आतंक और कट्टरपंथ के जाल में बांग्लादेश

आतंक और कट्टरपंथ के जाल में बांग्लादेशgaonconnection

‘‘बांग्लादेश में सिर्फ पांच साल के लिए शरिया लॉ लागू कर दिया जाए और मदीना लॉ के तहत रूल किया जाए। मैं दावे के साथ कहता हूं कि पांच साल बाद कोई भी मुसलमान इस्लामिक लॉ की बात नहीं करेगा।’’ ये शब्द उस बांग्लादेशी युवक नजीमुद्दीन समद के हैं जिसे बांग्लादेशी कट्टरता ने खत्म कर दिया।

बांग्लादेश ‘मुक्ति’ की लड़ाई लड़कर वजूद में आया था लेकिन बांग्लादेश के सामने यह सवाल शायद पुनः उठ रहा है कि मुक्ति पाथे कौन? कट्टरपंथ जिस तरह से धर्मनिरपेक्ष लेखकों, ब्लॉगरों और अल्पसंख्यकों को मौत के घाट उतार रहा है, उससे यह अनुमान तो लगाया जा सकता है अभी भी वहां समाज के प्रगतिशील लोग मुक्त नहीं हैं। यही कट्टरता इस्लामी स्टेट जैसे आतंकवादी संगठनों के लिए जगह बनाती है, जिसके सहारे वे देश में प्रवेश करते हैं और फिर फलते-फूलते हैं। संभव हो कि इसी कार्य-कारण सम्बंध ने बांग्लादेश में इस्लामी स्टेट को वह अवसर प्रदान कर दिया जिसका इस्तेमाल कर उसने ढाका में पहला आतंकी हमला बोला है।

बीते दिनों ढाका में हुआ आतंकी हमला राजनयिक दृष्टि से बेहद अहम है, जिससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अब बांग्लादेश न केवल कट्टरपंथ के बल्कि आतंकवाद के भी ट्रैप में फंस चुका है। बांग्लादेश में एक जुलाई की रात कई हथियारबंद लोगो‍ं नेे एक रेस्त्रां में कई देशी और विदेशी नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया। बांग्लादेशी मीडिया खुफिया सूत्रों के अनुसार यह हमला इस्लामी स्टेट (आईएसआईएस) ने किया है जिसकी जिम्मेदारी स्वयं आईएस ने ली है। हालांकि, कुछ खबरों में यह भी कहा गया है कि इस आतंकवादी कार्रवाई में अलकायदा की लोकल बॉडी और पाकिस्तानी आतंकी संगठनों को हाथ भी हो सकता है।

इस्लामी स्टेट का हाथ होने की आशंका इसलिए है क्योंकि पिछले कुछ दिनों से बांग्लादेश में उसकी मौजूदगी की बातें सामने आई हैं। कुछ सूचनाओं के अनुसार आईएस भारत पर गुरिल्ला हमले करने की मंशा रखता है और इस उद्देश्य से वह बांग्लादेश में अपनी जमीन तैयार कर रहा है। इस्लामिक स्टेट ने स्वयं यह दावा किया है कि बांग्लादेश में उसका नेटवर्क सक्रिय है और यहीं से भारत और म्यांमार को निशाना बनाने की तैयारी है। कुछ समय पहले ही इस्लामी स्टेट की प्रोपेगंडा मैग्जीन ‘दबिक’ ने बांग्लादेश के आतंकियों की तस्वीरें भी जारी की थीं जो बांग्लादेश से लेकर भारत तक इस्लामी स्टेट के लिए काम करने के लिए तैयार हैं।

खास बात यह है कि अबु इब्राहिम ने बांग्लादेश को वैश्विक जिहाद के लिए बहुत अहम जगह बताया है। उसके अनुसार बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति बड़ी अहम है, यहां जिहाद का मजबूत केंद्र होने से भारत में अंदर और बाहर से गुरिल्ला हमले करना आसान होगा। अमेरिकी खुफिया एजेंसी भी बांग्लादेश को आईएस की मौजूदगी की चेतावनी दे चुकी है लेकिन अब तक बांग्लादेश की सरकार इससे इन्कार करती रही और कमोबेश निषि्क्रय बनी रही। ब्लॉगर्स और उदारवादी लेखकों की हत्याओं को सामान्य कानून व्यवस्था का हिस्सा मानकर बांग्लादेशी सरकार सामान्य कार्रवाइयों तक ही सीमित रही। अभी भी शेख हसीना सरकार देश में हो रहे आतंकी हमलों में स्थानीय इस्लामिक कट्टरपंथियों का हाथ बताती रही है‍ं। यह संभव भी हो सकता है क्योंकि बांग्लादेश में आईएसआईएस और अलकायदा इन इंडियन सबकॉन्टीनेंट (एक्यूआईएस) जैसे आतंकवादी समूह सक्रिय हैं।

इनके अतिरिक्त हरकत-उल-जिहाद-अल इस्लामी (हूजी), जमात-उल-मुजाहिदीन, अंसार-अल-इस्लाम रोहिंग्या विद्रोही गुट और उल्फा जैसे संगठन भी सक्रिय हैं लेकिन सरकार यह दावा नहीं कर सकती कि इनके सम्बंध इस्लामी स्टेट से नहीं हैं या ये उसके सहयोगी के रूप में कार्य नहीं कर रहे हैं।

नजीमुद्दीन समद, अविजीत रॉय, अनंत बिजॉय दास, वशीकुर रहमान, निलॉय चक्रवर्ती, अरेफिरन दीपान, राजीव हैदर, आसिफ मोहिउद्दीन, हिन्दू पुजारी की हत्या आदि को सामान्य श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कारण यह है कि इनमें में से कुछ की हत्याओं की जिम्मेदारी इस्लामी स्टेट पहले ही ले चुका है और कुछ की अंसारुल्लाह बांग्ला टीम अथवा अन्य चरमपंथी संगठनों ने ली। ध्यान रहे कि असारुल्लाह के तार अलकायदा से भी जुड़े हैं और जमात-ए-इस्लामी से भी। इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि बांग्लादेश में जो हत्याएं हो रही हैं उनका सम्बंध स्थानीय कारकों से कम और बाहरी योजनाओं से अधिक है। हालांकि बांग्लादेश संवैधानिक रूप से एक धर्मनिरेपक्ष राष्ट्र है लेकिन कट्टरपंथी इसे इस्लामी देश बनाना चाहते हैं। सेक्युलर बुद्धिजीवी, लेखक-पत्रकार और समाजकर्मी उनके कट्टरपंथ की आलोचना करता है इसलिए इनका कट्टरपंथियों द्वारा इनका निशाना बनना स्वाभाविक सी बात है।

गौर करने लायक बात यह है कि 1971 के युद्ध अपराधों पर सुनवाई के लिए न्यायाधिकरण के गठन के बाद उदारवादियों और लोकतंत्रवादियों पर कट्टरपंथियों के हमले और तेज हो गए क्योंकि जमात-ए-इस्लामी के कई प्रमुख लोगों के खिलाफ न्यायाधिकरण ने सजा सुनाई। सामान्यतया बांग्लादेश की अवामी लीग सरकार धर्मनिरपेक्षता की तरफदार है लेकिन कट्टरपंथी गुटों से निपटने में वह काफी शिथिल नजर आ रही है। मजे की बात यह है कि सरकार ने कट्टरपंथी इस्लामवादियों के साथ-साथ कुछ सेक्युलर ब्लॉगरों और बुद्धिजीवियों को भी जेल में इसलिए बंद कर दिया गया ताकि वह ‘संतुलन’ बनाए रख सके और इस्लामवादियों की गुस्से का शिकार न हो। हालांकि बांग्लादेश में इन हत्याओं, विशेषकर अविजित रॉय की हत्या के बाद जिस तरह से विरोध-प्रदर्शन हुए थे उससे सरकार को एक बड़ा संदेश मिला था लेकिन मजहबी सियासती नफा-नुकसान शायद इस पर ज्यादा भारी पड़ा।

वर्ष 2013 में अंसारुल्लाह बांग्ला टीम नाम के कट्टरपंथी संगठन ने 84 सेक्युलर ब्लॉगरों की एक सूची जारी की थी, जिसमें उन सभी लोगों के नाम शामिल थे, जो कलम के जरिए धार्मिक समानता, महिला अधिकारों और अल्पसंख्यकों को मुद्दा उठाते रहते थे और अब मारे जा चुके हैं। इसके बावजूद सरकार कोई निर्णायक कार्रवाई करने में सफल नहीं हुई। दरअसल आजादी के कुछ समय बाद ही बांग्लादेश अपने धर्मनिरपेक्ष चरित्र से भटकने लगा क्योंकि उसके तत्कालीन सैन्य शासकों ने सत्ता पर पकड़ मजबूत बनाने के लिए इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म की हैसियत प्रदान कर दी थी। इसका एक अन्य कारण बांग्लादेशी जनरलों का पाकिस्तान की ओर झुकाव भी था जहां इस दशक में जनरल जियाउल हक हुदा और ईश निंदा कानून लागू कर रहे थे। 2001 के बाद से वहां पाकिस्तान की ओर से तालिबान और अलकायदा के लड़ाके भी पहुंचने लगे जिन्होंने रिफ्यूजी कैम्पों से रोहिंग्याओं (बर्मी मुस्लिम) को, अफगानिस्तान, कश्मीर और चेचन्या से जिहादियों को भर्ती कर कट्टरपंथियों और तथाकथित जिहादियों की एक खड़ी कर ली।

तमाम आतंकी संगठन पनपे जिन्होंने बांग्लादेश या भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम हिस्सों में आतंकी गतिविधियों को अंजाम दिया जैसे- हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी (हूजी), इस्लामी ओकैया जोटे, जाग्रत मुस्लिम जनता बांग्लादेश (जेएमजेबी), जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी)। यहीं से बांग्लादेश में कट्टरपंथी जमातें ताकतवर हुईं और धर्मनिरपेक्ष धीरे-धीरे कमजोर होकर हाशिए की तरफ जाने के लिए विवश हुए। चूंकि सरकारें कट्टरपंथी सहयोग पर टिकीं थीं इसलिए वे उनके खिलाफ कोई कदम उठाने में समर्थ नहीं हुईं। हालांकि अब बांग्लादेश की सरकार और न्यायपालिका इस दिशा में कुछ करना चाहती है लेकिन अब यह कार्य आसान नहीं रह गया।

एक जुलाई को हुए आतंकी हमले को देखने के बाद ऐसा लग रहा है कि अब बांग्लादेश कट्टरपंथी जमातों और आतंकी संगठनों के बीच स्थाई रिश्ते बन चुके हैं जिन्हें देश, अवाम और सरकार के लिए बेहद गम्भीर चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए। चूंकि आतंकवाद का असल निशाना वाया बांग्लादेश भारत है इसलिए भारत को भी इसे एक चुनौती के रूप में ही देखना चाहिए। 

(लेखक आर्थिक और राजनीतिक विषयों के जानकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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