कोई आँखों से देख नहीं सकता तो कोई चलने में है असमर्थ... लेकिन दूसरों के लिए हैं ये उदाहरण

कोई दोनों आंखों से देख नहीं सकता तो कोई चलने में असमर्थ है पर इन्होंने अपनी दिव्यांगता को बाधा नहीं बनने दिया। स्वयं सहायता समूह से जुड़कर इनकी आजीविका सशक्त हुई है।

रांची (झारखंड)। किसी को दोनों आँखों से दिखाई नहीं पड़ता तो कोई चलने में है असमर्थ...लेकिन इनका हौसला ऐसा जो हर किसी के लिए उदाहरण है। इन 10 दिव्यांग मित्रों ने स्वयं सहायता समूह में जुड़कर बदलाव की वो कहानी लिख दी है जो हर किसी के लिए प्रेरणा है। ये 50 से 100 फीसदी दिव्यांग होने के बावजूद राशन वितरण प्रणाली का बेहतर तरीके से संचालन कर रहे हैं।

"जब आँखों से दिखाई नहीं पड़ता तो मन बहुत घबराता है। मेला की जब लोग बात करते हैं तो मेरा मन भी भीड़ देखने का करता है। जब दिखाई नहीं पड़ता तो कहीं घूमने जाने का भी कोई मतलब नहीं। पर अब इन साथियों की मदद से जिन्दगी आसान हो गयी है।" ये बताते हुए समूह के अध्यक्ष रामेश्वर महतो (42 वर्ष) के चेहरे पर आज भी उदासी थी। पर उनके लहजे में आत्मविश्वास था, "समूह में जुड़ने के बाद हमारे साथी मित्र हमारा हाथ पकड़कर एक जगह से दूसरे जगह ले जाते हैं। इन मित्रों की वजह से कहीं आने-जाने के लिए सोचना नहीं पड़ता। अब तो राशन कोटा भी संभालने की जिम्मेदारी मिल गयी है।"

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रामेश्वर महतो जब दूसरी कक्षा में पढ़ाई करते थे उस समय खेलने के दौरान इनकी बाईं आँख में पत्थर का एक टुकड़ा लग गया था। बहुत इलाज कराने के बाद ये ठीक नहीं हुए। 16 साल में इन्हें मोतियाबिंद हो गया। कुछ समय बाद लम्बे समय के लिए बुखार आया और याददाश्त चली गयी। तबसे दोनों आँखों से इनको धुंधली नजर पड़ती है। पर आज ये अपने और अपने परिवार के खर्चे के लिए किसी पर निर्भर नहीं हैं। इन्होंने बताया, "मेरा जॉब कार्ड बना है जिसमें 100 दिन की मजदूरी फिक्स है। अभी तो पांच छह महीने पहले राशन कोटा भी चलाने को मिल गया। अब खर्चे के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता।"

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रांची जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर ओरमांझी ब्लॉक के बारीडीह गाँव में 'बिरसा दिव्यांग स्वयं सहायता समूह' है। इस समूह को इस गाँव के 10 दिव्यांग दोस्तों ने वर्ष 2010 में मिलकर बनाया है। झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी से यह समूह साल 2016 में जुड़ा। आजीविका मिशन इस समूह से जुड़े हर पात्र व्यक्ति को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है। इनके पास अपने जॉब कार्ड है। मई 2018 में इन्हें जन वितरण प्रणाली के तहत राशन कोटा संचालन की जिम्मेदारी मिल गयी है।



समूह के सचिव नारायण कुमार महतो बैसाखी पकड़कर चलते हैं। साढ़े तीन साल की उम्र में ही ये पोलियो के शिकार हो गये। पर इन्होंने ठान लिया था कि ये जिन्दगी से हार नहीं मानेंगे और सैकड़ों दिव्यांग मित्रों को हिम्मत देंगे। इन्होंने एमए बीएड तक पढ़ाई करके ये अपने गाँव के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे शख्स बन गये।

समूह से कर्ज लेकर नारायण ने अपने लिए स्कूटी खरीद ली है जिससे इन्हें कहीं आने-जाने में कोई दिक्कत न हो। नारायण ने बताया, "जब समूह नहीं बनाया था तब हम भी वैसी ही जिन्दगी जीते थे जैसे गाँव के बाकी दिव्यांग जीते हैं। कुछ काम नहीं कर पाते थे तो हर किसी के लिए बोझ थे। कोई मदद नहीं करता था। लेकिन अब लोग कहते हैं इनसे सीखो जो अपनी जिन्दगी कितने अच्छे से जी रहे हैं।"

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"बिना आँख के खुद को बहुत लाचार पाता था। भगवान को कोसता था कि जल्दी से ऊपर उठा ले। अब तो समूह में चार दोस्त हो गये हैं जो हमारी ही तरह के हैं। इसलिए हमारी तकलीफों को बहुत करीब से समझते हैं।" समूह के कोषाध्यक्ष भुवनेश्वर मुण्डा (47 वर्ष) ने बताया, "पहले खुद से ही जिन्दगी बोझ लगती थी। लेकिन अब लोग हम लोगों की तारीफ़ करते हैं, हमारा दूसरों को उदाहरण देते हैं। जरूरत पड़ने पर मदद करने के लिए कई लोग तैयार रहते हैं। समूह से जब जरूरत पड़ती है कर्ज ले लेते हैं। अब हर तरीके से मजबूत हो गये हैं।"

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