अब ग्रामीण भी जेब में पैसे नहीं कार्ड रखते हैं

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रायबरेली। सुमित पटेल (22 वर्ष) अब पहले की तरह अपने साथ ज़्यादा पैसे लेकर नहीं चलते हैं। पिछले वर्ष उसने अपने गाँव के नज़दीकी बैंक (बैंक ऑफ बड़ौदा) में खाता खुलवाया है, जिसके बाद उसे एटीएम कार्ड मिला है। हाल ही में शहर जाकर सुमित ने एटीएम सुविधा का प्रयोग किया और अपने लिए एक नया मोबाइल फोन लिया है।

रायबरेली जिला मुख्यालय से 16 किमी. पूर्व दिशा में अहमदपुर गाँव के सुमित एटीएम मिल जाने से बहुत खुश हैं। वो बताते हैं, ‘’पहले कोई बड़ा सामान लेने के लिए गाँव से शहर पैसे ले जाने पड़ते थे पर अब एटीएम मिल गया है, जिससे शहर में ही पैसे आसानी से निकाल लेता हूं।’’

भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग का लगातार विस्तार हो रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट 2014-15 के अनुसार, भारत के 70 फीसदी गाँव बैंकिंग सुविधाओं का प्रयोग कर रहे हैं। भारत में सुदूर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले दो लाख से ज़्यादा लोगों के पास खुद का एटीएम कार्ड है।

सुमित की तरह ही उनके गाँव के 15 लोगों के बैंक में खाते हैं। अहमदपुर गाँव के धीरेंद्र चौधरी ने तीन महीने पहले केंद्र सरकार की जनधन योजना में खाता खुलवाया है। धीरेंद्र बताते हैं, “हमने पिछले महीने बैंक से जन-धन योजना में अपना खाता खुलवाया है। अभी हमें सिर्फ पासबुक मिली है। कार्ड पंद्रह दिन बाद मिल जाएगा।’’

ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग की लोकप्रियता बढ़ाने में भारत सरकार की जन-धन योजना की बड़ी भागीदारी है। प्रधानमंत्री जनधन योजना में दिनांक सात अक्टूबर 2015 को जारी नवीनतम खाता सूची के मुताबिक, मौजूदा समय में भारत में 18.7 करोड़ खाते खोले जा चुके हैं। इनमें से कुल 11.37 जनधन खाते ग्रामीण क्षेत्रों के हैं।

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी जन-धन योजना को सबसे अधिक हिस्सेदारी उत्तर प्रदेश में ही मिली है। प्रदेश में जन-धन योजना के अंतर्गत 2.9 करोड़ खाते खोले जा चुके हैं जो किसी भी प्रदेश से अधिक हैं। इन पूरे खातों में से ग्रामीण क्षेत्रों में खोले गए खातों की संख्या 1.7 करोड़ है। इस योजना में सबसे ज़्यादा पसंद की जाने वाली बैंक (बैंक ऑफ बड़ौदा) है। ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं के बढ़ते दायरे को अहम बताते हुए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री एआर प्रसाद बताते हैं, ‘’गाँवों में बैंकों की पहुंच बढ़ने से न केवल लोगों की निजी जीवन में बदलाव आया है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी सुधार हुआ है। आज गाँवों में लोग कृषि ऋण औऱ अपनी निजी ज़रूरतों के लिए बैंक का सहारा ले रहे हैं, जिससे गाँवों में बैंकों की पहुंच लगातार बढ़ रही है।’’

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

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