बच्चों को समझने के लिए इस प्रधानाध्यापिका ने सीखी अवधी

प्रधानाध्यापिका की कोशिशों से अयोध्या के मसौधा ब्लॉक के उसरू गाँव के मॉडल इंग्लिश स्कूल को मिली अलग पहचान

बच्चों को समझने के लिए इस प्रधानाध्यापिका ने सीखी अवधी

अयोध्या। एक शिक्षिका की लगन सैकड़ों बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लेकर आई है। अपने जुझारूपन से स्कूल में बदलाव लाने के साथ-साथ उन्होंने बच्चों के बोलचाल, अनुशासन और व्यक्तित्व पर भी काफी काम किया है। इतना ही नहीं बच्चों को सही ढंग से समझने के लिए अवधी भाषा भी सीखी। यहां बात हो रही है उसरू गाँव के प्राथमिक विद्यालय की प्रधानाध्यापिका रितु जमाल की।

अयोध्या जिला मुख्यालय के मसौधा ब्लॉक के उसरू गाँव का यह विद्यालय मॉडल इंग्लिश स्कूल के नाम से जाना जाता है। पिछली सरकार ने प्रदेश के हर जिले में दो इंग्लिश मीडियम स्कूल खोलने की मुहिम शुरू की थी। उसी क्रम में अप्रैल 2015 में उसरू के इस प्राथमिक स्कूल को इंग्लिश मीडियम स्कूल का दर्जा मिला।


स्कूल की प्रधानाध्यापिका रितु जमाल बताती हैं, "मेरी हमेशा से यही कोशिश रही है कि अभिभावक अपने बच्चों को मजबूरी में सरकारी स्कूल न भेजें। उन्हें यह अफसोस न रहे कि पैसे की किल्लत की वजह से उन्हें बच्चों की पढ़ाई से समझौता करना पड़ रहा है। वे बच्चों को स्कूल भेजें तो इस सोच के साथ कि यहां अच्छी पढ़ाई होती है और कॉन्वेंट जैसा माहौल भी है।"

वह कहती हैं, "हम यह दावा नहीं करते हैं कि हमारे स्कूल के बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं, हां इतना जरूर है कि वे परिचय और सामान्य बोलचाल की अंग्रेजी बखूबी बोल लेते हैं। उनमें अंग्रेजी भाषा की इतनी समझ है कि किसी कॉन्वेंट स्कूल के बच्चे से बात करने में हिचकते नहीं।"

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रितु का ग्रामीण परिवेश से कभी कोई संबंध नहीं रहा। मूल रूप से बेंगलुरु की रहने वाली रितु की पढ़ाई हमेशा बड़े शहरों में हुई और उन्होंने बड़े कॉन्वेंट स्कूलों में ही पढ़ाया। जब साल 2006 में सेलेक्शन सरकारी स्कूल के प्राथमिक पाठशाला में हुआ तब उन्होंने पहली बार गाँव देखा।


रितु जमाल बताती हैं, "बच्चे पढ़ाई करने किस स्थिति में आते हैं इस बात से मैं पहली बार रूबरू हुई थी। कोई बगैर चप्पल तो किसी की शर्ट के बटन खुले हुए। किसी के बाल बिखरे तो किसी के जूते मिट्टी से सने। मैं जिस परिवेश से आई थी उसके बाद प्राथमिक पाठशाला में पढ़ाना बहुत मुश्किल था। तत्कालीन प्रधानाध्यापिका ने मुझसे यहां तक कहा कि तुम्हें शहर लौट जाना चाहिए। इन बच्चों को पढ़ाना तुम्हारे बस की बात नहीं।"

रितु को उनकी ये बात परेशान करने लगी, तभी उन्होंने ठान लिया कि कुछ भी हो जाए अब वह वापस नहीं जाएंगी। उन्होंने सोचा बच्चों की बातों को समझना है तो उनकी बोली और भाषा भी समझनी होगी। यही सोचकर उन्होंने अवधी सीखने की ठानी। पांच से छह महीने में रितु को अवधी आ गई।

साल 2011 में रितु का ट्रांसफर मिल्कीपुर स्कूल में हो गया जहां सिर्फ नई बिल्डिंग थी पूरा स्कूल उन्हें ही चलाना था। रितु बताती हैं, "इस स्कूल में मुझे सबकुछ खुद ही करना था, तीन साल में ये स्कूल मॉडल स्कूल बन गया, इससे हमारा उत्साह बढ़ा। ढाई साल पहले हमारा सेलेक्शन उसरू इंग्लिश मीडियम स्कूल में हो गया, आज ये भी मॉडल स्कूल बन गया है।"

जब रितु का यहां सलेक्शन हुआ था उस समय 20-25 बच्चे ही आते थे। आज प्रतिदिन 95 फीसदी उपस्थिति रहती है। पढ़ाई की स्तर सुधरा तो अभिभावक भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे। रितु के साथ ही विद्यालय में चार और अध्यापकों की नियुक्त हैं।

ये हैं स्कूल की विशेषताएं

-स्कूल में कोर्स को रटाने का प्रयास नहीं किया जाता है। रोचक ढंग से पढ़ाई को आसान किया जाए इसके लिए कई एक्टिविटी करवाई जाती हैं।

-शनिवार को 'नो बैग डे' रहता है। इस दिन बच्चे खुलकर अपने मन की बात करते हैं। वेस्ट मटेरियल से उपयोगी वस्तुएं बनाते हैं।

-समय-समय पर सांस्कृतिक गतिविधियां करायीं जाती हैं। सभी त्योहार भी मनाए जाते हैं।

-बच्चों के बैठने और जरूरत के फर्नीचर मौजद हैं। बच्चे आईकार्ड लगाकर स्कूल आते हैं। ये बच्चे समय-समय पर कॉन्वेंट स्कूल में विजिट करने जाते हैं।

अयोध्या जिले में विद्यालयों की संख्या

प्राथमिक विद्यालय - 1523

पूर्व माध्यमिक विद्यालय - ५६६

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