अभ्रक खदानों में छुपाई जाती हैं बच्चों की मौतें

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कोडरमा/भीलवाड़ा/सायदापुरम। देश की उन अवैध अभ्रक की खदानों की गहराई में बच्चों की मौत के रहस्य दबे हुए है, जहां वयस्कों के साथ पांच साल के बच्चे भी अंधेरे में दुबक कर काम करते हैं। पिछले दो महीने में मारे गए सात बच्चों की मौत की खबर को छुपाया गया।

प्रमुख अभ्रक उत्पादक राज्य- बिहार, झारखंड, राजस्थान और आंध्र प्रदेश में तीन महीने की लगातार पड़ताल में पता चला है कि सौंदर्य प्रसाधन और कार के रंग में चमक लाने के लिए उपयोग में आने वाले मूल्यवान खनिज के खनन और छंटाई के लिये उपयुक्त नन्हें हाथों से बाल मजदूरी करवाई जाती है।

लेकिन मजदूरों और स्थानीय लोगों के साथ बातचीत में पता चला कि सरकारी पंहुच से दूर इन “भयावह” खानों में काम कर रहे बच्चे न केवल अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, बल्कि वे इन गैरकानूनी, खस्ताहाल खदानों में दम तोड़ रहे हैं। जून से अब तक सात बच्चों की मौत हो चुकी है। बिहार के ईंट-गारे से बने चंदवाड़ा गाँव में रहने वाले एक पिता के दुख ने अवैध खनन की बदसूरत वास्तविकता को उजागर कर दिया। देश के अभ्रक उत्पादन का करीबन 70 प्रतिशत उत्पादन अवैध खनन से होता है। 

वासुदेव राय प्रताप के 16 वर्षीय पुत्र मदन की 23 जून को पड़ोसी राज्य झारखंड की अभ्रक खदान में दो अन्य वयस्क श्रमिकों के साथ मौत हो गई थी किशोर की मौत पर शोक जताने आए मित्रों और परिवारजनों के साथ अपने घर के बाहर चारपाई पर बैठे प्रताप ने कहा, “मैं नहीं जानता था कि खानों में काम करना इतना खतरनाक है। अगर मुझे पता होता, तो मैं उसे कभी भी नहीं जाने देता।” 

“उन्होंने बताया कि खान ढहने के बाद पूरे एक दिन खुदाई करने पर उसके शव को बाहर निकाला जा सका। उन्होंने मुझे बताए बिना उसका अंतिम संस्कार कर दिया। उसके दाह संस्कार से पहले मैं अपने बेटे को देख भी नहीं पाया।” 

प्रताप जैसे अन्य पीड़ित परिवार और खान संचालक मौत की सूचना नहीं देते हैं, बल्कि संरक्षित वन भूमि पर अवैध खनन समाप्त कराने का खतरा उठाने की बजाय वे अपनी क्षति की भरपाई राशि ले लेते हैं। मदन एक अवैध खदान में काम करता था और उसकी मौत पर प्रतिक्रिया देने के लिए वहां कोई भी उपलब्ध नहीं था।

भारतीय कानून में 18 साल से कम उम्र के बच्चों से खानों और अन्य खतरनाक उद्योगों में काम करवाने पर प्रतिबंध है, लेकिन बेहद गरीबी में गुजर बसर करने वाले कई परिवार अपने बच्चों की कमाई पर निर्भर होते हैं। 

                                           

वयस्क खदान श्रमिक भी सुरक्षित नहीं

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में पांच साल के लड़के भी के संकीर्ण जर्जर खान में छेनी-हथौड़ी से दिन के आठ-आठ घंटे अभ्रक तोड़ते नजर आए। उनकी बहनें जमीन पर बैठकर दस्तानों के बगैर अंगुलियों से अभ्रक झाड़ कर छांटती हैं और बड़ी उम्र की लड़कियां अभ्रक छांटकर एकत्रित करने वाले स्थान पर ले जाती हैं।

राजस्थान के जोधपुर में लाभ निरपेक्ष खान श्रमिक संरक्षण अभियान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राणा सेनगुप्ता ने बताया, “खदान मालिकों का कहना है कि बच्चे खानों के अंदर काम नहीं करते हैं और वे बाहर काम कर अपने परिवार के लिए थोड़ी अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं।” “लेकिन बच्चों को अंदर या बाहर खान के कहीं भी काम नहीं करना चाहिए। यहां तक की वयस्क श्रमिक भी सुरक्षित नहीं हैं।”

भीलवाड़ा के तिलोली गाँव में बारिश के पानी से आधी भरी एक खदान के पास दो छोटी लड़कियां गंदे टीले पर बैठे अभ्रक के टुकड़े छांट रही थीं। करीबन सात वर्ष की पूजा ने कहा, “मैं खदान के भीतर नहीं जाती हूं। यह बहुत गहरी होती है, मुझे डर लगता है। मैं बड़े टुकड़ों में से छोटे-छोटे टुकड़े छांटती हूं। यह कोई मुश्किल काम नहीं है।”उससे कुछ फुट की दूरी पर बैठी नौ वर्षीय पायल भी नंगे हाथों से अभ्रक के टुकड़े छांट रही थी।

राजस्थान के श्रम मंत्रालय में आयुक्त धनराज शर्मा ने कहा कि उन्हें भीलवाड़ा या “राज्य में किसी अन्य स्थान पर” खानों में बाल श्रमिकों से काम करवाने के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

उन्होंने बताया, “उनके माता-पिता खानों में काम करते हैं और बच्चे उन लोगों के साथ रहते हैं। वे वहां खेलते है और हो सकता है कि वे माता-पिता की मदद के लिए छोटे मोटे काम करते हो। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वे वहां काम करते हैं।” हाल के वर्षों में अभ्रक की मांग बढ़ने से 19वीं सदी का महत्वपूर्ण उद्योग दोबारा सक्रिय हो गया है। 

                                                    

ज्यादातर गैरकानूनी काम

चीन की आर्थिक वृद्धि और वैश्विक स्तर पर “प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधनों” के लिए अभ्रक के प्रति दिवानगी के चलते एक बार फिर इस क्षेत्र में रुचि बढ़ी है, जिसके कारण अभ्रक की काला बाजारी होने लगी है। भारतीय खान ब्यूरो के आंकड़े दर्शाते हैं कि 2013-14 में देश में 19,000 टन अभ्रक का उत्पादन हुआ।

लेकिन इसी में यह भी बताया गया कि एक लाख 28 हजार टन अभ्रक का निर्यात किया गया, जिसमें से आधे से अधिक  या 62 प्रतिशत अभ्रक चीन और उसके बाद जापान, अमेरिका, नीदरलैंड और फ्रांस भेजा गया।

भारत में रंग-रोगन बनाने के क्षेत्र में अग्रणी सुदर्शन का कहना है कि विशेषज्ञों का अनुमान है कि देश में जंगलों और खुली पड़ी खदानों से अवैध रूप से खनन कर लगभग 70 प्रतिशत अभ्रक का उत्पादन किया जाता है।

मोबाइल फोन पर सौदा कर इस अभ्रक को विभिन्न व्यापारियों, संसाधकों और निर्यातकों को बेच दिया है और इस प्रकार बिना किसी कागजात के यह विदेशी निर्माताओं तक पंहुच जाता है। भीलवाड़ा में खान संचालक धारा सिंह ने बताया, “हम शहर के एजेंट को अभ्रक बेचते हैं, वह आगे इसे कोलकाता में बड़े खरीदारों को बेचता है और वे उसको चीन, अमेरिका, जर्मनी और ब्राजील को निर्यात करते हैं।” भीलवाड़ा के तिलोली गाँव में खान के पास अभ्रक की छंटाई करती दो छोटी लड़कियों के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि वे स्वयंसेवक हैं। लेकिन कुछ ही देर में चार लोग दो मोटरसाइकिलों पर सवार होकर वहां पहुंचे और बातचीत करने वाले सभी लोगों को उस स्थान से जबरन बाहर करने लगे।

खदानों से मिल रहीं बीमारियां

इस उद्योग में अधिक मजदूरों की जरूरत होने के कारण कुछ देशों के लिए यह आर्थिक दृष्टि से व्यावहारिक नहीं है, लेकिन भारत में यह आय का एक महत्वपूर्ण साधन है, जहां श्रम लागत कम हैं और विशेष रूप से जब बाल श्रमिकों का इस्तेमाल किया जाता है।

बाल अधिकारों के हिमायतियों का कहना है कि अधिकारियों ने वर्षों से इन बाल श्रमिकों की अनदेखी की है। सिर में चोट लगना, कटना और खरोंच, त्वचा, टीबी तथा अस्थमा जैसे सांस के संक्रमण सहित व्यवसायिक खतरों के अलावा गैर कानूनी खानों के खराब रखरखाव में खनन भी घातक साबित हो रहे हैं। 

बीबीए के भूषण ने कहा कि उन्होंने और उनके साथियों ने जून में खनन दुर्घटनाओं में मारे गए लोगों के अधिकतर परिजनों से मुलाकात की और पाया कि उनके जीने का एकमात्र साधन गैर कानूनी खनन है। झारखंड के कोडरमा जिले में डोमचांच के घने जंगलों में एक खदान में, सुशीला देवी बड़ी तल्लीनता से हथौड़े से चट्टानों से अभ्रक तोड़ रही हैं।  छह बच्चों की मां 40 वर्षीय सुशीला देवी बताती हैं, “हमें नहीं पता कि अभ्रक क्या होता है, यह कहां जाता है और इसका इस्तेमाल किसमे किया जाता है। मुझे सिर्फ इतना पता है कि अगर मैं कड़ी मेहनत कर इसे इकट्ठा करूंगी तो मुझे कुछ पैसा मिल जाएगा।” 

खदानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं

खान मंत्रालय के प्रवक्ता वाई एस कटारिया ने कहा कि अभ्रक खदानों की सुरक्षा राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, जिन पर अवैध खदानों को लाइसेंस देने का खनन उद्योग का दबाव बढ़ रहा है।

सामाजसेवी भी इन आह्वानों का समर्थन करते हैं, उनका दावा है कि इससे अभ्रक की काला बाजारी, श्रमिकों का शोषण, दुर्व्यवहार और बच्चों की मौत के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने में मदद मिलेगी। प्रवक्ता कटारिया ने बताया, “केंद्र सरकार के पास खानों के निरीक्षण या उनको नियंत्रित करने के कोई साधन नहीं है।” 

लगभग एक दशक से झारखंड की अभ्रक खदानों में बाल श्रम रोकने की कोशिश कर रहे बीबीए कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले दो महीने में मदन और छह अन्य लोगों की मौत इस समस्या का अंशमात्र है। उनका अनुमान है कि अभ्रक खदानों में मरने वालों में से 10 प्रतिशत से भी कम के बारे में पुलिस को सूचना दी जाती है।

बीबीए के झारखंड परियोजना समन्वयक राज भूषण ने कहा, “हालांकि खानों में मरने वाले बच्चों की संख्या के बारे में कोई आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, क्योंकि यह सब खानें अवैध है। हमें उनके बारे में गाँवों के हमारे नेटवर्क के माध्यम से पता चलता है।” 

“आम तौर पर एक महीने में औसतन लगभग 10 मौत के बारे में पता चलता है। लेकिन जून में हमें 15 साल के दो लड़कों सहित 20 से अधिक लोगों की मौत के प्रमाण मिले हैं।”

मारे गए बच्चों की संख्या के बारे में जानकारी देने के लिए खान सुरक्षा महानिदेशालय के अधिकारी उपलब्ध नहीं थे। सरकारी संगठन-राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने जून में झारखंड के कोडरमा और गिरिडीह जिलों में तथ्यान्वेषी मिशन आयोजित किया, जिसमें पाया कि आठ वर्ष के बच्चे भी अभ्रक खदानों में खनन करते हैं।

एनसीपीसीआर के तथ्यान्वेषी मिशन प्रमुख प्रियंक कानूनगो ने कहा, “हमें अब तक खदान ढहने जैसी खान दुर्घटनाओं में घायल या मरने वाले बच्चों के बारे में कोई सूचना नहीं मिली है, क्योंकि यह सभी गैरकानूनी है, इसलिए कोई भी खुले तौर इनके बारे में नहीं बताते हैं, लेकिन ऐसा हो सकता है।”  

बाल श्रम कानून का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी झारखंड के श्रम विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी कहा कि अभ्रक खनन के कारण मरने वाले बच्चों के बारे में कोई सूचना नहीं है। झारखंड के श्रम विभाग में प्रधान सचिव एस के जी रहाते ने कहा, “सबसे पहले अगर लोग बिना किसी मंजूरी के खनन कर रहे हैं, तो यह भूमि कानून का उल्लंघन है और अगर वे बच्चों से काम करवा रहे हैं, तो वे दोहरा अपराध कर रहे हैं।” 

अधिकारियों को बाल श्रम की जानकारी

जिलाधिकारियों ने स्वीकार किया कि कुछ खानों में बाल श्रम की समस्या है, लेकिन यह उन दूरदराज के इलाकों तक सीमित है, जहां नए उद्योगों और स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में प्रशिक्षण की सरकारी सेवाएं और कल्याणकारी योजनाएं गरीबों तक नहीं पहुंच पाती है। गिरिडीह के जिलाधीश उमा शंकर सिंह ने कहा, “ऐसे कुछ इलाके हैं, जहां बच्चों से अभ्रक का खनन कराया जाता है। हम परिवार की आय के अन्य स्त्रोत के लिए बकरी पालन, चिनाई और अाचार बनाने का प्रशिक्षण देने की योजनाएं शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं।” 

डच अभियान समूह-सोमो का अनुमान है कि झारखंड और बिहार में 20,000 तक बच्चे अभ्रक का खनन करते हैं। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की तीन महीने से अधिक की तहकीकात में पाया गया कि झारखंड, बिहार और राजस्थान की अभ्रक खदानों में तथा उसके आसपास बच्चे काम करते हैं।

झारखंड में खुले गड्ढों में चमकदार चट्टानों के बीच पालथी मारे छह साल के बच्चे भी नंगे हाथों से शानदार, भंगुर अभ्रक के लच्छे निकालते हैं, जबकि कुछ बड़े बच्चे बेहतर सिलिकेट के लिए जर्जर सीढि़यों से खान की गहराई में उतरते हैं।  

गिरिडीह के तिस्रीक्षेत्र में बसंती लाल मिट्टी से अभ्रक के टुकड़ों छांट रही है, जबकि उसका 10 साल का बेटा संदीप कुल्हाड़ी लिए पहाड़ी की बगल में चूहे के बिल के बराबर छेद में 3 मीटर (10 फुट) नीचे चला गया है।

उसकी मां ने बताया कि चेक शॉर्ट्स और सफेद टी शर्ट पहने दुबला पतला उसका लड़का सात वर्ष की उम्र से खानों में काम कर रहा है और उसकी मजदूरी से परिवार की रोजाना 300 रुपए की अतिरिक्त कमाई होती है। अभ्रक से आधे भरे धातु के बर्तन के पास जमीन पर बैठते हुए उसने कहा, “मैं जानती हूं कि यह खतरनाक है, लेकिन यहां करने के लिए केवल यही काम है।”

“मैं जानती हूं संदीप यह काम नहीं करना चाहता है, लेकिन जैसा भी है यही काम है। अगर वह स्कूल जा सके और पढ़ लिख कर कुछ बन जाए तो यह अच्छी बात है, लेकिन पहले हमें भोजन की जरूरत है।”

                                                   

कंपनियों के प्रयास

जर्मनी की दवा कंपनी मर्क कगा को 2008 में पता चला कि उनकी आपूर्ति के लिए बच्चों से अभ्रक एकत्रित करवाया जाता है, तो उसने अपने कुछ आपूर्तिकर्ताओं से अभ्रक लेना बंद कर दिया और अब वह केवल झारखंड और ऐसी वैध खानों से अभ्रक खरीदती है, जो बच्चों से मजदूरी नहीं करवाते हैं। कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर एक बयान में कहा कि उसने अमेरिका और ब्राजील में भी अभ्रक के स्रोत स्थापित किए हैं और वह कृत्रिम अभ्रक आधारित कुछ पिगमेंट का उत्पादन कर रही है।

यह कंपनी बाल अधिकार समूह- टेरे डे होम्स के साथ मिलकर काम कर रही है और झारखंड के कोडरमा और गिरिडीह जिलों में बाल श्रम से 10,000 बच्चों को बचाने के कार्यक्रम के लिये निधि भी उपलब्ध करा रही है।

राजस्थान में खान श्रम संरक्षण अभियान के सेनगुप्ता ने कहा कि बाल श्रम को समाप्त करने की दिशा में पहला कदम यह होना चाहिए कि सभी खानों में एक संचालक हो और वह मजदूरों की सुरक्षा तथा आय एवं बच्चों से काम न करवाना सुनिश्चित करने के लिए राज्य को रिपोर्ट भेजे।

आंध्र प्रदेश में तालूपुर की श्री वेंकट कनकदुर्गा और उमा माहेश्वरी अभ्रक खदानें क्षेत्र की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी लाइसेंस धारक खानों में से हैं और खान के पर्यवेक्षक सैयद इस्माइल ने बताया कि अब इन खानों में बच्चे काम नहीं करते हैं।

पांच साल की उम्र से इन खानों के आस पास रहने और यहां काम करने वाले इस्माइल ने कहा, “इन इलाकों में हमेशा से पूरा का पूरा परिवार परंपरागत रूप से अभ्रक का काम करता है। मेरे पिता एक खदान में काम करते थे और हम वहां जाया करते थे।” 

“पिछले वर्षों में स्कूलों तक पंहुच की वजह से बच्चे अब खानों में काम नहीं करते हैं। अब यहां पर बच्चे कहते हैं एम फॉर माइका।” कार्यकर्ताओं को आशा हैं कि अभ्रक उद्योग में सुधार के नए प्रयासों से बच्चों की पीढ़ियों को मदद मिलेगी।  

साभार: थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन

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