इन महिलाओं की बदौलत घर-घर पहुंच रहे बैंक, इमरजेंसी में 24 घंटे पैसे निकाल देती हैं ATM दीदी

बैंक से लेनदेन करने के लिए आप बैंक या एटीएम तक जाते हैं कई बार लाइन लगाते हैं...लेकिन देश के कई इलाकों में बैंक खुद चलकर आपके घर आ जाता है... यानि दौड़भाग खत्म, और फायदे तो गिनते रह जाएंगे..

इन महिलाओं की बदौलत घर-घर पहुंच रहे बैंक, इमरजेंसी में 24 घंटे पैसे निकाल देती हैं ATM दीदी

रांची। बैंक जाने के नाम से खौफ खाने वाली तमाम महिलाओं के लिए राहत बनकर आयीं हैं यहाँ की बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट सखी। इनके पास एक ऐसा बैंक है जो इन्हीं के बीच रहता है और इनके लिए हर वक्त खुला रहता। ना लाइन लगने का झंझट और ना ही किसी फॉर्म की ज़रूरत। बस आधार नंबर बताया और अंगूठा लगाया इनका काम झट से हो जाता है।

झारखंड जैसे भागौलिक परिस्थिती वाले इलाके में बैंक तक जाना टेढी खीर है। पहाड़ी और दुर्गम इलाकों से बैंक तक पहुंचने में काफी समय लग जाता है। कई बार तो सिर्फ कुछ पैसों और मनरेगा की मजदूरी निकालने में ही लोगों का पूरा दिन चला जाता है। अगर सर्वर डाउन हुआ तो एक काम के लिए कई दिन बैंक भागना पड़ता है।

लेकिन पूर्वी सिंहभूम जिले के चंदारी गांव में पिछले काफी समय से ग्रामीणों को ऐसी दिक्कतें नहीं हो रहीं हैं। लीना महतो के हाथ में आई इस छोटी सी मशीन ने ग्रामीणों के चेहरे पर खुशी ला दी है। कई बार तो लीना के सुबह उठने से पहले ही घर के बाहर लाइन लग जाती है और फिर चालू हो जाता है लीना का बैंक। लीना सखी मंडल से जुड़ी एक ग्रामीण महिला हैं और यहाँ की बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट सखी भी।

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लीना अपना माइक्रो एटीएम पोर्टेबल मशीन दिखाते हुए बताती हैं, "इस मशीन से सबका खाता खोलती हूँ। पैसे का जमा निकासी करती हूँ। मोबाईल रिचार्ज, बिजली बिल, डीटीएच रिचार्ज सब इसी से हो जाता है। जो बुजुर्ग और दिव्यांग चल फिर नहीं पाते जब उन्हें पैसा निकालना होता है हमें खबर कर देते हैं।" वो हंसते हुए कहती हैं, "जब पहली बार इस मशीन पर फिंगर प्रिंट कर रहे थे तब मेरे हाथ काँप रहे थे लेकिन अब तो सब कुछ करने लगी हूँ। पहले हमारे पहचान केवल घर तक थी लेकिन अब पूरा पंचायत हमें जानता है।"

लीना महतो की तरह झारखंड में 950 बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट सखी गांव-गांव तक बैंक की सुविधाएं पहुंचाने और वित्तीय समावेशन की मुहिम को गति दे रही हैं। इसके लिए झारखंड स्टेट लाईवलीवुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा सखी मंडल की कुछ महिलाओं को प्रशिक्षित कर इन्हें ये जिम्मेदारी सौंपी गयी है। इस पोर्टेबल मशीन के जरिए घर बैठे एक क्लिक में ही ग्रामीणों को अपनी पेंशन, छात्रवृत्ति, मजदूरी का पैसा, सरकारी सब्सिडी, आवास योजना में आयी राशि की जानकारी या पैसा तुरंत मिल जाता है।

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मेलून खातून (50 वर्ष) बताती हैं, "बैंक दीदी की वजह से विधवा पेंशन घर बैठे मिल जाती है।"

एक बिजनेस कॉरेस्पॉन्डेंट सखी जितना ज्यादा ट्रांजेक्शन करती है उतना ज्यादा उसे बैंक से कमीशन मिलता है। ये अपने काम के हिसाब से महीने का 3,000 से लेकर 25,000 तक कमा लेती हैं। इनकी मदद से ग्रामीणों की न केवल मुश्किल आसान हुई है बल्कि ये आर्थिक रूप से सशक्त भी हुई हैं।

राज्य में सखी मंडल से जुड़ी महिलाएं दो तरह से बैंकिंग सेवाएं दे रही हैं। एक बिजनेस कॉरेस्पॉन्डेंट सखी के रूप में जो गाँव में रहकर घर-घर जाकर पोर्टेबल मशीन के जरिए फटाफट पैसों का जमा निकासी कर देती हैं वहीं दूसरी तरफ बैंक सखी। अगर किसी महिला को बैंक में जाकर खाता खुलवाना हो या फिर समूह में लोन पास करवाना हो तो बैंक सखी बैंक में रहकर इनकी पूरी मदद करती है।

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बैंक जाने में अब ग्रामीण महिलाओं को नहीं होती झिझक

झारखंड की किसी ग्रामीण महिला को बैंक जाने से पहले अब ये घबराहट नहीं होती कि वो पढ़ी-लिखी नहीं है तो उसका बैंक में फॉर्म कौन भरकर जमा करेगा। इनकी मदद के लिए बैंक शाखा में बैंक सखी हमेशा मौजूद रहती हैं। राज्य में इनकी संख्या 1,000 से ज्यादा है।

रांची जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर सिल्ली ब्लॉक के पतरहातू गाँव में बैंक सखी के रूप में काम कर रही उषा देवी (43 वर्ष) बताती हैं, "बैंक में पूरे दिन रहती हूँ। समूह की दीदी का कोई भी काम होता है तुरंत करती हूँ। दिन का 75 रुपए ही मिलता है लेकिन मैं बहुत खुश रहती हूँ। क्योंकि इसी बहाने कई दीदियों की मदद कर पाती हूँ।"


वहीं बाला खातून (40 वर्ष) कहती हैं, "हम पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन बैंक सखी होने से हमारा पूरा काम हो जाता है।" कुछ साल पहले तक इन महिलाओं का बैंक से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन ग्रामीण विकास विभाग की योजनाओं के चलते गांव अब तेजी से बदल रहे हैं। सखी मंडल के जरिए महिलाएं रोजगार के अलग-अलग साधनों से जुड़ रही हैं। अब इन समूहों के बैंक में करोड़ों रुपए की जमा राशि है। सही समय पर लोन वापसी करने की वजह से अब बैंक से इन्हें आसानी से लोन मिल जाता है।

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पाकुड़ जिले के बैंक योजनाओं के सलाहकार कुंदन कापरी कहते हैं, "हर पंचायत में समूह की एक दीदी का चयन किया गया है। पंचायत में एक जगह माइक्रो एटीएम पॉइंट बनाया गया हैं जहाँ ये दीदी बैठती हैं। बैंक एक निश्चित समय पर खुलता है लेकिन ये दीदी सुबह छह बजे हों या रात के 10 बजे हों जरूरत पड़ने पर किसी भी समय पैसे निकालकर दे देती हैं।" वो आगे बताते हैं, "ये सिर्फ पैसों के लेनदेन तक ही सीमित नहीं है बल्कि किसी भी तरह का भुगतान, डीटीएच रिचार्ज, फिक्स डिपाजिट यहाँ सब काम हो जाते हैं।"


काम से मिली इन्हें नाम की पहचान

पूर्वी सिंहभूम जिले की लीना महतो की तरह पाकुड़ जिले में लिट्टीपाड़ा ब्लॉक की शाइस्ता खातून भी ग्रामीण क्षेत्रों में एटीएम दीदी के नाम से जानी जाती हैं। शाइस्ता की माने तो हाथ में आई इस (माइक्रो एटीएम पोर्टेबल मशीन) मशीन ने न सिर्फ उनको पहचान दी है बल्कि कमाई का एक जरिया भी बना है। वो आत्मविश्वास के साथ बताती हैं, "पहले घर से बाहर निकलने में झिझक होती थी लेकिन अब पूरी पंचायत में घर-घर जाते हैं। बहुत कुछ सीखने को मिला है। अब लोगों से बात करने में झिझक नहीं होती है।"

एक बिजनेस करेस्पांडेंट सखी दिन में 60-70 हजार रुपए का ट्रांजेक्शन करती है। महीने का ट्रांजेक्शन 4-5 लाख रुपए तक पहुंच जाता है। इस लेनदेन के बदले उन्हें बैंक से कमीशन के रुप में 4-5 हजार रुपए मिलते हैं। लीना के मुताबिक तब ये खुशी और दोगुनी हो जाती है जब उन्हें लोगों की दुवाओं के साथ आर्थिक लाभ भी होता है।

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आंकड़े दे रहे गवाही

झारखंड में 1217 बैंक की शाखाओं के साथ चल रहा काम

प्रदेश में हैं 950 बिजनेस करेस्पांडेंट सखी जो गाँव में रहकर दे रहीं सेवाएं

एक एटीएम दीदी 04-05 लाख रुपए का प्रति माह करती है ट्राजेक्शन।

3200 गांवों के 27000 समूहों को हो रहा है सीधा लाभ

1007 बैंक सखी जो बैंक में बैठकर सभी वित्तीय समावेशन को प्रदेश में दे रही हैं रफ्तार


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