डिजिटल झारखंड: ग्रामीण महिलाओं की हमसफर बन रही टेक्नोलॉजी

डिजिटलाइजेशन के जरिए समूहों की कोशिशें अब गांव की पगडंडियों से निकलकर बेवसाइट और यूट्यूब के जरिए लोगों को महिलाओं के संघर्ष की गाथा सुनाती हैं। अब इनकी उंगलियां की-बोर्ड पर जिंदगी का ताना-बाना बुनती हैं। इनकी कौतुहल भरी हंसी मोबाइल में कैद होती है।

डिजिटल झारखंड: ग्रामीण महिलाओं की हमसफर बन रही टेक्नोलॉजी

रांची/लखनऊ। तकनीकी की मदद से लोगों की जिंदगी कैसे आसान हो रही है, ये झारखंड के किसी गांव में आसानी से देखा जा सकता है। बैंक से लेनदेन करना हो या फिर बनवाना हो कोई प्रमाणपत्र, विधवा पेंशन निकालनी हो या फिर स्कूल में पढ़ रहे बच्चों को फीस के पैसे भेजने हों, अब ये सारे काम गांव में ही हो जाते हैं। ग्रामीण अब शहरों के चक्कर नहीं लगाते क्योंकि उनके गांव में डिजिटल क्रांति पहुंच रही हैं।

रांची के टांगर इलाके की रहने वाली बुजुर्ग मैलून खातून को पिछले एक साल से विधवा पेंशन नहीं मिल रही थीं। वो बैंक के चक्कर लगा-लगाकर थक गई थीं, और फिर वो एक दिन अपने ही गांव की बहू संगीता साहू से मिलीं… अब वो संगीता को दुवाएं देते नहीं थक रहीं।

संगीता साहू बैंकिंग कॉरेस्पोडेंट एजेंट हैं। जिन्होंने अपने पास रखी माइक्रो एटीएम पोर्टेबल मशीन में उनके आधार के जरिए पता लगाया कि उनकी पेंशन किस बैंक में जा रही है।


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संगीता साहू बताती हैं, "ये महिला मेरे गांव की हैं लेकिन पिछले काफी समय से कस्बे की ग्रामीण बैंक के चक्कर लगा रही थीं। मैंने इन्हें परेशान देखकर पता लगाया कि पेंशन ग्रामीण बैंक में उनके खाते में न आकर आईसीआईसीआई बैंक चली गई है। जिसे मैंने सही कराया। इसलिए ये मुझपर खुश रहती हैं।"

संगीता साहू की तरह झारखंड में साढ़े पांच सौ से ज्यादा महिलाएं बैंकिंग कॉरेस्पोडेंट एजेंट बनकर गांवों में बैंकिंग सुविधाएं दे रही हैं, गांव के लोग इन्हें एटीएम दीदी कहते हैं। वित्तीय समावेशन के तहत झारखंड स्टेटलाइवुड प्रमोशन सोसायटी ने ग्रामीण इलाकों में रहने वाली सखी मंडल से जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षित किया है जो लोगों की बैंकिंग से जुड़ी मुश्किलें आसान कर रही हैं। पैसा जमा करने से लेकर निकालने और बैंक खाते तक ये सारे काम घर बैठे कर देती हैं।

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सिर्फ बैंकिंग सेवा ही नहीं, तकनीकी की मदद से ग्रामीण इलाकों में महिलाएं जनसेवा केंद्र चला रही हैं। जहां लोग मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, खसरा खतौनी जैसे काम स्थानीय स्तर पर करवा पा रहे हैं। प्रदेश में 800 क्लस्टर (संकुल) संगठन है। जिनमें से हर संकुल पर दो-दो कंप्यूटर दिए गए हैं।

फोटो क्रेडिट-जेएसएलपीएस

जहां आम आदमी के जरुरी सरकारी कागजों से लेकर रेल टिकट तक सारे काम हो जाते हैं। वहीं तकनीकी की मदद से सबसे ज्यादा फायदा गांव की महिलाओं को मिला हैं, क्योंकि उन्हें जानकारी के साथ आजीविका का जरिया भी मिला है। रांची में दुबलिया गांव की प्रीति कुमारी लिंडा कंप्यूटर ऑपरेटर बन कर दूसरों की उलझने एक क्लिक में दूर कर रही हैं। वो जेएसएलपीएस के वन स्टॉप सेंटर में सक्रिय हैं।

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प्रदेश में सखी मंडल से जुड़ी 600 ऐसी महिलाओं को कंप्यूटर ऑपरेटर बनाया गया है, जिन्होंने पहले कभी कंप्यूटर देखा ही नहीं था। पूर्वी सिंहभूम जिले की ललिता देवी ने कभी स्मार्ट फोन नहीं चलाया था। लेकिन अब अपने समूह की अध्यक्ष बनी ललिता देवी लिखा-पढ़ी का सारा काम टैबलेट पर करती हैं।

सखी मंडल की किस दीदी ने कितना कर्ज़ लिया था और सालभर में उनके समूह ने कितना कुछ कमाया सब एक क्लिक में ललिता के सामने होता है। प्रदेश की 2100 महिलाओं को टैबलेट दिए जा चुके हैं, जिसके बाद समूहों का लेखा-जेखा रजिस्टर से निकलकर इंटरनेट पर आ चुका है।


20 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को मंजूरी दी गई थी। कार्यक्रम के अनुसार भारत को डिजिटल रुप में सशक्त करना था। जिसका मूल उद्देश्य था कि सभी सरकारी सेवाएं नागरिकों को डिजिटल यानि इलेक्ट्रानिक रूप में मिलें।

झारखंड में इस योजना को मुख्यमंत्री स्मार्ट फोन योजना से रफ्तार मिली। मुख्यमंत्री स्मार्ट फोन योजना के तहत एक लाख महिलाओं को स्मार्ट फोन दिए हैं। इन मोबाइल फोन ने महिलाओं के लिए दुनिया की खिड़की खोल दी है। यहां वो अपना ज्ञान बढ़ाती हैं, खेती के नए तरीके खोजती हैं। ये अब छोटी-छोटी जानकारियों के लिए शहर के चक्कर नहीं लगाती। यहाँ तक की अब अपनों से बात करने के लिए इन्हें पति के फोन का इंतजार नहीं करना पड़ता। गांव की महिलाएं काफी कुछ वो करने लगी हैं जो अभी तक शहरों की महिलाओं तक सीमित था।

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रामगढ़ जिले के घाटी क्षेत्र में रहने वाली मातो देवी (50 वर्ष) मुस्कुराते हुए अपने गाँव की एटीएम दीदी की तरफ इशारा करते हुए बताती हैं, , "जबसे इनके पास ये मशीन आयी है तबसे पूरे गांव के लोग इन्हें दुआ देते हैं। जिसको जिस समय जरूरत पड़ती है वो सरस्वती दीदी के घर का दरवाजा खटखटा देता है उसका तुरंत काम हो जाता।" उन्होंने आगे कहा, "जब ये नहीं थीं तब हमें कई किलोमीटर पैदल चलकर बैंक जाना पड़ता था और अगर सर्वर डाउन हुआ तो बिना काम पूरा किये घर वापस लौटना पड़ता। हम जैसे लोगों को तो बड़ी मुश्किल होती थी लेकिन अब हम बहुत खुश हैं।"


झारखंड में डिजिटल लिट्रेसी ने आधी आबादी को न सिर्फ जागरुक किया है बल्कि उन्हें आर्थिक रुप से सशक्त करना शुरु कर दिया है। बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती। एक तरफ जहां महिलाएं मोबाइल, टैबलेट, कंप्यूटर को अपनी आजीविका का जरिया बना रही हैं वहीं इन्हीं के जरिए वो अपने समूह और गांव की सफलता की कहानियां दूसरों तक पहुंचा रही हैं। सखी मंडल से जुड़ी सैकड़ों महिलाएं कम्यूनिटी जर्नलिस्ट यानि सामुदायिक पत्रकार बनकर अपने गांव की आवाज़ बन गयी हैं। ये अपने समूह की वो कहानियाँ हम और आप तक पहुंचाती हैं तो अबतक सुर्खियाँ नहीं बनी थीं।

रांची जिला से लगभग 70 किलोमीटर सिल्ली ब्लॉक में रहने वाली लक्ष्मी देवी (24 वर्ष) चार दिवसीय सामुदायिक पत्रकारिता का प्रशिक्षण ले चुकी हैं। ये बताती हैं, "हम अपने गाँव और समूह की कई खबरें लिख चुके हैं। अब हमें फोटो खीचना भी आ गया है जिसकी खबर लिखते उसकी फोटो भी खीचते हैं। हमारे समूह की दीदियाँ अब बहुत खुश हैं कि उनकी फोटो भी अब अख़बार में छपेगी।"

फोटो क्रेडिट-जेएसएलपीएस

लक्ष्मी देवी की तरह झारखंड में 100 से ज्यादा महिलाएं भारत के मीडिया समूह गांव कनेक्शन के आजीविका कनेक्शन और प्रभात ख़बर के पंचायत नामा में ख़बर लिखती हैं। अब ये न केवल ख़बरें लिखती हैं बल्कि वीडियो भी बनाती हैं। इनकी बताई और लिखी ख़बरें अख़बारों में वेबसाइट पर दिखती हैं। समूहों की कोशिशें अब गांव की पगडंडियों से निकलकर वेबसाइट और यूट्यूब के जरिए लोगों को महिलाओं के संघर्ष की गाथा सुनाती हैं।

डिजिटलाइजेशन ने झारखंड की ग्रामीण आबादी के पैरों की बेड़ियां तोड़ी हैं इनके हाथों को ताकत दी है। अब इनकी उंगलियां की-बोर्ड पर जिंदगी का ताना-बाना बुनती हैं। इनकी कौतुहल भरी हंसी मोबाइल में कैद होती है। इनकी चमकती आंखें सपने देखती हैं, तकनीकी अब इनकी हमसफर जो बन गई हैं।

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