बचत करना इन महिलाओं से सीखिए, सालाना ब्याज के पैसे से कमाती हैं चार से छह लाख रुपए

कल तक कर्ज लेने के लिए महाजन के आगे हाथ जोड़ने वाली झारखंड की इन महिलाओं के खातों में आज करोड़ों रुपए जमा हैं। आप भी पढ़िए इनके बदलाव की कहानी...

बचत करना इन महिलाओं से सीखिए, सालाना ब्याज के पैसे से कमाती हैं चार से छह लाख रुपए

पश्चिमी सिंहभूमि-रांची। सप्ताह में 10-20 रुपए की बचत करके तीन चार साल में करोड़पति कैसे बना जा सकता है अगर आपको बचत करने की ये कला समझनी है तो एक बार झारखंड की इन महिलाओं से जरुर मिलें। इस समय 50 से ज्यादा करोड़पति संकुल संगठन सालाना चार से छह लाख रुपए की आमदनी ब्याज के पैसों से कर रहे हैं।

झारखंड के अति पिछड़े और नक्सलवाद जिले की रानी देवी ने जब 10 रुपए सप्ताह बचत से लेकर करोड़पति बनने तक की कहानी बताती हैं तो उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। वो कहती हैं, "हम जैसी गरीब महिलाओं के लिए पांच सौ और हजार का नोट देखना किसी सपने जैसा ही था लेकिन आज बड़े शान से बैंक जाते है। पचास हजार से एक लाख रुपए तक बैंक मैनेजर से लेकर आते हैं।" रानी पश्चिमी सिंहभूम के खूंटपानी ब्लॉक के बड़ा लगिया गाँव की रहने वाली हैं।

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इस मामूली बचत से कोई करोड़पति कैसे बन सकता है ये यहाँ की महिलाओं ने संगठन में एकत्रित होकर साबित कर दिया है। रानी देवी कहती हैं, "हमारा कभी बैंक में खाता भी होगा ये कभी ख्याल में ही नहीं आया। लेकिन अब हम अकेले नहीं कई दीदियाँ एक साथ मिलकर बचत करती हैं और फिर अपने सखी मंडल का बैंक में खाता खुलवाते हैं। कुछ सालों में यही हमारी छोटी बचत और सरकारी सामुदायिक निवेश निधी से हमारे संगठन के खातों में एक करोड़ से ज्यादा रुपए हो जाते हैं।" इनकी तरह झारखंड में 19 लाख से ज्यादा ग्रामीण महिलाएं सखी मंडल से जुड़कर आज आर्थिक रूप से सशक्त हो गयी हैं।

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झारखंड में दीन दयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत राज्य में 24 जिलों के 254 प्रखंडो के 19,694 गाँवों में मिशन का क्रियान्वयन किया जा रहा है। अब तक राज्य भर में 1,76,000 सखी मंडल हैं। जिसमें 21 लाख से ज्यादा ग्रामीण गरीब परिवारों की महिलाओं को सखी मंडल से जोड़ा जा चुका है। ये महिलाएं सखी मंडल में जुड़कर छोटी-छोटी बचत की शुरुआत करती हैं। मेहनत मजदूरी करके धीरे-धीरे इनके द्वारा की गयी छोटी-छोटी बचत कुछ सालों में लाख और फिर करोड़ में पहुंच जाती है।


इन महिलाओं के बचत की कहानी इतनी आसान नहीं थी। मुश्किलें थीं चुनौतियाँ थीं पर इनमें हार न मानने का जुनून भी था। इसलिए इन्होने बचत की शुरुआत पांच और 10 रुपए सप्ताह से की। क्योंकि ये सक्षम महिलाएं नहीं हैं ये मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण करती थीं लेकिन सखी मंडल से जुड़ने के बाद अब इनमें से हजारों महिलाएं उद्यमी बन चुकी हैं।

रानी देवी (30 वर्ष) ने वर्ष 2013 में 10 रुपए की बचत कैसे शुरू की थी ये बताते हुए आज भी वो अपने आंसुओं को रोक नहीं पाती हैं, "जिस दिन हमें समूह में जुड़ना था उस दिन हमारे घर में खाने के लिए चावल नहीं था। आन्ध्रा से आयी दीदी ने अपने पास से हमारे 10 रुपए जमा किये थे और दो किलो चावल लेकर दिए थे।"

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ये बताते हुए वो कुछ देर के लिए चुप हो जाती हैं और लगातार अपने आंसू पोछते रहती हैं। कुछ देर बाद बोलीं, "आपको क्या-क्या बताएं...घर ऐसा था जिस दिन पानी बरसता पूरी रात बैठकर काटते। लेटने की सूखी जगह नहीं थी जूट का बोरा डालकर पानी सुखाते थे। हम कितना भी आगे बढ़ जाएँ पर पुरानी तकलीफों को कभी भुला नहीं पाएंगे।" उन्होंने लम्बी गहरी साँस ली और बोलीं, "लेकिन आज हमें कोई कमी नहीं है। समूह से 50,000 लोन लेकर दुकान खोली है। ग्राम संगठन में लेखापाल हैं अच्छी आमदनी हो जाती है।"


ये सखी मंडल महिलाओं के संगठन की ताकत को बताते हैं। एक सखी मंडल में 10-15 महिलाएं होती हैं। करीब 10,157 ग्राम संगठन हैं। एक ग्राम संगठन में आबादी के हिसाब से 15-20 सखी मंडल होते हैं। प्रखंड स्तर पर 402 संकुल संगठन हैं। एक संकुल संगठन में 15-30 ग्राम संगठन होते हैं। अबतक राज्य में 57 ऐसे संकुल संगठन हैं जिनकी कुल बचत 89 करोड़ है। जबकि एक संकुल संगठन की बचत एक करोड़ से ज्यादा है और एक संकुल संगठन सालाना अपने ब्याज के पैसे से चार से छह लाख रुपए कमा लेते हैं।

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रानी देवी झारखंड की पहली महिला नहीं हैं जिन्होंने जिन्दगी के ऐसे दिन गुजारे हों। यहाँ की लाखों महिलाओं की कहानियाँ रानी देवी से मिलती जुलती हैं। एक-एक पैसे के लिए तरसना, घंटो महाजन के आगे हाथ जोड़कर कर्ज लेने के लिए खड़े रहना, भूखे पेट सोना ऐसी तमाम मुश्किलें इनके लिए गुजरे जमाने की बात हो गयी है। अब ये वो महिला नहीं रह गयी हैं जिनके लिए हजार रुपए देखना सपना हो बल्कि अब ये सामूहिक रूप से करोड़पति हो गयी हैं।


तीन बातें सखी मंडल से लेकर संकुल संगठन तक जरूरी

किसी भी सखी मंडल को अगर आगे बढ़ना है तो तीन बातें उस सखी मंडल को पालन करना जरूरी है। अगर इनका पालन न हुआ तो सखी मंडल लम्बे समय तक नहीं चल पायेगा।

1-नियमित बैठक

2-नियमित लेखा-जोखा

3-नियमित चर्चा

जब इन तीन बातों का नियमित पालन होता है तभी वहां संगठन और संकुल संगठन का निर्माण होता है। ये तीनों प्रक्रियाएं हमेशा चलती रहें तभी कोई भी संकुल संगठन बेहतर लेनदेन कर पायेगा और वो लगातार चलता रहेगा।

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जानिए संकुल संगठन की बचत से कैसे आता है सालाना 06-08 लाख रुपए ब्याज़

सात से 16 गाँव के बीच में तीन हजार परिवारों के साथ एक संकुल संगठन का निर्माण होता है। राज्य में 57 ऐसे संकुल संगठन हैं जिनके पास एक करोड़ से ज्यादा की बचत है। अगर एक संकुल संगठन की बचत एक करोड़ से ज्यादा रुपए की होती है तो वो अपने ब्याज के रुपयों से सालाना चार से छह लाख रुपए की आमदनी कर लेते हैं।

पलामू जिले की प्रेमा देवी (35 वर्ष) उत्साह के साथ अपने संकुल संगठन की मासिक आमदनी बताती हैं, "हमारी कुल बचत से हर महीने 64,175 रुपए ब्याज के मिलते हैं जिन पैसों को सखी मंडल की दीदियों ने लिया है। महीने का 14,000 संकुल संगठन का कुल खर्च जो ब्याज के पैसे से ही निकलता है।


वहीं पश्चिमी सिंहभूम जिले की संकुल संगठन की कोषाध्यक्ष कहती हैं, "हमारे संकुल संगठन में एक करोड़ 99 लाख 74 हजार रुपए जमा हैं। एक समय था जब हम लोग हजार रुपए बचत करने के बारे नहीं सोच सकते थे लेकिन आज मिलकर धीरे-धीरे समूह की ये बचत करोड़ों में पहुंच गयी है।" वो आगे बताती हैं, "बचत का पैसा समूह की दीदी को बहुत कम ब्याज पर दिया जाता है। संकुल संगठन में बड़ी राशि में जब किसी को पैसा लेना है तब यहाँ से पास होता है नहीं तो पांच दस हजार रुपए सखी मंडल या ग्राम संगठन में ही पास हो जाते हैं।"

संकुल संगठन की सामाजिक स्तर पर रहती है बड़ी भागीदारी

लेनदेन के आलावा संकुल संगठन की एक बड़ी जिम्मेदारी सामजिक स्तर के मुद्दों को सुलझाने की भी रहती है। इस संगठन की ये भी जिम्मेदारी रहती है प्रखंड स्तर पर जो भी सरकारी योजनायें आयें उनकी इन्हें जानकारी हो और वो जानकारी इस संकुल संगठन से जुड़े हर सखी मंडल को हो। इसके आलावा इनकी बाल-विवाह, स्वास्थ्य, टीकाकरण, कुपोषण से बचाव, महिला हिंसा, शराब बंदी, ड्राप आउट बच्चों का स्कूल में नामांकन करना जैसे कई मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी रहती है।

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असुरक्षा न्यूनीकरण राशि से हर जरुरतमंद महिला को मिलती है मदद

हर ग्राम संगठन में एक लाख रुपए की एक राशि होती है जो आपातकाल में इस राशि को जरूरत पड़ने पर कोई भी महिला विषम परिस्थियों में उपयोग कर सकती है। जिसपर तीन महीने कोई ब्याज नहीं पड़ेगा दूसरा इस राशि पर तीन महीने बाद भी ब्याज लेना है या नहीं ये ग्राम संगठन की महिलाएं उस सम्बंधित महिला की परिस्थिति के हिसाब से तय करती हैं।

पलामू जिले की लालसा देवी (40 वर्ष) ने बताया, "सखी मंडल से जुड़ी एक दीदी के दोनों बच्चों को रात में अचानक सांप ने कुछ महीने पहले काट लिया था। उनके पास उस समय एक भी पैसे नहीं थे। सुबह 5,000 देकर उन्हें अस्पताल भेजा बाद में जरूरत पड़ने पर 20,000 और लेकर गये। समय से पैसों की व्यवस्था होने की वजह से उनके दोनों बच्चों को इलाज कराकर बचा लिया गया।" वो आगे बताती हैं, "इमरजेंसी में ये पैसा बहुत काम आता है इसके लिए तुरंत कोई मीटिंग नहीं बिठाई जाती। जरूरत के हिसाब से पहले काम किया जाता है।"

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