आतंकवाद का धर्म नहीं होता और आतंकवादियों का ?

आतंकवाद का धर्म नहीं होता और आतंकवादियों का ?आतंकवाद का धर्म नहीं होता और आतंकवादियों का ?

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने फ्रांस पर आतंकी हमले के सन्दर्भ में कहा था कि मुस्लिम देशों और लोगों ने उतनी मुखर आलोचना नहीं की जितनी करनी चाहिए थी लेकिन भारत का मुस्लिम समाज सड़कों पर उतरकर आतंकवाद की भर्त्सना कर रहा था। चिन्ता का विषय होना चाहिए कि ये आतंकवादी किसी परिवार में जन्मे होंगे और उनके माता-पिता ने कुछ संस्कार दिए होंगे, वे चाहे जिस परिवार का धर्म लेकर जन्मे थे, मज़हबी तालीम और परवरिश में क्या चूक हुई है, यह चूक आगे न हो यही उपाय है आतंकवाद रोकने का।

ओबामा ने ओसामा बिन लादेन को मरवाकर समन्दर में फिकवा दिया था उसे अन्तिम संस्कार भी नसीब नहीं हुआ लेकिन यदि अमेरिका ने उसकी लाश को जनता के हवाले किया होता तो क्या होता। इतना ही नहीं जो उससे छोटे आतंकवादी मारे जाते हैं उनका क्या होता है। कश्मीर में भारतवासी जो नजारा देखते हैं उसमें तो उन्हें कब्रिस्तान में न केवल सम्मानित जगह मिलती है बल्कि अन्तिम यात्रा होती है और हुजूम उमड़ता है।

 रूस और फ्रांस के राष्ट्रपतियों ने आतंकवादी संगठन आइसिस को नेस्तनाबूद करने का संकल्प लिया है लेकिन आइसिस ही क्यों दुनिया के हर देश में आतंकवादी संगठन हैं जिनमें अलकायदा, अलबद्र, हरकतुल मुजाहिदीन, हिज़बुल मुजाहिदीन, इस्लामिक मुजाहिदीन, जैशे मुहम्मद, लश्करे तैयबा, सिमी, इंडियन मुजाहिदीन जैसे कितने ही संगठन शमिल हैं। पुतिन ने कहा आतंकवादियों को 40 देशों से पैसा मिलता है जिनमें कुछ तो जी-20 के सदस्य है। यदि ऐसा है तो वे सरकारें आतंकवाद के लिए जिम्मेदार हैं जो ऐसा करती हैं।

सोचने की बात यह भी है कि आतंकवादियों को मार डालने से क्या आतंकवाद समाप्त होगा। ओसामा के मारे जाने के बाद भी जवाहिरी ने कमान संभाली थी अब कोई और संभाल रहा होगा। आतंकवादी भूखे-नंगे नहीं हैं, उन पर जुल्म भी नहीं ढाया जा रहा है और उनका मज़हब यदि है कोई तो वह भी खतरे में नहीं है इसलिए आतंकवाद से वह ‘‘सैडिस्टिक प्लेज़र” यानी दूसरों के दर्द से आनन्द के अलावा क्या हासिल करते हैं। पता लगना चाहिए कि आतंकवाद की मानसिकता कब और क्यों पैदा होती है। यह विद्वानों की रिसर्च का विषय है कठिनाई यह है कि रूस और अमेरिका दोनों ही बगदादी को समाप्त करने पर लगे हैं परन्तु वे मोदी की बात नहीं मानते और आतंकवाद से मिलकर नहीं लड़ रहे हैं। उनके स्वार्थ अलग-अलग हैं। बेहतर होगा अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय मिलकर दुनिया से आतंकवाद समाप्त करने की बात सोचे, केवल वही कांटा जो अमेरिका या रूस को चुभ रहा है उसी को निकालने से काम नहीं चलेगा। 

धरती पर हैवानियत तभी तक है जब तक उसे शह देने और शरण देने वाले मौजूद हैं। भले ही आतंकवादी इस्लाम के नाम पर तबाही मचाते हैं और ‘‘अल्लाह ओ अकबर” का नारा लगाकर फ्रांस में बम फेंकते हैं परन्तु ये ‘‘नाख़ुदा और शैतान” के बन्दे हैं। फ्रांस के पहले चेचन्या, न्यूयॉर्क और भारत में हमले कर चुके हैं जिनमें भी तमाम जानें गई थीं। पहले ऐसी घटनाएं इक्का दुक्का हुआ करती थीं।   

आतंकवादी चाहे जितना कहे कि वे पैगम्बर ए इस्लाम को मानते हैं और कुरान शरीफ के बताए रास्ते पर चलकर इस्लामिक स्टेट बनाना चाहते हैं परन्तु कोई नहीं मानेगा। यह मुस्लिम नौजवानों को बरगलाने का तरीका भर है। हैवानियत के साथ इंसानियत की लड़ाइयां पहले भी हुई हैं और आगे भी होंगी। यदि हैवानियत जीत गई तो कयामत का दरवाजा खुल जाएगा। दुनिया के हुक्मरानों पर बहुत बड़ी   जिम्मेदारी है।

हमारे देश में देवासुर संग्राम का वर्णन आता है जब बुद्धिबल से राक्षसों का विनाश किया गया था। फ्रांस ने अपने घाव ठीक होने का इन्तजार न करके हैवानियत को मिटाने का सिलसिला आरंभ कर दिया लेकिन यह संग्राम केवल अपने देश के हित के लिए न होकर निष्पक्ष भाव से इंसानियत को बचाने के लिए होना चाहिए।

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