अब चावल हो सकता है महंगा

अब चावल हो सकता है महंगागाँव कनेक्शन

लखनऊ। दाल और प्याज़ के बाद अब चावल के मूल्यों में आने वाले समय में तेज़ बढ़ोत्तरी की संभावना है क्योंकि ख़रीफ-2015 में सूखे का उत्पादन पर असर पड़ा ही है, लगातार दो सूखा झेल चुके भारत का चावल भण्डार भी तेज़ी से घट रहा है।

''भारत सरकार ज़रूर 90 मिलियन मीट्रिक टन से ज्यादा का खरीफ चावल उत्पाद का अनुमान लगा रहा है लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब व हरियाणा जैसे राज्यों में सूखे जैसी

परिस्थियों के कारण उत्पादन 89 मिलियन मीट्रिक टन तक ही हो पाएगा" राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले देश के सबसे पुराने व्यापार संगठनों में से एक एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट में कहा। खाद्यान्न पर पडऩे वाले खराब मॉनसून के प्रभाव के बारे में संगठन ने इसी सप्ताह अपनी रिपोर्ट जारी की है। 

देश के सबसे बड़े चावल उत्पादक राज्यों में से एक उत्तर प्रदेश में खरीफ 2014-15 व खरीफ 2015-16 में लगातार दो साल सूखा पड़ा है। प्रदेश के कृषि विभाग के पास इस साल के धान उत्पादन के आंकड़े तो अभी उपलब्ध नहीं हैं लेकिन पिछले साल सूखे के कारण धान उत्पादन 13 लाख टन से भी ज्यादा घट गया था, इस बार स्थिति और बदतर हो सकती है। 

प्रदेश में धान उत्पादन का गढ़ कहे जाने वाले पूर्वी उत्तरप्रदेश के गोरखपुर के किसान दयाराम (42 वर्ष) को इस वर्ष धान की फसल में अच्छा खासा नुकसान हुआ है। पिछले वर्ष प्रदेश में सूखा ज़रूर था लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में वर्षा की इतनी कमी नहीं हुई थी, लेकिन इस वर्ष तो मॉनसून के रास्ते बदलने के चलते पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत सम्पूर्ण गंगा तराई बेल्ट में पानी कम बरसा जिसका खामियाज़ा दयाराम को भी भुगतना पड़ा।

पिछले वर्ष गंगाराम ने दो एकड़ में धान बोया था; डेढ़ एकड़ में हाईब्रिड 'अराईज़ 6444' व बाकि खेत में 'संभा' और 'चिरांग' जैसी सामान्य किस्में। ''पिछले साल पानी मिल गया था तो चार पानी ही लगाया था कुल 10 हज़ार रुपए का खर्च आया और उत्पादन करीब 30 कुंतल के आस-पास मिला, इस बार हालत खराब हो गई," दयाराम आगे बताते हैं, ''एक एकड़ में संभा किस्म बोई थी उत्पादन भी केवल 5-6 कुंतल हुआ और आठ सिंचाई की तो केवल एक एकड़ की ही लागत 8 हज़ार तक पहुंच गई।"

''इस बार कटाई खत्म हो जाए तो समझ आएगा कि उत्पादन पर ठीक-ठाक अंतर पड़ा है, जिसका सबसे बड़ा कारण यही रहा कि अगस्त आखिरी से लेकर सितम्बर मध्य तक बारिश ही नहीं हुई", राजा सिंह, संयुक्त कृषि निदेशक (धान्य फसलें), उप्र कृषि विभाग ने बताया।

एसोचैम की रिपोर्ट में चेताया गया है कि जन वितरण प्रणाली और अन्य समाजिक सुरक्षा योजनाओं के चलते जितना भी चावल मौजूद है उसकी खुदरा बाजार में उपलब्धता कम रहेगी। यदि सरकार इस स्थिति से (आयात व अन्य तरीकों से) तुरंत न निपट पाई तो लगातार घटती उपलब्धता का असर मूल्यों के तेज़ उछाल में दिखेगा।

स्थिति इसलिए भी खराब हो रही है क्योंकि देश का चावल भण्डार भी लगातार तेज़ी से घट रहा है। वर्ष 2012 में देश के पास भण्डार में 2.4 करोड़ टन चावल मौजूद था, जो कि 2015 तक महज़ 1.38 करोड़ टन (36.10 लाख टन अनमिल्ड धान के साथ) रह गया। 

''देश में चावल की एक महीने की आवश्यकता 85 से 90 लाख टन है, जबकि सालाना आवश्यकता लगभग 10.80 करोड़ टन के आस-पास है" एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने कहा।

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