गांवों में मजदूरी करने वाली ये महिलाएं अब हर महीने ऐसे कमा रहीं 15 से 20 हजार रुपए

मेहनत मजदूरी करने वाली ये महिलाएं अब सफल ट्रेनर बन गयी हैं। इन प्रशिक्षक महिलाओं का कोई समूह गाँव-गाँव जाकर गरीब महिलाओं को समूह से जोड़ने के लिए प्रेरित करता तो कोई उन महिलाओं को प्रशिक्षित करता है जो समूह में विभिन्न पदों पर तैनात हैं। इससे इनकी महीने की आमदनी 15000-20000 रुपए हो जाती है।

Neetu SinghNeetu Singh   9 Oct 2019 1:15 PM GMT

गांवों में मजदूरी करने वाली ये महिलाएं अब हर महीने ऐसे कमा रहीं 15 से 20 हजार रुपए

रांची (झारखंड)। आठवीं और मैट्रिक पढ़ी ग्रामीण क्षेत्रों की ये महिलाएं अपनी बदलाव की कहानियाँ गाँव-गाँव जाकर उन महिलाओं को बताती हैं जो अब तक स्वयं सहायता समूह से नहीं जुड़ी हैं। ये उन महिलाओं को भी प्रशिक्षित करती हैं जो इन समूहों की जिम्मेदारी संभाल सके। इन्हें इसका मेहनताना मिलता है जिससे ये आर्थिक रूप से सशक्त होकर आत्मनिर्भर बन गयी हैं।

गाँव में रहकर मेहनत मजदूरी करने वाली ये महिलाएं आज सखी मंडल से जुड़कर सफल प्रशिक्षक बन गयी हैं। साधारण दिखने वाली महिला सुगिया लोहरा (44 वर्ष) आज मास्टर ट्रेनर हैं। ये सक्रिय महिला, समूह की अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, सचिव को प्रशिक्षित करती हैं जिनका इन्हें एक दिन का 1,000 रुपए मिलता है। इन प्रशिक्षक महिलाओं में से कोई समूह गाँव-गाँव जाकर गरीब महिलाओं को समूह से जोड़ने के लिए प्रेरित करता तो कोई उन महिलाओं को प्रशिक्षित करता है जो समूह में विभिन्न पदों पर तैनात हैं।

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साधारण दिखने वाली ये महिलाएं असाधारण काम कर रही हैं

सुगिया कहती हैं, "महीने में जितने दिन ट्रेनिंग रहती है उतना पैसा कमा लेते हैं। बाकी दिनों में सब्जी का बिजनेस करते हैं जिससे रोज के खर्चे निकल जाते हैं। मेरी बेटियां आज अच्छे स्कूल में पढ़ाई कर रही हैं। एक बेटी की शादी भी कर दी।" सुगिया के लिए अकेले दम पर ये सब करना इतना आसान नहीं था लेकिन वर्ष 2012 में खुशबू किरन ज्योति स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद जब इन्हें स्वयं सहायता समूह का साथ मिला तो इनके हालात सुधरने लगे।

सुगिया बताती हैं, "अगर महीने में 10-15 दिन की ट्रेनिंग देने का मौका मिल जाता है तो ट्रेनिंग देकर और सब्जी बेचकर 15000 रुपए बचा लेते हैं। समूह में जुड़ने के बाद हम सक्रिय महिला बनाये गये जब हमने अच्छा काम किया तो हमें कई और ट्रेनिंग दी गईं। ट्रेनिंग मन लगाकर ली आज दूसरे जिलों में जाकर महिलाओं को ट्रेनिंग देते हैं।"

सुगिया जब दूसरी महिलाओं को अपनी आप बीती बताती हैं तो महिलाओं में उत्साह जगता है। वो समूह में जुड़कर खुद की गरीबी को सुगिया की तरह खत्म करना चाहती हैं। सुगिया की तरह सैकड़ों महिलाएं जिन्होंने सखी मंडल से जुड़कर अपनी गरीबी को खत्म किया है जो बोलने में मुखर हैं। एक दूसरे जिले आ जा सकती हैं उन महिलाओं को झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा समय-समय पर प्रशिक्षित करके दूसरी महिलाओं को ट्रेनिंग देने के लिए तैयार किया जाता है। सुगिया प्रशिक्षित की गयी उन महिलाओं में से एक हैं जो दूसरे जिले में जाकर वहां की महिलाओं को प्रशिक्षित करती हैं।

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ये हैं वो महिलाएं जिनकी आमदनी महीने की 15000-20,000 रुपए है

सुगिया ने अपने जीवन के कई वर्षों तक भले ही मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण किया हो। लेकिन इन्होंने कभी जीवन से हार नहीं मानी। वर्ष 2009 में पति के देहांत के बाद इनके लिए पांच बेटियों का मजदूरी करके खर्चा चलाना मुश्किल था। ये अपने इन हालातों से उबरना चाहती थीं इन्हें कोई रास्ता नहीं समझ आ रहा था। सखी मंडल से जुड़ने के बाद इन्होंने न केवल छोटी-छोटी बचत की शुरुआत की बल्कि लोन लेकर सब्जी का बिजनेस भी शुरू किया।

सुगिया ने बताया,"मैं 2017 से ट्रेनिंग दे रही हूँ अबतक मैंने तीन लाख रुपए कमा लिए है।" सुगिया की तरह झारखंड की हजारों महिलाओं ने स्वयं सहायता समूह में जुड़कर अपनी गरीबी को मात दी है।

दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों की गरीब महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़ा जा रहा है जिससे उनकी गरीबी को कम किया जा सके। ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार भारत के 622 जिलों के 5246 ब्लॉकों के करीब 55 लाख स्वयं सहायता समूह के माध्यम से 6.12 करोड़ ग्रामीण महिलाओं के जीवन में सुधार लाया जा चुका है। झारखंड में ग्रामीण विकास विभाग, झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा अबतक राज्य में 2 लाख 13 हजार स्वयं सहायता समूह (सखी मंडल) बन चुके हैं। जिसमें झारखंड की 26 लाख ग्रामीण महिलाएं जुड़ चुकी हैं।

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महिलाएं समूह में एकत्रित होकर करती स्वयं सहायता समूह की बैठक

सुगिया की तरह रांची जिले की सविता देवी (37 वर्ष) अबतक 500 स्वयं सहायता समूह बना चुकी हैं। ये कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन हैं जो दूसरे गाँव में जाकर स्वयं सहायता समूह बनाती हैं। इन्होंने समूह से 40,000 का लोन लेकर चूड़ी और अगरबत्ती की दुकान खोली और एक सिलाई की मशीन खरीदी। जब इन्हें ट्रेनिंग देने जाना होता है तब ये ट्रेनिंग देने जाती हैं बाकी के समय अपनी दुकान चलाती और सिलाई करती। सविता कहती हैं, "दुकान जैसी चल जाए उसी हिसाब से आमदनी हो जाती है। हमने अपनी इस छोटी से दुकान से महीने का 5,000-20,000 रुपए तक कमाया है। बाकी ट्रेनिंग से भी अच्छा पैसा कमा लेते हैं। अभी तो स्कूटी भी खरीद ली है कहीं आने-जाने में दिक्कत नहीं होती।"

सविता का जीवन हमेशा से ऐसा नहीं था उन्होंने भी गरीबी को झेला था। लेकिन सखी मंडल से जुड़ने के बाद आज ये अपने बेटे को इंजीनियरिंग की पढ़ाई करवा रही हैं। समूह से अबतक एक लाख रुपए का लोन ले चुकी हैं। आमदनी के हिसाब से धीरे-धीरे पैसे चुका देती हैं। ये कहानी सिर्फ दो चार महिलाओं की नहीं है बल्कि सैकड़ों की संख्या में ये ट्रेंड महिलाएं अबतक हजारों महिलाओं को प्रशिक्षित कर चुकी हैं।

मेहनत मजदूरी करने वाली ये महिलाएं आज अपने हुनर से महीने का 15,000-20,000 रुपए कमा लेती हैं। ये दूसरे गाँव की गरीब महिलाओं को समूह में जोड़ने के लिए प्रेरित करती हैं। जिन महिलाओं को सखी मंडल से जुड़े दो तीन साल हो जाते हैं और वो अपनी मेहनत और लगन से अपनी गरीबी को मात दे चुकी होती हैं। वही महिलाएं फिर दूसरे जिले में जाकर समूह और ग्राम संगठन बनाने का काम करती हैं। जिससे न केवल इनकी पहचान बनती है बल्कि आमदनी भी होती है।

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