आंवले पर भी मौसम की मार

आंवले पर भी मौसम की मार

प्रतापगढ़। कम बारिश की वजह से जहां किसानों को खरीफ़ की फसलों पर नुकसान उठाना पड़ा है, वहीं जिले की पहचान आंवला उत्पादन भी इससे प्रभावित हुआ है।

प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग पांच किमी उत्तर दिशा में चिलबिला कस्बे से ही आंवले के बाग शुरू हो जाते है। हर वर्ष नवम्बर महीने में जहां इन बागों में आवंले की तुड़ाई शुरू हो जाती है, इस बार सन्नाटा है। 

गोड़े गाँव के आंवला किसान अजय कुमार सिंह (35 वर्ष) ने बताया, ''सूखे से धान की फसल तो खऱाब हो ही गयी थी सोचा था आंवले से कुछ फायदा हो जाएगा। लेकिन इसमें भी हम किसानों कोई फायदा नजऱ नहीं आ रहा है।" अजय कुमार सिंह की गोड़े गाँव में तीन हेक्टेअर आंवले का बाग था, जिसमें से अब सिर्फ  दो हेक्टेअर ही बचा है। हर वर्ष आंवला 70 से 80 हज़ार रुपए में बिकता था इस बार सिर्फ  40 हज़ार में बिका है।

अजय सिंह आगे बताते हैं, ''व्यापारी हम से सस्ते दाम में आंवला ले जाकर बड़ी कंपनीयों को महंगे दाम में बेचते हैं। छोटे किसान सीधे मंडी में आंवला बेच भी नहीं पाता इसलिए उसे मज़बूरी में आढ़तियो को बेचना पड़ता है।"

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़, रायबरेली, सुल्तानपुर, आगरा और मथुरा में आंवले की खेती होती है। लेकिन प्रतापगढ़ में प्रदेश के आवंला उत्पादन में 80 प्रतिशत भागीदारी है। प्रतापगढ़ जिले के 16 ब्लॉकों में लगभग 12000 हेक्टेअर में आंवले की खेती होती है। यहाँ के किसान कई वर्षों से आंवले का समर्थन मूल्य निर्धारित करने और सरकारी खऱीद केन्द्रों की मांग करते आ रहे हैं।

गोड़े के आंवला किसान प्रभाकर सिंह कहते हैं, ''इस बार बहुत कम फल आए हैं और साइज़ में भी छोटे हैं। इस बार 600 रुपये से लेकर 625 रुपए प्रति कुंतल तक आंवला बिक रहा है यही आवंला बाहर जाकर 1000 से 1500 रुपये तक बिकता है।" 

प्रभाकर सिंह आगे बताते हैं, ''अभी और भी कीमत कम होगी क्योंकि अभी कम किसान मंडी जा रहे हैं जहाँ ज्यादा किसान जाने लगेंगे आढ़ात उनसे बात भी नहीं करेंगे।"

यहां के कुछ बड़े व्यापारी बड़ी आयुर्वेदिक कंपनियों जैसे डाबर, पतंजलि को सीधे आंवला बेचते हैं, उनको तो फ़ायदा होता है लेकिन किसानों को नुकसान ही होता है।" आंवला व्यापारी इंद्र प्रताप सिंह बताते हैं, ''इसमें प्रशासन की कमीं है। सरकार को आंवला किसानों के बारे में सोचना चाहिए। हम लोग तो सीधे आयुर्वेदिक कंपनी से बात कर उन्हें माल पहुंचाते हैं।"

प्रतापगढ़ जिला उद्यान अधिकारी आरवी सिंह इसमें किसानों की गलती मानते हैं। आरवी सिंह कहते हैं, ''इसमें किसानों की ही गलती है। बस आंवले की बाग लगा दी उसकी देख-रेख करते नहीं है तो कहां ज्यादा उत्पादन होगा। किसानों को आंवले के अलावा कुछ और भी सोचना चाहिए, कब तक आंवले के पीछे भागते रहेंगे।"

आगे नहीं बढ़ी योजना

प्रतापगढ़ के सांसद कुंवर हरिवंश सिंह ने पहल की थी कि आवंला मार्केटिंग हब बनाया जाएगा। इसके जरिए किसान सीधे अपना उत्पाद बेच सकेगा जिससे उन्हें आढ़तियों के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा और सीधे कंपनी से सौदा होगा। डेढ़ साल से ज्यादा हो गए लेकिन अभी भी ये योजना आगे बढ़ती नजऱ नहीं आ रहे है।

बंद हो गया विभाग

वर्ष 1991 में जि़ले में आंवला विभाग बनाकर आंवला विकास अधिकारी पद सृजित बनाया गया था। लेकिन वर्ष 2003 में यह पद समाप्त करके उद्यान विभाग को ही इसकी जिम्मेदारी दे दी गयी।

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