अधुनिक तकनीक ने छीन लिये बचपन के वो खेल

अधुनिक तकनीक ने छीन लिये बचपन के वो खेलgaonconnection

लखनऊ। “बचपन की शरारतें और नादानियां, वो दोस्तों का रूठना मनाना और हमारी अठखेलियां ढेरों मनमानियां, वो हमारे तमाम खेल, सब न जाने कहां बिसर गए हैं। अब तो सिर्फ एक ही गीत याद आता है “ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी।” ये कहना है विकास नगर में रहने वाले डॉ. अमरनाथ कटियार (35) का।

आधुनिक तकनीक ने बचपन के वो सारे खेल छीन लिये, जो हम अपने गाँव में खेला करते थे। समय के साथ हमारे बचपन के मायने भी बदल गये हैं। दिन-दिन भर की धमाचौकड़ी, अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बोल, छुपन-छुपाई, कबड्डी-कबड्डी, अजीर-वज़ीर, लब्बा डंगरिया, गिल्ली-डंडा, कंचे, गुिड़या-गुड्डे का खेल, कैरम, सांप सीढ़ी, लूडो, पतंग उड़ाना जैसे तमाम खेल और छोटी-छोटी तकरारें, अब कहीं नहीं दिखाई देते बच्चों के ऐसे झुंड। मस्ती और आपसी प्यार से भरे सारे खेल खत्म हो गए, जिन्हें खेलकर हमारी तमाम पीढ़ियां बड़ी हुई हैं। 

कानपुर देहात के मैथा ब्लॉक से 10 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में नरसूजा गाँव हैं, जहां पर रहने वाले प्रेम सिंह (60) बताते हैं कि हमारे बचपन के दिनों में कुश्ती, कबड्डी, ऊंची कूंद, जैसे तमाम खेल खेलते थे, पहले हमारा संयुक्त परिवार हुआ करता था, घर में गाय-भैस होती थी, खूब दूध-दही खाकर कुश्ती लड़ा करते थे। अब न तो सयुंक्त परिवार बचे हैं और न ही हमारे शरीर में ताकत रह गयी है, हड्डियां कमजोर हो गयी हैं, अब के बच्चों को सही खान-पान नहीं मिलता इसलिए हमारे पुराने खेल अपने आप बंद हो गए।

रामजी (15) बताते हैं कि चार साल पहले वो ‘लब्बो-डंगरिया’ और ‘गिल्ली-डंडा’ खूब खेला करते थे, तब मम्मी कुछ नहीं कहती थी, पर अब मेरे घर से बाहर निकलते ही गुस्सा करने लगती हैं और कहती हैं कि पुराने-जमाने वाले खेल मत खेला करो, पेड़ से गिर सकते हो, आंख में चोट लग जाएगी। मेरे बहुत ज्यादा जिद करने पर क्रिकेट खेलने के लिए ही बाहर जाने देती हैं पर मैं अपने बचपन के खेलों को अब बहुत मिस करता हूं और खेल नहीं पाता हूं।

कीर्ति कुशवाहा (13) बताती हैं कि मैंने हमने बचपन में न जाने कितनी बार मिट्टी के खिलौने बनाते और फिर उन्हें फोड़ देते और फिर बनाते, मिट्टी का घर बनाते और उसमे गुड़िया-गुड्डे की शादी कराते, कभी बारिश में कागज़ की कश्ती बहाते तो कभी स्कूल से लौटते वक्त पानी में पैर छपछपाते लेकिन अब मम्मी मुझे बाहर नहीं निकलने देती हैं इसलिए मुझे घर के अंदर ही रहना पड़ता है और छुटि्टयों में पूरे टाइम टीवी देखकर मन ऊब जाता है, पर क्या करूं?

आज बदलते परिवेश में अब न ही गलियों में बच्चों का वो शोर सुनाई देता और न ही पार्कों में बच्चे खेलते नजर आते हैं। पुराने समय के खिलौने की जगह अब बीडियो गेम, कम्प्यूटर ने ले ली है, ये सब देखकर तो लगता कि पुराने खेल कहीं इतिहास के पन्नों में न दर्ज हो जाएं और हमारी आने वाली पीढ़ी इसे सिर्फ कागजों में खोजती रह जाए।

आधुनिकीकरण में गुम होता बचपन

समय की तेज रफ्तार ने बच्चों को एक-दूसरे से अलग-थलग कर अपने आंगन तक ही सीमित कर दिया है। इलेक्ट्राॅनिक खिलौने, वीडियाे गेम, मोबाइल, इंटरनेट, सेटेलाइट चैनलों ने बचपन की तस्वीर ही बदल दी है, अगर कुछ कसर बची है तो उसे पूरी कर दी किताबों से भरे बैग ने। बचपन से जुड़ी चंचलता, अल्हड़पन सब खो गया है। कुल मिलाकर बचपन की पूरी तस्वीर बदल गई है, अब हमारी उंगलियां और नजरे सिर्फ तकनीकी उपकरणों तक सीमित रह गई हैं। विशाल (17) कहते हैं कि आज से सात साल पहले कंचे खेलने से फुर्सत मिलती तो लट्टू नचाने लगते। पर अब तो मम्मी-पापा घर से बाहर निकलने ही नहीं देते, कहते हैं बाहर बच्चों के साथ खेलोगे तो बिगड़ जाओगे, घर में ही रहो, पढ़ाई करो समय बचे तो उनके कामों में हाथ बटाओ। आगे विशाल कहते हैं कि पूरे दिन घर के अन्दर अब बोर हो जाते हैं, पर क्या करें मोबाइल में गेम खेलने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं हमारे पास। 

रिपोर्टर - नीतू सिंह

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