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अब तो लालटेन का नशा हो गया

अब तो लालटेन का नशा हो गयाकानपुर, सोलर लालटेन, गाँव कनेक्शन

मड़ौली (कानपुर)। कानपुर के गाँव की कुछ महिलाओं ने मिलकर गरीबी से जंग छेड़ दी है। ये 25 महिलाएं गाँव में महीने की चार तारीख को इकट्ठा होती हैं। दूरदराज़ के गाँवों से आने वाली ये महिलाएं हर महीने अपने अपने गाँवों से 1,700 रुपए कमाकर लाती हैं और उन्हें खुशी-खुशी एक कोष में जमा कर देती हैं।

25 अलग-अलग गाँवों से आने वाली ये वो औरतें हैं जो आज से कुछ साल पहले या तो अपने पतियों से ठुकरा दी गई, या जिन्हें उनके बच्चे गाँवों में अकेला छोड़कर शहरों में जा बसे या फिर जिनके पति अब इस दुनिया में नहीं रहे। इनमें से हर महिला का अपना एक इतिहास है जिसकी अंधेरी गलियों से निकलकर न केवल ये महिलाएं अपनी जिन्दगी को रौशन कर रही हैं बल्कि गाँवों में फैले अंधेरे को भी दूर कर रही हैं।

इन सारी महिलाओं की जि़न्दगी में आए इस बदलाव के पीछे हैं वो सोलर लालटेन जो एक गैर सरकारी संगठन 'चेतना महिला समिति' ने इन्हें मुहैया कराई। कानपुर से करीब 70 किलोमीटर दूर अकबरपुर तहसील के मड़ौली गाँव की अरुणा देवी (50 वर्ष) बताती हैं, ''हमारे बच्चे बाहर पढ़ते हैं, लड़कियों की शादी हो चुकी है। दो साल पहले पति की मौत हो गई। घर में बड़ा अकेलापन होता था। 2004 में मैं स्वयं सहायता समूह से जुड़ी। दो महीने पहले समूह में हमें सोलर लाईट के बारे में जानकारी दी गई। हमारे गाँव में दिनभर में केवल चार से पांच घंटे बिजली आती है। पहले लोग अंधेरे में बैठे रहते थे। पर जब से सोलर लालटेन गाँव में आई है तबसे ये हर इन्सान की ज़रुरत बन गई है।" फिर अपनी साथी महिलाओं की तरफ  देखकर वो शरमाते हुए बोलती हैं, ''अब तो लालटेन का नशा हो गया है।"

गाँवों से होने वाले पलायन ने जहां अरुणा देवी जैसे बजुर्गों को अकेला रहने पर मजबूर किया है वहीं गाँवों से काम के सिलसिले में शहर आकर शहरों में शोषण का शिकार होने की मजबूरियों से भी गाँव वाले जूझते रहे हैं। सौर ऊर्जा को लेकर हुई इस पहल से जुडऩे से पहले अकबरपुर के तिंगाई गाँव की गीता कश्यप (35 वर्ष) बताती हैं, ''हम पहले हाईवे पे मजदूरी करते थे। दिन का 150 रुपए मिलता था। जब हमें समूह के बारे में बताया गया तो हम घबरा रहे थे। हमने कहा था कि हम गरीब हैं, हमारे घर पर यूनिट मत लगाईये। हमारे घर में लालटेन लगाने की जगह भी नहीं थी। बाद में घर की गृहस्थी का कुछ सामान हटाकर हमने लालटेन के पैनल लगाए। शुरू में हमने लोगों की दुकानों में फ्री में लालटेन बांटे। कहा, दो दिन इस्तेमाल करके देखो। धीर-धीरे लोग हमें जानने लगे। अब एक लालटेन से हमें दिन की पांच रुपए की कमाई हो जाती है। इस तरह से महीने में दो ढ़ाई हज़ार रुपए हम आराम से कमाने लगे हैं।"

सौर ऊर्जा से अपनी जि़न्दगी रौशन करने वाली इन महिलाओं की जि़न्दगी की असल कहानियां खोजने निकलते हैं तो लगता है जैसे कोई फिल्मी सफर तय कर आए हों। रामपुर के कुड़हा गाँव की शिखा यादव (38 वर्ष) को उनका नसीब हज़ारों किमी दूर पश्चिम बंगाल से यहां ले आया। अपने हल्के से बंगाली लहजे में वो बताती हैं, ''हम पश्चिम बंगाल से यहां आए। गरीब घर के थे। हावड़ा में एक सरदारजी ने हमें पाला। थोड़ा बड़े हुए तो उन्होंने हमारी शादी करवा दी और हमें यहां भेज दिया। हमें तो पता भी नहीं था कि हम जा कहां रहे हैं। यहां 20 साल तक हमने पति के साथ खेती की, लेकिन अब गाँव का ज़मीदार उस ज़मीन को बेच देना चाहता है। पति हैं नहीं, और ज़मीन जेठानी के नाम पर है। लालटेन किराये पर देने में जो कमाई होती है, उससे अब हम अपना मुकदमा लड़ेंगे।"

शिखा की ये मजबूरी गाँवों में रहने वाले कमोवेश हर खेतीहर मजदूर की कहानी कहती है। गरीबी और कर्ज़ का ये गणित उन्हें सम्मान के हक से हमेशा वंचित करता रहा है। ''पहले ज़मीदारों से उधार लेना पड़ता था। उनका पैसा नहीं चुका पाते थे तो उनके घर काम करना पड़ता था। एक बार कर्ज़ इतना ज्यादा हो गया कि भैंस बेच कर चुकाना पड़ा। पति की मौत हो चुकी है।" वो आगे कहती हैं, ''जबसे हमारे घर में यूनिट लगा है महीने की अच्छी कमाई हो जाती है। साथ ही लोग इज्जत भी करने लगे हैं कहते हैं तुम तो हमारे घर में उजाला ले के आ गई। अब बच्चे कभी पैसे मांगते हैं तो उन्हें मना नहीं करना पड़ता।"

अब तक अपने वर्तमान से लड़ती रही शिखा अब बेसाख्ता अपने भविष्य के सपने भी संजोने लगी हैं। सौर ऊर्जा से कमाए पैसे से उन्होंने सालाना 2,500 रुपए का बीमा भी करवाया है। ''बहुत पहले से सुनते थे अपना बीमा होना चाहिए। पर कभी पैसे नहीं रहते थे। अब बीमा करा पाए हैं।"

गाँवों में सौर उर्जा को लेकर आए इस नए उत्साह ने सरकारी तिरस्कार से अंधेरे में डूबे गाँवों को रोशनी की एक उम्मीद दिखाई है। नरिया गाँव की रामवती (38 वर्ष) बताती हैं, ''कैसे उनके गाँव की जि़दगी शाम को सूरज डूबने के साथ खत्म हो जाया करती थी उसे इन सौर उर्जा से चलने वाली लालटेनों ने जैसे फिर से जिन्दा कर दिया है।"

रामवती आगे बताती हैं, ''हमारे गाँव में बिजली की हालत बहुत खराब है। कभी 15-15 दिन तक बिजली नहीं आती। कोटे से ढाई लीटर मिट्टी का तेल मिलता था, जो महीने भर नहीं चलता था। इसलिए अंधेरा होने से पहले ही घर का सारा काम निपटा पड़ता था।"

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