आवारा और लाचार पशुओं का ठिकाना 'जीव आश्रय गौशाला'

आवारा और लाचार पशुओं का ठिकाना जीव आश्रय गौशालागाँव कनेक्शन

लखनऊ। खेतों से लेकर सड़क तक आवारा जानवर अक्सर परेशानी का सबब बनते हैं लेकिन इनसे छुटकारा पाने का उपाय न ग्रामीण इलाकों में होता और न शहरों में। लेकिन लखनऊ जिले में अगर आप आवारा जानवरों से परेशान हैं या आप किसी जानवर बीमार और लाचार देख कर रहे हैं जो एक फोन पर ही आपकी समस्या सुलझ सकती है।

लखनऊ में कानपुर रोड पर आवारा और बीमार पशुओं के लिए कान्हा उपवन में जीव आश्रय नाम से आश्रम चलाया जा रहा है जहां अस्पताल से लेकर उनके रहने खाने का पूरा इंतजाम है। 'जीव आश्रय' जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर पूर्व

दिशा में नादरगंज में 54 एकड़ में बना हुआ है। ये सैकड़ों भटके और आवारा पशुओं के लिए एक ठिकाना हैं। पशुओं को रखने के लिए बाड़े बनाए गए हैं। सांड और बैल के लिए आठ बड़े बाड़े बनाए गए हैं, जिसमें करीब 950 (सांड और बैल) है और गायों के लिए बारह बड़े बाड़े हैं, जिसमें करीब 1150 गोवंशीय पशु है। इसके अलावा कुत्ते, बिल्ली, बंदर और दूसरे जानवरों के लिए भी बाड़े बनाए गए। इनमें 140 से अधिक आवारा कुत्ते रखे गए हैं।

वर्ष 2010 में आवारा पशुओं के लिए 'कान्हा उपवन'  बनाया गया था, जिसकी देखरेख की जिम्मेदारी नगर निगम लखनऊ को दी गयी थी। उसके बाद दिसम्बर 2012 में पशुहित में काम करने वाली लखनऊ की एक गैर सरकारी संस्था 'जीव आश्रय गौशाला' ने कान्हा उपवन की देखरेख और इसको चलाने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। जीव आश्रय को यह जिम्मेदारी जिलाधिकारी और नगर निगम के अधिकारियों की सहमति से मिली थी।

जीव आश्रय के मुख्य सचिव यतिंद्र त्रिवेदी बताते हैं, "इस समय जीव आश्रय में 1800 पशु है जिसमें गाय, बैल, सांड शामिल है, 140 कुत्ते और चार बंदर हैं जिनका इलाज चल रहा है। नगर निगम लखनऊ के द्वारा यहां पर आवारा पशुओं या जिनकी हालत गंभीर है उन पशुओं को लाया जाता हैं। उसके बाद इनकी देखरेख की जिम्मेदारी हमारे स्टाफ के ऊपर ही होती हैं।" 

यतिंद्र आगे बताते हैं, "यहां पर दुधारु पशुओं से लगभग 60 से 70 किलो दूध उत्पादित होता है, उसमे जानवर के पशुओं (कुत्ता-बिल्ली) को पिलाने के अलावा जो बचता है उसे बेच दिया जाता है।"

जीवाश्रय में रखे गए पशुओं को खिलाने के लिए गौसेवा आयोग उत्तर प्रदेश की तरफ से भूसा, चोकर और खाने की सामग्री उपलब्ध कराई जाती हैं। इसके अलावा उपवन के अन्दर के खेतों में हरी घास भी उगाई जाती हैं। बाकी का खर्च जीव आश्रय गौशाला उठाता हैं, जो कि गौशाला को दान और अन्य संस्थाओं की तरफ से मिली मदद से मिलती हैं। इसके अलावा यहां रखे गए पशुओं के गोबर से कमपोस्ट खाद भी बनायी जाती हैं और किसानों को उपलब्ध कराई जाती है।

कान्हा उपवन का कॉल सेण्टर

कॉल सेंटर के माध्यम से लोग आसानी से कान्हा उपवन में बात कर सकते हैं और उन्हें किसी भटकते, घायल, बीमार पशु व जानवरों की जानकारी दे सकते हैं। कॉल सेण्टर के इंचार्ज देवेन्द्र सिंह रावत बताते हैं, "किसी घायल अथवा बीमार पशु की जानकारी मिलने पर हमारी टीम वहां जल्द से जल्द पहुंचने की पूरी कोशिश करती हैं। और जो कुछ केस तो फोन पर ही निवारण कर देते है। हमारी प्रतिक्रिया का समय 30 मिनट हैं और तीस मिनट के अन्दर घटना की जगह पर पहुंचने  कोशिश करते हैं। अभी हमारे पास रोज लगभग 40 से 50 कॉल आते है।" कान्हा उपवन के कॉल सेण्टर और अन्य जानकारियों के माध्यम से अब तक 16000 पशुओं का इलाज व उन्हें बचाया गया हैं। अगस्त 2013 में कान्हा उपवन ने अपना खुद का कॉल सेण्टर भी शुरू किया था। यह कॉल सेंटर सुबह आठ बजे से रात के दस बजे तक काम करता है। इसमें चार लोगों का स्टाफ भी है।

अस्पताल और दवाईयों की सुविधा

पशुओं को जल्द से जल्द ठीक करने के लिए कान्हा उपवन में अस्पताल की भी सुविधा है, जो कि चौबीसों घंटे खुला रहता हैं। अस्पताल के अन्दर ओपीडी, ऑपरेशन थिएटर, आकस्मिक कक्ष अलग-अलग बनाए गए हैं। वर्तमान समय में अस्पताल में कुल पांच डॉक्टर, 17 पशुमित्र, 12 ड्रेसर और एक फार्मसिस्ट काम कर रहे हैं। इसके अलावा अस्पताल के पास अपनी पांच एम्बुलेंस व चार दो पहिया वाहन हैं। यहां प्रशासनिक, चिकित्सालय व अन्य काम करने वालों को मिलाकर कुल 150 से अधिक लोग काम करते हैं। दवाईयों के लिए मेडिकल स्टोर की भी सुविधा है, जिसमें पशु को ठीक करने के लिए सारी दवाएं उपलब्ध है। 

जीवाश्रय के नंबर

एबुंलेस- 080093922222, 9580715571

डॉक्टर के लिए- 9919914444 

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