इस प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई के साथ बच्चे सीख रहे बचत का पाठ

सोनभद्र के राबर्ट्सगंज ब्लॉक के उरमौरा प्राथमिक विद्यालय में बच्चों को पढ़ाई के साथ बचत का पाठ भी पढ़ाया जाता है। विद्यालय प्रबंधन समिति और प्रधान प्रतिनिधि के सहयोग से आगे बढ़ रहे बच्चे...

इस प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई के साथ बच्चे सीख रहे बचत का पाठ

राबर्ट्सगंज (सोनभद्र)। "हम हर हफ्ते स्कूल के मिनी बैंक में पैसा जमा करते हैं, जब यहां से निकलेंगे तो एक साथ ढेर सारे पैसे मिल जाएंगे। उससे आगे की पढ़ाई करेंगे।" पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली सुषमा बड़े गर्व से बात बताती हैं। सुषमा की तरह ही स्कूल के अन्य बच्चे भी पैसे जमा करके बचत करना सीख रहे हैं।


सोनभद्र के राबर्ट्सगंज ब्लॉक के उरमौरा प्राथमिक विद्यालय में बच्चों को पढ़ाई के साथ बचत का पाठ भी पढ़ाया जाता है। प्रधानाध्यापिका इशरतजहां बताती हैं, "हम पढ़ाई के साथ बच्चों को बचत करना भी सिखाते हैं कि कैसे एक-एक रुपया जोड़कर वे पैसे का सही इस्तेमाल कर सकते हैं। जब भी बच्चों को कोई जरूरत होती है पैसे ले जाते हैं। कई बार तो जरूरत पड़ने पर अभिभावक भी पैसे ले गए हैं।"

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एक समय था जब इस विद्यालय में नाम मात्र के नामांकन थे, कई बार कहने पर भी लोग यहां बच्चों का दाखिला नहीं करवा रहे थे। लेकिन विद्यालय प्रबंधन समिति के सदस्यों और प्रधान प्रतिनिधि के प्रयासों से हालात बदले और बच्चों की संख्या बढ़ने लगी।

इस स्कूल में हमारे बच्चे ही तो पढ़ते हैं तो ऐसे में जिम्मेदारी बनती है कि हम स्कूल की मदद करें, अध्यापकों के सहयोग से ही ये संभव हो पाता है।
अब्दुल कलाम, अध्यक्ष, विद्यालय प्रबंधन समिति

मिनी बैंक में जमा होते हैं पैसे

स्कूल में मिनी बैंक (गुल्लक) भी रखा गया है। स्कूल का जो बच्चा जितना पैसा जमा करता है उसे एक रजिस्टर में तारीख और नाम के साथ लिख दिया जाता है। सहायक अध्यापिका मंजीरा रजत बताती हैं, "बच्चे पैसे की बचत करना सीख गए है। जो भी पैसा उन्हें मिलता है वे सीधे स्कूल लेकर आते हैं और नाम लिखाकर जमा कर देते हैं।"

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घर-घर जाकर बुलाते हैं बच्चों को

प्रधानाध्यापिका, एसएमसी सदस्य और प्रधान प्रतिनिधि घर-घर जाकर अभिभावकों से संपर्क करते हैं। जिनके बच्चे स्कूल नहीं आते हैं उन्हें समझाते हैं। प्रधान प्रतिनिधि मुकेश कुमार कहते हैं, "मैं इसी विद्यालय से पढ़ा हूं। यही वजह है कि यहां से खास लगाव है। मेरी पूरी कोशिश रहती है कि स्कूल के लिए कुछ न कुछ करूं। हम समय निकालकर बच्चों के घर भी जाते हैं।"


अध्यापकों की कमी पूरी की

विद्यालय में एक प्रधानाध्यापिका और सिर्फ एक सहायक अध्यापक होने से बच्चों की पढ़ाई का काफी नुकसान होता था। बच्चों की शिक्षा में कोई रुकावट न आए इसके लिए प्रधान और प्रधानाध्यापिका ने मिलकर एक प्राइवेट टीचर रखा। प्रधानाध्यापिका इशरतजहां बताती हैं, 'हम दो लोग ही थे स्कूल में और बच्चे 150 से ज्यादा। इतने बच्चों को पढ़ाना संभव नहीं था। ऐसे में हमने प्रधान प्रतिनिधि से बात की, उनके सहयोग से हमें एक टीचर मिल गया है।

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प्रधान प्रतिनिधि कहते हैं, "आगे हम ऐसे लोगों से भी सहयोग लेने वाले हैं जो रिटायर हो गए हैं और घर पर खाली रहते हैं। कई लोगों से बात भी हो गई है। बारी-बारी से ये लोग स्कूल आकर एक घंटा बच्चों के लिए निकालेंगे, जिससे बच्चों को कुछ सीखने को मिले।"

एसएमसी अध्यक्ष अपने ऑटो से बच्चों को लाते हैं स्कूल

विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष अब्दुल कलाम अपने ऑटो से अपने बच्चों के साथ गाँव के दूसरे बच्चों को भी स्कूल तक छोड़ने आते हैं। वह बताते हैं, "सबने कुछ सोच-समझकर ही मुझे एसएमसी का अध्यक्ष बनाया तो मेरी भी कुछ जिम्मेदारी बनती है। मैं ऑटो चलाता हूं। मेरी बस यही कोशिश है कि गाँव के बच्चे पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करें।"

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