अगर आप औसत हैं तभी बेहतर हैं

अगर आप औसत हैं तभी बेहतर हैंgaon connection, गाँव कनेक्शन

अखिल भारतीय कर्मचारी आयोग बनाने का ख्याल आ रहा है। अगर आप इस तरह के कर्मचारी हैं तो प्रयास कीजिए कि बाकी भी आप जैसे हो जाएं। अगर किसी दफ्तर में आप जैसे लोग न हों तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वहां काम करने का कोई फन नहीं होता होगा, वहां की पॉलिटिक्स बेकार होगी। आप ख़ुद को देखिए कि किस सूची में हैं। आप लोग जो दिनभर अपने अपने दफ्तर के क़िस्सों से मुझे पकाते रहते हैं तो मैंने सोचा कि मैं भी बदला लूं। आप सब के विवरण से जो श्रेणियां तैयार की हैं अगर आप भी उनमें से किसी एक में आते हैं तो मुझे माफ कर दीजिएगा।

औसत ही प्रतिभाशाली होता है। औसत बने रहना एक कला है। जो एमएफ  हुसैन बनेगा उसे बाहर जाना होगा। औसत को

कोई संकट नहीं होता। प्रतिभाशाली होना अपने आप में नैतिक संकट है। औसत वाकई में हल्का होता है। व्यावहारिक होता है। वो भले बोझ समझा जाता हो लेकिन बोझ तो वो हैं जो औसत को औसत समझते हैं। औसत की प्रतिभा का सम्मान किया जाना चाहिए। यही कि कैसे औसत आदमी बचा रह जाता है। काम न करने के बाद भी उसी का काम सबको दिखता है। 

बहुत काम करने वाले, सबसे ज़्यादा काम बहुत काम करते हुए दिखने में करते हैं। वे ईमेल लिखने में बिजी रहते हैं। बॉस को बताने के लिए सारा प्लान तैयार रहता है कि क्या-क्या किया जा सकता है। क्या-क्या नहीं हो रहा है। समस्या का कारण तो ख़ुद होते हैं लेकिन समस्या का विश्लेषण सबसे अच्छा करते हैं। बहुत काम करने वालों की एक और खूबी होती है, वो अपनी क्षमता का प्रदर्शन इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि जहां काम करते हैं उस जगह पर उनके काम की अहमियत नहीं समझी जाती। काम करते हुए दिखते रहना भी बहुत काम करना है। तूफ़ान चाहे कैसा भी हो। हमेशा कुछ को बचने का फन हासिल होता है। कभी वे डेस्क टॉप के पीछे छिप जाते हैं, कभी बॉस के पीछे। तूफ़ान आता है, चला जाता है। 

कुछ काम करने वाले काम करते हुए इस बात का ख्याल रखते हैं कि दूसरी जगह के बॉस भी उनके काम को देखें। नियमित तरीके से मैसेज करते हैं। प्लीज देखिएगा। आपका आशीर्वाद देवतुल्य है। दूसरी जगह का बॉस जिसे उसकी जगह के लोग कुछ नहीं समझते, खुश हो जाते हैं। वो भी फेसबुक पर स्टेटस लिख देता है। ट्वीट कर देता है। महफिल में उसे पहचान लेता है। इससे काम करने वाला उस बॉस को दिखा देता है जिसके साथ वो काम करता है। 

कुछ लोग हर काल और दफ्तर में चुप रहते हैं। वो बोलते नहीं है। न व्यवस्था के ख़िलाफ़ न व्यवस्था के प्रति। इन्हें सुनने की गज़ब की क्षमता होती है। ये फेसबुक पर सिर्फ दो प्याली चाय और उगते सूरज की तस्वीर पोस्ट करते हैं जिस पर गुड मार्निंग लिखा होता है। इनका मकसद दुनिया को बदलना नहीं होता है। ये जैसा चल रहा है वैसा चलने दो के घोर समर्थक होते हैं। बल्कि वैसा नहीं चला तो ये अलग चलने वाले को वैसा बना देते हैं। इन्हें सब मालूम होता है लेकिन पूछने पर मुस्कुराते हैं। इनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाता क्योंकि इनका किसी से बिगाड़ नहीं होता। कुछ लोग अलग होते हैं। वे दूसरे को बताने में लगे रहते हैं कि कैसे प्रतिभाशाली बनें। नए लोगों को भी समझ आ जाता है कि प्रतिभा विकसित करने का फन किसे हासिल है। इसी के साथ साथ वो बताने लगता है कि कैसे उसकी प्रतिभा को मौका नहीं मिला फिर भी वो दूसरे की प्रतिभा के विकास में लगा है। दफ्तरों में दबे शोषण दमन के क़िस्सों से सचेत करते करते ये नए को पुराना कर देते हैं। 

कुछ लोग झोला ढोने के फन में माहिर होते हैं। वो हमेशा किसी शक्तिशाली के साथ नज़र आते हैं। शक्तिशाली लोग ऐसे लोगों की पहचान में सारा जीवन बिता देते हैं। वे खोज खोज कर इन्हें तैनात करवाते हैं। हर विभाग में ऐसे लोगों के भरोसे हमारा देश चलता है। ये लोग अपने बॉस के लिए कहीं भी चले जाते हैं। पुरस्कार समारोह या उनकी भांजी की सालगिरह। ये हमेशा शक्तिशाली के आगे दयनीय लगने के फन में माहिर होते हैं। 

कुछ लोग जड़ता के सिद्धांत के विरोधी होते हैं। ये सडऩा नहीं चाहते हैं। कुछ नया करना चाहते हैं। पहले कभी नया कर नहीं पाते लेकिन नया करने की चाहत छोड़ भी नहीं पाते। ये ताक में रहते हैं छुट्टी के दिन आ जाएं और आ जाएं तो जाए ही न। इस भारी त्याग के दम पर वे तमाम वरदान हासिल कर लेते हैं।

लोगों का यह प्रकार सबसे अनोखा होता है। ये किसी भी विभाग में काम करते हों लेकिन ध्यान अकाउंट में रहता है। कौन सी स्कीम आई तो उनके लिए नहीं आई। तनख्वाह बढ़ोत्तरी की पल पल की खबर रखने में माहिर होते हैं। 

कई लोग ऐसे होते हैं जो पद के प्रति काफ़ी संवेदनशील होते हैं। उनका पदनाम क्या है और अगला क्या है इसकी विवेचना में सारा जीवन निकाल देते हैं। आप इनसे बात कर आहत हो जाएंगे कि कैसे इनके जैसे सीनियर को बाइपास कर कल के आए जूनियर को काम दे दिया गया है। इनकी बातचीत का संसार सीनियर जूनियर में ही बंटा होता है। बॉस का राशिफल देखकर आते हैं और अपनी तरक्की के लिए वैष्णों देवी या दरगाह शरीफ जाते हैं। जब तक सचिव न लग जाए, निर्देशक न लग जाए इन्हें नौकरी योग का मोक्ष नहीं मिलता। ये लोग प्रमोशन की पार्टी या मिठाई ज़रूर खिलाते हैं। ससुराल में सबसे पहले फोन करते हैं। कुछ लोग होते हैं जो सबको देख मुस्कुराते हैं। कुछ किसी को देख नहीं मुस्कुराते हैं। उनकी मुद्रा से टपकता रहता है कि काम करने की प्रेरणा अगर कोई है तो यहीं हैं यही हैं। एक टाइप और है। यह चाय सिगरेट का ब्रेक लेता रहता है। ये न हों तो दफ्तर के बाहर चाय की दुकान का रौनक़ ख़राब हो जाता है। ऐसे लोगों से मित्रता रखिए। आफिस पॉलिटिक्स के सबसे अच्छे साथी होते हैं। रही बात काम की बात तो याद कीजिए कि आपने कितनी बार कहा होगा। यही कि काम भी करके देख लिया, यहां काम करने से कुछ नहीं होता।

(लेखक एनडीटीवी में सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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