ये आदिवासी महिलाएं हैं आज की मांझी, श्रमदान से किया पुल व सड़क का निर्माण

झारखंड का ये गाँव आज बदलाव की कहानी लिख रहा है। यहाँ के आदिवासियों की एक अनूठी पहल से हेसलबार गाँव का पलायन कम हुआ है।

Neetu SinghNeetu Singh   16 Feb 2019 2:31 PM GMT

ये आदिवासी महिलाएं हैं आज की मांझी, श्रमदान से किया पुल व सड़क का निर्माण

लातेहार (झारखंड)। झारखंड का एक ऐसा गाँव जहाँ के आदिवासी परिवार मांझी बनकर अपने गाँव में दो किलोमीटर लम्बी सड़क और पुल का निर्माण खुद कर लिया। आज यहाँ खाली पड़े खेतों में खेती हो रही है और आवागमन के लिए एक अच्छी सड़क बन गयी है। इनकी इस एक कोशिश से यहाँ का पलायन कम हुआ है।

झारखंड के लातेहार जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर जब हम जंगलों के बीच से होते हुए सासंग ग्राम पंचायत के हेसलबार गाँव के करीब पहुंचे तो यहाँ दूर से बोरियों से बंधा एक बाँध दिखाई दिया। सर पर पानी लेकर आ रहीं सुषमा नौनवार (24 वर्ष) से जब हमने इस पुल का जिक्र किया तो वो मुस्कुराते हुए आत्मविश्वास के साथ बताने लगीं, "ये पुल हम गाँव वालों ने मिलकर बनाया है। हमारे गाँव में पानी की बहुत समस्या थी हमलोगों की जमीन खाली पड़ी रहती थी। लोग पलायन कर जाते थे लेकिन इस पुल के बनने से पूरे गाँव में खेत हरे-भरे हैं। पूरे गाँव ने एक दिन में मिलकर ये पुल बना लिया।"

ये भी पढ़ें-सिर्फ मांड भात नहीं खातीं अब झारखंड की महिलाएं, किचन गार्डन से हो रहीं सेहतमंद


सुषमा देवी जहाँ खड़ीं थीं वहां से दूर कच्ची सड़क की तरफ इशारा करते हुए बोलीं, "वो जो सड़क आप देख रहीं हैं पूरे दो किलोमीटर लम्बी सरकारी स्कूल तक गयी है। ये सड़क पहले बहुत उबड़-खाबड़ थी कभी भी कोई गिर जाता था। लेकिन इस सड़क के बनने से हमारे बच्चे सुरक्षित स्कूल पहुंच पाते हैं। हमारा गाँव जंगलों से घिरा है छह किलोमीटर दूर पैदल चलकर हमें सवारी मिलती है। बीहड़ गाँव होने की वजह से इस गाँव की कभी किसी ने कोई सुध नहीं ली। हम गाँव वालों ने मिलकर ही अपनी समस्या का हल ढूंढ निकाला।"

सुषमा की तरह देखते ही देखते कुछ देर में वहां 50 से ज्यादा महिलाएं इकट्ठा हो गईं। वो जानना चाहती थीं कि आखिर आज इस बीहड़ गाँव में कौन आया है। अपना परिचय जब हमने बताया तो उस भीड़ में खड़ीं एक 55 वर्षीय महिला मार्था तोपनों ने कहा, "जबसे हमलोगों ने ये पुल और सड़क बनाई है तबसे हमारे गाँव में बहुत अधिकारी आ चुके हैं। लातेहार जिला अधिकारी और वीडियो सर भी कई बार आ चुके हैं और आज आप भी आ गईं। हम बहुत खुश हैं कि अब हमारे गाँव का विकास हो रहा है।"

ये भी पढ़ें-झारखंड में पशु सखियों की बदौलत लाखों लोगों की गरीबी के मर्ज़ का हो रहा 'इलाज'


आदिवासी बाहुल्य हेसलबार गाँव के 60 परिवारों के लोगों को सरकार से कोई शिकायत नहीं ये खुद काम करने पर भरोसा करते हैं। बस इन्हें कोई रास्ता दिखाने वाला मिल जाए। सखी मंडल से जुड़ने के बाद इन आदिवासी परिवारों की जिन्दगी में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। ये सखी मंडल में बचत करने के साथ-साथ कई और सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगी हैं। जिसमें ये बोरी बाँध और सड़क निर्माण जैसे कार्य भी शामिल हैं। यहाँ के लोगों ने एक दिन में बोरी बाँध बना लिया और एक सप्ताह में दो किलोमीटर दूरी की सड़क बना ली।

यहाँ के युवा पानी की समस्या की वजह से छह महीने कमाने के लिए बाहर चले जाते थे लेकिन जबसे यहाँ पुल बना है तबसे ये गाँव में रहकर ही खेती करने लगे हैं। वर्ष 2016 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत सखी मंडल के गठन के बाद यहाँ की महिलाओं को रोजगार के कई और तरीके पता चले। जिसमें ये वनोंपज, बकरी पालन, पशु-पालन और खेती कर रहे हैं। इस वजह से भी यहाँ का पलायन बहुत कम हुआ है और आज ये गाँव बदलाव की इबादत लिख रहा है।

ये भी पढ़ें-डिजिटल झारखंड: ग्रामीण महिलाओं की हमसफर बन रही टेक्नोलॉजी


लातेहार जिलाधिकारी राजीव कुमार से जब गाँव कनेक्शन संवाददाता ने फोन पर इस गाँव के बारे में जिक्र किया तो वो बताने लगे, "मैं इस गाँव में तीन बार जा चुका हूँ, यहाँ सखी मंडल की महिलाओं और गाँव के लोगों ने जो कार्य किया है वो काबिले तारीफ़ है। इस गाँव की तरह हमारे लातेहार जिले में कई गाँव हैं जहाँ के लोगों ने एक दो महीने में अपने खुद के प्रयासों से गाँव की सूरत बदल दी है।"

उन्होंने हेसलबार गाँव के बारे में बताया, "इस गाँव में एक महिला के पास 75 बकरियां हैं पिछले साल इस महिला ने तीन लाख रुपए की बकरियां बेची थीं। गाँव में रोजगार के आभाव की वजह से इस गाँव के 30-35 वर्ष के सभी युवा छह महीने के लिए कमाने महाराष्ट्र चले जाते थे लेकिन अब ये पलायन पहले से कम हुआ है।"

ये भी पढ़ें-इन महिलाओं के हाथ का हुनर ऐसा कि बोल उठती हैं लकड़ियां

हम दो नदियों को पार करते हुए इस गाँव में पहुंचे। ग्रामीणों से बातचीत के दौरान पता चला कि बरसात में जब इन नदियों में पानी उफ़ान पर होता है तब यहाँ के लोग एक महीने तक बाजार नहीं जा पाते गाँव में ही रहना पड़ता है अगर कोई बीमार पड़ गया तो जंगल से जड़ी-बूटी से काम चलाना पड़ता है। जीवन फूल आजीविका स्वयं सहायता समूह की एलीजबेद भेंगरा (30 वर्ष) ने कहा, "गाँव में जो समस्या होती है जिसे हम मिलकर कर पाने में सक्षम होते हैं उसे सुलझा लेते हैं लेकिन जो हमारे हाथ में नहीं हैं उसे नहीं कर पाते। हमारे यहाँ का सरकारी स्कूल जर्जर पड़ा है और दो नदियों के बीच कोई पुल नहीं है जिसकी वजह से बरसात में हम लोगों को बहुत दिक्कत होती है। अगर सरकार ये दोनों काम कर दे तो हमारे गाँव में कोई दिक्कत नहीं है।"

हेसलबार की महिलाएं जिस सड़क पर खड़ी हैं ये इनके द्वारा बनाई सड़क है.

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top