आयुष विंग में होम्योपैथिक की मीठी गोलियां तक नहीं

आयुष विंग में होम्योपैथिक की मीठी गोलियां तक नहींgaon connection

लखनऊ। मरीजों का दर्द दूर करने के लिए सरकारी अस्पतालों में शुरू किए गए आयुष विंग में दवाएं तो दूर होम्योपैथिक की मीठी गोलियां तक नहीं मिल पा रही हैं। आयुष विंग में होम्योपैथिक, यूनानी और आयुर्वैदिक विधा के डॉक्टर तो हैं लेकिन वो सिर्फ परामर्श ही दे पा रहे हैं। पिछले कई महीनों से इन केंद्रों में दवाएं नहीं मिल पा रही हैं।

अंग्रेजी दवाओं से दूर भाग रहे मरीजों का इलाज करने के लिए सरकार वैकल्पिक चिकिस्सा के रुप में प्रदेश के सभी जिला अस्पतालों में आयुष विंग की शुरूआत की थी। इस विंग में आयुर्वेद, योगा, यूनानी, सिद्धी (दक्षिण भारतीय चिकिस्सा पद्धति) और होम्योपैथी पद्धिति के चिकित्सक एक ही छत के नीचे बैठते हैं। विंग में मरीजों के लिए दवाओं का भी इंतजाम किया गया था। लेकिन अब यहां भी सिर्फ परामर्श मिल रहा है। दवाएं बाहर से लिखी जा रही हैं।

उन्नाव जिला अस्पताल में अपनी बेटी का इलाज कराने पांच किलोमीटर दूर से आए मगरवारा गांव के सुरेश कुमार (32 वर्ष) बताते हैं, ''बिटिया को बुखार आने पर अस्पताल आया था। होम्योपैथिक वाले डॉक्टर को दिखाया। उन्होंरहने देखा तो लेकिन दवा बाहर से लिख थी। पहले कुछ मीठी गोलियां यहीं मिल जाती थी तो अच्छा था।”

प्रदेश के सभी जिला अस्पतालों और कुछ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 84 विंग खोले गए थे। इनमें इन विधाओं के 1902 विशेषज्ञों को तैनात किया गया है। बावजूद इसके यह मरीजों को स्वास्थ्य लाभ नहीं दे पा रहे हैं।

सुलतानपुर जिले के आयुष विभाग में दवाओं की खरीद इस वर्ष नहीं हो सकी है। कुछ ऐसा ही हाल चित्रकूट जिले का भी है। चित्रकूट जिले में इस वर्ष दवाओं की खरीद नहीं हो सकी। पिछले वर्ष की जो भी दवाएं स्टॉक में बची थी उसी से चिकित्सक काम चलाने को मजबूर हैं। चिकित्सकों का कहना है कि अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को मजबूरन अस्पताल के बाहर की दवाएं लिखी जा रही हैं। कुशीनगर जिले में वर्ष 2013-2014 के बाद से आयुर्वेदिक दवाओं की खरीद नहीं हुई है। नाम न छापने की शर्त पर एक डॉक्टर ने बताया, “कई बार सीएमओ को लिख चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही हैं। अब दवाएं घर से तो ला नहीं सकते।”

कमोबेश यही हाल मऊ, सोनभद्र व भदोही का भी है। इन जिलों में बजट मौजूद होने के बाद भी दवाओं की खरीद नहीं की जा सकी। बलिया के किसी भी प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में दवा उपलब्ध नहीं है। दवाओं के साथ ही आयुष विंग में चिकित्सकों की भी कमी है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार देश के 23,458 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 4,276 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 600 जिला अस्पताल में सिर्फ 9,500 आयुष चिकित्सकों को पिछले चार वर्षों में तैनाती दी जा सकी है। जबकि इन स्वास्थ्य केंद्रों पर 34410 चिकित्सकों की जरूरत है। वहीं प्रदेश में अब भी आयुष विभाग में 142 चिकित्सकों के पद रिक्त हैं।

आयुष विभाग में दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता न होने पर आयुष मेडिकल एसोसिएशन के महासचिव डॉ. आईएम तव्वाब बताते हैं, ''केंद्र सरकार से दवाओं की खरीद के लिए दिसंबर में बजट मिल पाता है। इसके बाद राज्य स्तर से दवाओं की खरीद के लिए मार्च माह तक आदेश आता है। तब तक कंपनी का कांट्रैक्ट रेट न होने व विभाग की ओर से दवाओं की खरीद पर ध्यान न देने से दवाओं का खरीद नहीं हो पाती और दवा का टोटा साल भर बना रहता है।" डॉ. आईएम तव्वाब आगे बताते हैं, ''अगर दवा खरीद की सही नीति शासन स्तर पर बनाई जाए और जरूरत के मुताबिक दवा खरीद की अनुमति सीएमओ को दी जाए तो इस समस्या का हल निकल सकता है।" 

आयुष केंद्रों को बढ़ावा देने की वकालत करते हुए वो आगे बताते हैं, ''बदलते दौर के साथ लोगों का होम्योपैथिक व आयुर्वेदिक विधि की ओर रुझान तेजी से बढ़ रहा है। इन विंग में रोज दो सौ से अधिक मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। बावजूद इसके शासन की ओर से इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।"

आयुष विभाग के डीजीएम डॉ अश्विनी कुमार बताते हैं, “दवाओं के लिए आयुष विभाग के प्रति डॉक्टर के हिसाब से एक लाख रुपये का बजट जारी किया जाता है। सभी जिलों को बजट जारी किया जा चुका है लेकिन कुछ जिलों में अब तक दवाओं की खरीद नहीं हुई है। इसकी जानकारी उन्हें मिली है और वह जांच कर रहे हैं।”

दवाओं के लिए बजट की कमी के साथ समस्या जानकारी के न होने की भी है। आयुष विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “सभी आयुष विंग सीएमओ के अधीन हैं और इन्हें ही दवाएं लेनी होती हैं। लेकिन सीएमओ एलोपैथी से जुड़े हैं। उन्हें इन पद्धतियों की दवाओँ की जानकारी नहीं हैं। इसलिए किसी पचड़े में फंसने से बचने के लिए भी वो दवाएं की खरीद से बचते रहते हैं।” इस अधिकारीक के मुताबिक जल्द नई आयुष नीति बनाई जा रही है, अगर ऐसा हुआ तो दवाओं की खरीद आसान हो सकेगी।

रिपोर्टिंग - श्रीवत्स अवस्थी 

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