू होगा। एक केंद्र पर सखी मंडल से जुड़ी 30-40 महिलाओं को 10 दिन का आवासीय प्रशिक्षण देकर उन्हें लकड़ियों से कई तरह के सामान बनाना सिखाया जाता है। प्रशिक्षण के बाद 10-12 महिलाएं ऐसी निकलकर आती हैं जिनका इस काम में बहुत मन लग जाता है। शुरुआत में इन्हें इनके काम के हिसाब से 2000-10,000 तक पैसा मिलता है।

हथौड़े से लकड़ी पर कील ठोककर नेम प्लेट बना रही पूजा देवी (22 वर्ष) मुस्कुराते हुए बता रही थी, "पहले इतनी जानकारी नहीं थी कि इन लकड़ियों से इतना अच्छा सामान भी बन सकता है लेकिन सीखने के बाद अब खुद बनाते हैं तो कई बार अपना बनाया सामान देखकर भरोसा नहीं होता कि इसे हमने ही बनाया है।"


ट्रेनिंग दे रहीं मालती बताती हैं, "ये वो महिलाएं हैं जो पहले घर में रहती थी या फिर मेहनत मजदूरी करके अपना गुजारा करती थी लेकिन अब इस सेंटर पर आकर इन्हें रोजगार का एक जरिया मिला है। यहीं पास में पतरातू डैम पर हर शाम कोई भी एक दीदी जाकर वुडेन से बने सामान बेच आती हैं जिससे 2000 से 3000 की आमदनी रोजाना हो जाती है।" वो आगे बताती हैं, "ये अभी कोई बहुत बड़ा बिजनेस नहीं है बस ये ग्रामीण महिलाओं का हुनर है जिसे हम तरास रहे हैं।"

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