पहाड़ों व जंगलों में रहने वाली विशेष जनजातियों की जिंदगी संवार रही डाकिया योजना

विशेष जनजाति के परिवारों की मुश्किलों को आसान करने के लिए हर महीने इनके घरों तक डाकिया योजना पहुंचाई जा रही है। इस योजना के तहत इन परिवारों को हर महीने 35 किलो मुफ़्त चावल मिल रहा है।

Neetu SinghNeetu Singh   2 Nov 2018 11:43 AM GMT

पहाड़ों व जंगलों में रहने वाली विशेष जनजातियों की जिंदगी संवार रही डाकिया योजना

पलामू (झारखंड)। विशेष जनजाति झारखंड की आबादी का वह हिस्सा है जो आज भी जंगलों में रहकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इन परिवारों की मुश्किलों को आसान करने के लिए हर महीने इनके घरों तक डाकिया योजना पहुंचाई जा रही है। डाकिया योजना से विशेष जनजाति के परिवारों को हर महीने 35 किलो मुफ़्त चावल मिल रहा है।


ये भी पढ़ें : नक्सली और दुर्गम इलाकों में महिलाओं की ताकत बन रहे स्वयं सहायता समूह

"हमेशा से हम जंगल में एक जगह से दूसरी जगह तम्बू बनाकर रहते थे। जंगल से जो गोठी और कांदा मिलता वही खाकर पेट भरते। पानी की परेशानी की वजह से कभी खेती की नहीं। अब तो ये चावल मिलने लगा है तो महीने भर का इंतजाम हो जाता है।" पहाड़िया जनजाति की मोहरमानी कुंवर (65 वर्ष) के चेहरे पर ये बताते हुए आज भी उदासी थी, "हमने तो 20 साल से ज्यादा दूसरों के गोरु (पशु) चराए और गोबर फेका। खाने में चटनी-भात, माड़-भात कभी-कभी पकौड़ का साग और भात खाने को मिल जाता था। अब बस इतना सुधार हुआ है कि भूखे नहीं सोना पड़ता।"

मोहरमानी कुंवर पलामू जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर चैनपुर ब्लॉक के बरवा खाड़-परसा खाड़ की रहने वाली हैं। इस गाँव में 100 घर हैं जिसमें 60 घर परहिया जनजाति के हैं। विशेष जनजाति की मोहरमानी कुंवर की तरह झारखंड में 71136 परिवारों को हर महीने डाकिया योजना के तहत 35 किलो चावल इनके घरों तक नि:शुल्क पहुंच जाता है। वहीं पलामू जिले में डाकिया योजना का लाभ 4763 परिवारों को मिल रहा है।

झारखंड में आठ विशेष जनजातियां हैं। ये आदिवासियों की वो जनजाति है, जिनका सदियों से रहने और खाने का ठिकाना जंगल होता था। पानी के संसाधनों के आभाव की वजह से इनके लिए खेती करना मुश्किल था। बरसात के पानी से ये जितना खेती कर पाते थे उससे उपज बहुत कम थी जो इनके खाने के लिए पर्याप्त नहीं था। जिसकी वजह से ये पेट भरने के लिए ज्यादातर जंगलों पर निर्भर रहने लगे।

ये भी पढ़ें : समूह की इन महिलाओं ने सीखा जैविक खेती का हुनर, अब नहीं खरीदती बाजार से कीटनाशक


आदिवासियों की इस विशेष जनजाति को पेटभर भोजन मिले इसके लिए झारखंड सरकार ने डाकिया योजना की शुरुआत अप्रैल 2017 में की। ग्रामीण विकास विभाग और झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के साझा प्रयास से विशेष जनजाति के परिवारों की महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़ा जा रहा है। जिससे ये परिवार जंगल में रहने की बजाए गाँव में रहें। पर अभी भी ज्यादातर परिवार कुछ महीने गाँव और कुछ महीने जंगल में बिताते हैं।

झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के सोशल डेवलपमेंट के प्रोग्राम मैनेजर नीलेश सिंह ने बताया, "विशेष जनजाति के ज्यादातर परिवार पहाड़ियों की चोटियों पर दूर-दूर रहते हैं। जहाँ से राशन कोटा की दुकान बहुत दूर होती है। डाकिया योजना का यही उद्देश्य था कि ये जहाँ भी रहें उन स्थानों को चिन्हित कर इनके पास तक हर महीने 35 किलो चावल पहुंचाया जाए।"


ये भी पढ़ें : नक्सल क्षेत्र की ये महिलाएं कभी घर से नहीं निकलती थीं, आज संभाल रहीं कोटा की दुकान

उन्होंने आगे बताया, "अभी 24 जिले के 168 ब्लॉक में ये योजना चल रही है। हर बोरी में 35 किलो चावल इनतक पहुंचे इसके लिए सखी मंडल की महिलाएं इन 35 किलो चावल की बोरियों की पैकेजिंग करती हैं। जिससे इन महिलाओं को रोजगार भी मिल रहा है और पैकेजिंग भी गुणवत्तापूर्ण हो रही है।" राज्य में 62 सेंटर पर 542 सखी मंडल की महिलाओं की मदद से डाकिया योजना की पैकेजिंग की जाती है।

विशेष जनजातियों का ये है खानपान

गरीबी और संसाधनों के आभाव की वजह से विशेष जनजाति के ज्यादातर परिवार पेट भरने के लिए जंगलों पर निर्भर थे। लेकिन धीरे-धीरे ये परिवार अब खेती करने लगे हैं। अभी भी रोटी इनके भोजन में चलन में नहीं है। अभी भी ये परिवार ज्यादातर चावल ही खाते हैं पर दाल और सब्जियां अब इनके भोजन में शामिल हो गयी हैं।

ये भी पढ़ें : झारखंड की ये महिला किसान मिश्रित खेती से कमा रही मुनाफा, दूसरे किसान भी ले रही सीख

उपनेतिया परहिया (55 वर्ष) ने बताया, "जब चावल नहीं मिलता था तब मक्का को भिगोकर रात में रख देते थे सुबह इसको कूटकर चावल की तरह बनाकर खाते थे। जंगल से जो गेंठी, कांदा साग-भाजी लाते उसी के साथ बनाकर खा लेते थे। बाजार से सब्जी खरीदना कभी बहुत ज्यादा चलन में नहीं रहा।" उन्होंने आगे बताया, "अब तो अपने घर के आसपास कुछ सब्जियां उगा लेते हैं। जितना चावल मिलता है उससे महीने भर खाने को हो जाता है। अब ये चिंता नहीं रहती कि महीने भर क्या खाएंगे।"

झारखंड की ये हैं विशेष जनजातियां

जिन्हें अभी विशेष जनजाति का दर्जा मिला है पहले इन्हें आदिम जनजातियां कहते थे। ये जनजातियां असुर, बिरहोर, बिरजिया, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, कोरवा सबर, हिल खड़िया, परहिया हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में विशेष जनजाति की आबादी दो लाख 92 हजार है जिसमें परहिया की आबादी दो प्रतिशत ही है।

ये भी पढ़ें : पुरुषों के काम को चुनौती देकर सुदूर गाँव की ये महिलाएं कर रहीं लीक से हटकर काम


More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top