अब बैंकिंग सिस्टम को सुधारने का वक़्त

अब बैंकिंग सिस्टम को सुधारने का वक़्तgaonconnection

बैंकिंग व्यवस्था किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए जीवन रेखा की तरह होती है क्योंकि बैंक आर्थिक विकास को सक्रिय बनाने तथा उसे स्थायित्व प्रदान करने में उत्प्रेरक की भूमिका में रहते हैं। 

विकासशील देशों के मामले में बैंकों से इस प्रकार की अपेक्षा और बढ़ जाती है इसलिए भारत को इस मामले में अपवाद की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता लेकिन भारतीय बैंकिंग व्यवस्था पिछले कुछ समय से कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रही है जिसका समाधान अब तक प्रयासों में स्पष्टतः नहीं दिख रहा है। सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि ‘विकास के लिए सशक्त बैंकिंग प्रणाली’ एक अतिआवश्यक घटक है लेकिन बैंकों के तिमाही परिणामों में निहित इस तथ्य की अनदेखी नहीं जा सकती कि भारतीय बैंकों, विशेषकर सरकारी बैंकों, जिनका कुल बैंकिंग कारोबार के 70 प्रतिशत पर कब्जा है, ने फंसे हुए कर्ज (नाॅन परफार्मिंग एसेट्स; एपीए) की एक विशाल धनराशि को लंबे समय तक छिपाए रखा। इस राशि तथा कुछ अन्य अक्षमताओं व अदक्षताओं सम्बंधी तथ्यों पर नजर डालें तो पता चलता है कि बैंकों ने कार्यदक्षता, साख और विश्वसनीयता के समक्ष संकट निर्मित करने का कार्य किया है। स्वाभाविक है कि अब बैंकिंग प्रणाली आमूल-चूल रूप से सुधारों की मांग कर रही है।  

सरकारी बैंक लगातार फंसे हुए कर्ज के दबाव के नीचे अपनी वित्तीय दक्षता को कमजोर करते हुए दिख रहे हैं। यदि एक वर्ष पहले और वर्तमान वर्ष की तुलना करें तो इस बात का अनुमान आसानी से लगाया जा सकेगा। उल्लेखनीय है कि एक वर्ष पहले की तुलना में सम्पूर्ण बैंकिंग क्षेत्र का डूबता ऋण (एनपीए) लगभग 50 फीसदी बढ़ गया। दिसंबर 2014 में यह मात्रा 2.92 लाख करोड़ रुपए थी। यहां एक भ्रममूलक स्थिति भी दिखती है। वह यह कि नवम्बर 2015 में मूडीज इनवेस्टर सर्विस ने भारतीय बैंकिंग प्रणाली का परिदृश्य ‘नकारात्मक’ से सुधार कर ‘स्थिर’ कर दिया था। उसने उम्मीद जताई थी कि बैंकों के परिचालन माहौल में धीरे-धीरे सुधार आने से भविष्य में एनपीए कम बढ़ेगा। खास बात यह है कि मूडीज ने नवम्बर 2011 में भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के लिए नकारात्मक परिदृश्य का अनुमान जाहिर किया था क्योंकि उसका मानना था कि बैंकों का एनपीए बढ़ रहा है लेकिन पिछले 12 से 18 महीने के दौरान भारतीय बैंकिंग प्रणाली का स्थिर परिदृश्य दर्शाता है कि बैंकों के बेहतर होते परिचालन माहौल से ऋण सम्बंधी समस्या बढ़ने की गति कम होगी जिससे फंसे ऋण का अनुपात अपेक्षाकृत स्थिर होगा। उल्लेखनीय है कि मूडीज ने नवम्बर 2015 में पांच मुख्य कारकों पर निर्भर अपने आकलन में उक्त निष्कर्ष निकाला था। 

ये पांच कारक हैं-परिचालन माहौल में सुधार, स्थिर परिसम्पत्ति जोखिम एवं पूंजी, स्थिर वित्तपोषण एवं नकदी लेकिन पिछली तिमाही में नतीजे इसके उलट दिख रहे हैं क्योंकि देश के सरकारी बैंकों के प्रावधान का आंकड़ा सितंबर से दिसंबर 2015 के बीच एक लाख करोड़ रुपए तक बढ़ गया। तो क्या माना जाए कि क्रेडिट रेटिंग संस्थाएं, बैंक और यहां तक कि भारतीय नियामक संस्थाएं भी सही अध्ययन नहीं करतीं या फिर सही आकलन पेश नहीं करतीं? 

भारत सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बैंकों के कायाकल्प की मंशा जताई है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्गठन के लिए एक विशेषज्ञ समूह बनाने का संकेत दिया है। उनका कहना था कि देश को अधिक बैंकों की नहीं, बल्कि मजबूत बैंकों की जरूरत है। कर्ज के रूप में बैंकों की फंसी विशाल धनराशि, बैंकों को अपेक्षानुरूप लाभ न होना, कई बैंकों का घाटे में होना सरकार के लिए चिंता का विषय है और बैंकों के लिए सुधार का वक्त। वैसे बैंकिंग प्रणाली में सुधार का मुद्दा लंबे समय से लंबित है। इस सारे सुधार का केंद्रीय बिंदु यह है कि कैसे बैंकों के आॅपरेशनल एवं एडमिनिस्ट्रेटिव मैकेनिज्म को सुधारा जाए ताकि वे लाभदायी संस्थाएं बनने के साथ-साथ समावेशी भी बन सकें। हालांकि अब कई समितियां इस संदर्भ में अपनी रिपोर्ट दे चुकी हैं लेकिन स्थितियों में कोई बदलाव नहीं आया है। हालांकि वर्तमान एनडीए सरकार ने कुल अर्थव्यवस्था का प्रशासन सुधारने के उद्देश्य से बैंकिंग व्यवस्था पर अपनी निर्भरता काफी बढ़ाई है। साथ ही सरकारी बैंकों के प्रशासनिक सुधार की दिशा में ‘स्वायत्त बैंक ब्यूरो’ जैसे कुछ कदम भी उठाए गए हैं ताकि बैंकों के शीर्ष पदों पर नियुक्तियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त किया जा सके।

यदि वर्ष 2014-15 की आर्थिक समीक्षा पर गौर करें तो उसमें बैंकिंग सुधार के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया था और सुधार में चार शीर्षकों/घटकों को शामिल किया गया था अर्थात-अविनियमन (डिरेगुलेशन), पृथक्करण (डिफेरेंशिएशन), विविधीकरण (डायवर्सीफिकेशन) तथा निकास प्रक्रिया सुधार (डिसइंटरिंग) लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह मसला केवल बैंकों के आंतरिक प्रशासन में सुधार तक ही है या फिर इसके लिए जरूरी है कि वाह्य राजनीतिक-विधिक प्रणाली भी दुरुस्त की जाए ? जैसे- न्याय प्रणाली और बैंक सम्बंधी लेनदेन निपटान जिसके चलते बैंकों को अपने ऋण मामलों के निपटारे में वर्षों लग जाते हैं। उल्लेखनीय है कि भारत में अधिकांश डिफाल्टर विधिक खामियों का फायदा उठाते हुए आसानी से फ्रीलोडर की श्रेणी में पहुंच जाते हैं। ज्ञातव्य है कि फ्रीलोडर वह व्यक्ति है जो दूसरों (व्यक्ति या संस्था) की उदारता का लाभ सफलतापूर्वक उठाता है। इस श्रेणी में आते ही कोई डिफाल्टर कानूनी कार्रवाई से बच निकलता है जैसे कि माल्या के मामले में हुआ। ध्यान रहे कि यूनाइटेड बैंक आॅफ इण्डिया ने माल्या को जानबूझकर देनदारी चूकने वाला बताया था लेकिन एक अदालत ने बैंक के इस आरोप को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया यानि माल्या को फ्रीलोडर मान लिया और आज वही माल्या बैंकों की 9000 करोड़ से भी पूंजी हड़प कर देश बाहर चले जाने में कामयाब हो गया।

अध्ययन रिपोर्टें, यहां तक आर्थिक समीक्षा, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को कामकाज में अधिक स्वायत्तता प्रदान करने की बात करती हैं। उल्लेखनीय है कि हमारे पास बाण्ड मार्केट का अभाव है इसलिए बैंक और बीमा कम्पनियांे को सरकारी बॉन्ड खरीदने के लिए विवश किया जाता है। भारतीय बैंकिंग प्रणाली में चुनौतियां अन्यत्र भी उत्पन्न होती हैं जिन्हें नीतिगत एवं संरचनात्मक श्रेणी में विभक्त कर देखा जा सकता है। नीतिगत चुनौतियांे का सम्बंध वित्तीय नियंत्रण से है क्योंकि भारतीय बैंकिंग प्रणाली एक ऐसी स्थिति से ग्रस्त है जिसे ‘दोहरा वित्तीय नियंत्रण’ (डुअल फाइनेंिशयल कंट्रोल) कहा जाता है। बैंकों को सरकार की ओर से जो पैसे के उपयोग करने को लेकर तमाम बाध्यताएं तय की गई हैं अब जरूरत है उनमें कुछ हद तक ढील दी जाए। उदाहरण के लिए वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) के अंतर्गत बैंकों को सरकार की प्रतिभूतियों (सिक्युरिटीज) में धन लगाना, प्राथमिक ऋण क्षेत्र (पीएसएल) जैसे कृषि तथा छोटे व्यापारी को ऋण उधारी की बाध्यताएं आदि। इसके अतिरिक्त अधिसंरचनात्मक क्षेत्रों में एडवांसेज आदि के रूप में भी सार्वजनिक बैंकों की पूंजी चली जाती है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार एलएलआर, प्रतिभूतियों की खरीद और पीएसएल में बैंकों का 60 फीसदी से अधिक धन खर्च/विनियोजित हो जाता है। ऐसे में बैंक बड़े कारोबार में प्रतिस्पर्धा करने में समर्थ नहीं रह जाते। 

इसका तात्पर्य यह हुआ कि बैंकिंग सुधार सीमा रेखा बैंकों के अंदर तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि बाहर तक भी जाएगी। इस दिशा में पहली आवश्यकता बैंकों में अतिरिक्त पूंजी डालने की है। हालांकि इंद्रधनुष ने सार्वजनिक बैंकों में अगले चार वित्त वर्षों (2018-19 तक) में 70,000 करोड़ की पूंजी बजटीय आवंटनों के जरिए डालने के लिए आरम्भिक कदम उठाए हैं लेकिन अभी भी यह गम्भीर बहस का मुद्दा है कि क्या पुनर्पूंजीकरण (रिकैपिटलाइजेशन) सम्बंधी यह प्रावधान बैंकिंग क्षेत्र के संकट को दूर करने के लिए पर्याप्त होगा? 

(लेखक  आिर्थक व राजनैितक मामलों के जानकार हैं, यह उनके अपने विचार हैं।)

Tags:    India 
Share it
Top