बहुत खास है ये प्राथमिक विद्यालय, अंग्रेजी हो या संस्कृत बच्चे सब में हैं आगे

उन्नाव सोहरामऊ प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापिका की कोशिशें रंग लाईं, चार गुना से ज्यादा हुए बच्चे

Divendra SinghDivendra Singh   10 Feb 2019 2:37 AM GMT

बहुत खास है ये प्राथमिक विद्यालय, अंग्रेजी हो या संस्कृत बच्चे सब में हैं आगे

सोहरामऊ (उन्नाव)। सरकारी स्कूलों के बच्चों में भी न सिर्फ अंग्रेजी को लेकर हिचकिचाहट खत्म हो रही है बल्कि वह अंग्रेजी बोलने भी लगे हैं। इसकी झलक दिखती है, उन्नाव जिले के एक प्राथमिक विद्यालय में। यहां बच्चे तीन साल पहले से ही अंग्रेजी अच्छी तरह से पढ़-समझ रहे हैं। बच्चे अंग्रेजी में तो आगे हैं ही साथ ही संस्कृत की अच्छी समझ भी रखते हैं। स्कूल में सप्ताह के अलग-अलग दिनों में अंग्रेजी, संस्कृत में प्रार्थना कराई जाती है ताकि उन्हें भाषा का ज्ञान और अच्छे से हो सके।

यहां बात हो रही है उन्नाव जिले के सोहरामऊ प्राथमिक विद्यालय की जहां पर प्रधानाध्यापिका स्नेहिल पांडेय के प्रयासों से स्कूल की तस्वीर बदल गई है। स्नेहिल पांडेय बताती हैं, "साल 2015 में जब मेरी यहां नियुक्ति हुई तो विद्यालय की स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन आज तस्वीर बदल गई है। बच्चों की संख्या पहले जहां 60 हुआ करती थी आज बढ़कर 288 पहुंच गई है।"


वह आगे बताती हैं, "जब विद्यालय अंग्रेजी माध्यम हुआ तब मुझे मिलाकर तीन अध्यापकों की नियुक्ति हुई, जो अभी तक तीन ही है। मैं गर्व से कह सकती हूं कि मेरा स्कूल दूसरे स्कूल से बेहतर है, तभी तो हमारे स्कूल को राज्य स्तरीय पुरस्कार भी मिल चुका है।"

स्पेशल 49 में स्पेशल बच्चे

प्राथमिक स्कूल सोहरामऊ में बच्चों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। पढ़ाई में कमजोर बच्चे, ठीक-ठाक पढ़ाई करने वाले बच्चे और अच्छी पढ़ाई करने वाले बच्चों को 'स्पेशल 49' कहकर संबोधित किIया जाता है। इस ग्रुप में 49 ऐसे बच्चे रखे गए हैं जो अंग्रेजी में बात कर सकते हैं, देश के सभी राज्यों की राजधानी जानते हैं, उन्हें गणित के स्क्वायर तक याद हैं। यही नहीं उन्हें विभिन्न देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपतियों के नाम भी मुंहजुबानी याद है।


स्नेहिल बताती हैं, "साल 2015 में मैंने एक इनोवेशन किया। एक से कक्षा पांच के तेज 49 बच्चों को छांटकर स्पेशल 49 नाम से अलग से ग्रुप बनाया। इसके पीछे कारण था। हम तीन ही टीचर हैं और जिम्मेदारी काफी थी। ऐसे ग्रुप बनाने का फायदा यह हुआ कि हम बच्चों की जरूरत और उनकी समझ के अनुसार पढ़ा पाने में कामयाब हुए।

स्कूल में की कई शुरुआत

बच्चों को बेहतर शिक्षा के देने के लिए स्नेहिल हमेशा कुछ न कुछ नया करती रहती हैं। वह बताती हैं, "बच्चों को ग्रुप में बांटने के बाद हमने एक नई चीज शुरू की। स्कूल में ज्यादातर बच्चे ऐसे परिवेश से आते हैं जहां अंग्रेजी तो दूर ज्यादातर लोग पढ़े लिखे भी नही हैं। हमने बच्चों को सिखाने के लिए एक अनोखी पहल की शुरुआत की। हम स्कूल की हर एक चीज जैसे फ्लावर पॉट, साइकिल लेन, बेंच, डेस्क, दीवार जैसी जगहों पर अंग्रेजी में उनका नाम लिखकर चिपका देते हैं, जिससे बच्चे आते-जाते, उठते बैठते उनको देखेंगे तो समझेंगे। इस एक्टिविटी का हमने नाम रखा 'टच द स्लिप मेक द क्लिप'। इसका यह फायदा हुआ कि बच्चे आते-जाते इनको पढ़ते हैं। उन्हें शब्द और उसकी स्पेलिंग भी याद हो जाती है। यह एक्टिविटी काफी फायदेमंद साबित हो रही है। "


खुद से बांटे थे स्वेटर, रंगी थीं दीवारें

पहले स्कूलों में स्वेटर नहीं मिलते थे, तब मैंने अपनी तरफ से बच्चों को स्वेटर बांटे थे। उस दौरान एक और चीज मैंने नई की थी, जिसकी काफी आलोचना भी हुई थी। आज ज्यादातर स्कूलों की दीवारें रंगीन हैं, मैंने उस समय अपने स्कूल में पेंटिग कराई। मैंने खुद से स्कूल को पेंट किया था लेकिन उस वक्त लोगों को यह पहल ज्यादा रास नहीं आई थी।

विद्यालय प्रबंधन समिति की अध्यक्ष भी पढ़ाती हैं स्कूल में

स्नेहिल बताती हैं, "समय के साथ बच्चों की संख्या बढ़ती गई, ऐसे में तीन टीचरों के लिए इतने बच्चों को पढ़ा पाना आसान नहीं था। इसके लिए मैंने खुद से एक महिला टीचर को रखा, अब अच्छे से बच्चों की पढ़ाई भी मैनेज हो रही है। साल 2015 से वह पढ़ा रही हैं और उनके खुद के भी दो बच्चे यहां पढ़ रहे हैं। लक्ष्मी साहू को हमने इस बार विद्यालय प्रबंधन समिति का अध्यक्ष भी बनाया है। लक्ष्मी की वजह से बहुत मदद भी मिली है।


विद्यालय प्रबंधन समिति की अध्यक्ष लक्ष्मी साहू कहती हैं, "मैडम जी ने कई साल पहले मुझे यहां पढ़ाने का मौका दिया, अब तो मैं विद्यालय प्रबंधन समिति की अध्यक्ष भी बना दी गईं हूं। बच्चों को पढ़ता और बढ़ता देखा काफी सुकून महसूस होता है। "

अभिभावक समझ रहे हैं अपनी जिम्मेदारी

पहले अभिभावक ध्यान नहीं देते थे, बच्चों की पढ़ाई में उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखती थी। लेकिन अब अभिभावकों को अपनी जिम्मेदारी समझ में आ रही है। एक बार कहने पर ही अभिभावक स्कूल आ जाते हैं। बच्चों के लिए शिक्षा कितनी जरूरी है उन्हें अब इस बात का अहसास हो गया है।

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