हिमाचल प्रदेश के सेब बागवानों पर मौसम और सरकारी उदासीनता की मार

सालाना करीब 5 हजार करोड़ के कारोबार वाली हिमाचल प्रदेश की सेब इंडस्ट्री पर मौसम की मार पड़ी है। पहले सूखे और बाद में कम सर्दी के चलते सेब के उत्पादन में काफी गिरावट देखी जा रही है।

Arvind shukklaArvind shukkla   22 Aug 2018 5:50 AM GMT

हिमाचल प्रदेश के सेब बागवानों पर मौसम और सरकारी उदासीनता की मार

शिमला (हिमाचल प्रदेश)। मौसम के उलटफेर (क्लाइमेट चेंज) और सरकार की उदासीनता ने हिमाचल प्रदेश के सेब किसानों की हालत खराब कर दी है। हिमाचल प्रदेश में पिछले 20 सालों में सबसे कम उत्पादन होने की उम्मीद है तो रेट भी पिछले साल के मुकाबले कम मिल रहे हैं।

सालाना करीब 5 हजार करोड़ के कारोबार वाली हिमाचल प्रदेश की सेब इंडस्ट्री पर मौसम की मार पड़ी है। पहले सूखे और बाद में कम सर्दी के चलते सेब के उत्पादन में काफी गिरावट देखी जा रही है।

"प्रदेश में सेब की पैदावार गिरी है। इस साल अगस्त महीने में अब तक करीब 36 लाख पेटियां बाहर भेजी जा चुकी थीं, जबकि पिछले समान अवधि में ये आंकड़ा 47 लाख पेटियों का था। हालांकि नवंबर सेब का सीजन चलता है लेकिन मौजूदा आंकड़ों को देखें तो 10-11 लाख पेटी कम उत्पादन हुआ है।" उपनिदेशक (सूचना एवं प्रचार) उद्यान निदेशालय, हिमाचल प्रदेश के एक अधिकारी ने फोन पर बताया।

सेब उत्पादन में जम्मू-कश्मीर के बाद हिमाचल प्रदेश का नंबर आता है। इस पहाड़ी प्रदेश के 12 में से 7 जिलों में सेब होता है। करीब 100 साल पुरानी एप्पल इंडस्ट्री से एक लाख से ज्यादा बागवान जुड़े हैं। किसानों का आरोप है मौसम और सरकारी उदासीनता के चलते लाखों किसान बर्बादी के कगार पहुंच गए हैं।

"हिमाचल में वैसे तो सालाना करीब 4 करोड़ पेटी सेब का उत्पादन होता है, लेकिन ये इस बार 2 करोड़ यानी आधा हो सकता है। बाजवूद इसके सेब के रेट कम मिल रहे हैं। बिचौलिए किसानों का हक मार रहे हैं क्योंकि प्रदेश में स्टैंडर्ड पैकिंग और ग्रेडिंग व्यवस्था लागू नहीं है।" प्रशांत प्रताप सेहटा, महासचिव, युगा


"हिमाचल में वैसे तो सालाना करीब 4 करोड़ पेटी सेब का उत्पादन होता है, लेकिन ये इस बार 2 करोड़ यानी आधा हो सकता है। बाजवूद इसके सेब के रेट कम मिल रहे हैं। बिचौलिए किसानों का हक मार रहे हैं क्योंकि प्रदेश में स्टैंडर्ड पैकिंग और ग्रेडिंग व्यवस्था लागू नहीं है। कारोबारी हर पेटी में किसान का 2 से पांच किलो सेब मार रहे हैं।" प्रशांत प्रताप सेहटा, महासचिव यंग एंड यूनाइटेड ग्रोवर एसोसिएशन (युगा) बताते हैं।

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हिमाचल प्रदेश में सेब पेटी के भाव बिकता है। एक पेटी में 25 से 28 किलो सेब औसतन होते हैं, लेकिन छोटे होने पर इनकी संख्या और वजन दोनों 30-35 किलो तक पहुंच जाते हैं। जबकि हिमाचल से आने वाले सेब की पेटी का वजन करीब 15 किलो और विदेशों से आने वाली पेटी में 10 किलो ही सेब होते हैं।

"पैकिंग कोई नियम कानून न होने से कारोबारी और आढ़ती इसका फायदा उठाते हैं। जो सेब थोड़ा छोटे होते हैं वो पेटी में ज्यादा आते हैं, कारोबारी भुगतान पूरी पेटी का करते हैं और किसान से खूब वजन भरवाते हैं, लेकिन बाद में वो अलग से पैकिंग करते हैं, जिससे हर पेटी पर 2 से 5 किलो सेब ज्यादा होते हैं। सरकार को तुरंत इसे बंद कराना चाहिए।" प्रशांत आगे जोड़ते हैं।

सेब बागवानों की मांग पर 2014 में प्रदेश सरकार ने वजन और पैकेजिंग को लेकर अध्यादेश जारी किया था, लेकिन आढ़तियों और कारोबारियों के भारी विरोध के चलते सरकार को इसे वापस लेना पड़ा था, नियमों के मुताबिक उस वक्त एक पेटी में सिर्फ 22 किलो सेब रखे जाने थे, ज्यादा रखने पर कारोबारी और ढुलाई करने वाले वाहन पर केस का प्रावधान था।


सेब के गढ़ शिमला जिले के उपनिदेशक बागवानी सुभाष चंद्र सेब उत्पादन में आई गिरावट के लिए सूखे और चिलिंग ऑवर कम होने को दोषी बताते हैं। "पिछले साल शिमला जिले में करीब ढाई करोड़ पेटी सेब हुआ था, इस बार का अनुमान एक करोड़ 92 लाख पेटी का है। ये पंचायत स्तर पर सर्वे के बाद तैयार किया गया है। इस सीजन में पहले सूखा पड़ा फिर सर्दी कम हुआ, पहाड़ों पर उपर तो मौसम ठीक रहा लेकिन निचले इलाकों में चिंलिंग ऑवर (ठंडे दिन और तापमान) कम रहे, जिसका असर पड़ा है।"

प्रदेश में इस वक्त औसतन पेटी का रेट 1500 से 2000 रुपए है लेकिन सीजन शुरु होने पर ये 3000 रुपए तक था। पहले उत्पादन कम और अब रेट में गिरावट के किसान परेशान हैं। इसकी एक वजह विदेशी सेबों की आवक भी है। वर्ष 2017 में छपी हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक भारत हर साल करीब एक करोड़ पेटी सेब आयात करता है। इसी आयात पर नकेल रखने की मांग हो रही है।

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प्रशांत सेहटा के मुताबिक 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की बात की थी लेकिन उसे कई वर्षों तक लागू नहीं किया गया। "सरकार ने जून में घोषणा की इंपोर्ट ड्यूटी 50 से बढ़ाकर 75 फीसदी की जाएगी लेकिन उसे लागू किया 4 अगस्त थे, इतने दिनों में कारोबारियों ने भारी मात्रा में विदेश से सेब मंगा लिया, जिसका खामियाजा अब सेब के आम किसानों को भुगतना पड़ रहा है।"

सेब बागवानों और कारोबारियों का कहना है कि 1971 में प्रदेश के पूर्ण राज्य के तौर पर अस्तित्व में आने के बाद से ही कांग्रेस, जनतादल और भाजपा की सरकारों ने सेब बागवानी के उत्थान को महज़ चुनावी मुद्दा ही माना। जिसके परिणामस्वरूप आज सेब बाहुल इलाकों का युवा इसे ठुकराकर नौकरी की तलाश में बाहरी राज्यों की तरफ पलायन कर रहा है।


प्रशात बताते हैं, "इन दिनों राज्य मे सेब सीजन चरम पर है। साथ ही बागवान उतनी ही परेशानियों के दौर से गुजर रहे हैं। वजह है खस्ताहाल सड़कें और मंडियों में फसल का उचित दाम न मिलना।' बरसात के मौसम में कच्ची पहाडी सड़कें दलदल व तालाबों में तब्दील हो गई हैं, जो कि आए-दिन सडक दुर्घटनाओं को न्यौता दे रही हैं। इसके बावजूद जैसे तैसे बागवान अपनी फसलों को दूर मंडियों तक पहुचा रहा है, लेकिन वहा आढ़तियों और खरीददारों की मिली भगत का शिकार हो रहा है।

हिमाचल के बागवानों की यंग एंड युनाईटेड ग्रोवर्स एसो. के अध्यक्ष ठाकुर सुरेंद्र सिंह का कहना है, "सेब उत्पादक राज्य होने के बावजूद प्रदेश सरकार सेब बागवानी को एक इंडस्ट्री के तौर पर स्थापित करने में विफल रही है। इस तरफ सरकार के उदासीन रवैये के कारण हर साल बागवानों को करोडों रूपयों का नुकसान हो रहा है।"

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वो आगे बताते हैं, "फल मंडियों में चल रही लूट-खसोट को रोकने के लिए सरकार को एप्पल पैकिंग के लिए यूनिवर्सल कार्टन तैयार कर उसे सख्ती से लागू करना चाहिए और ग्रेड और क्वालिटी के आधार पर प्रति किलो की दर से रेट फिक्स करने चाहिए। फ्रूट प्रोसेसिंग प्लांट्स स्थापित करने पर बल दिया जाना चाहिए।"

सेब सीजन की शुरूआत में बागवानों को कुछ दिन अच्छे दाम मिलते हैं लेकिन इसके बाद कहानी बदल जाती है। कभी आढ़ती व खरीददार हाई ग्रेडिग की मांग करते हैं कभी ज्यादा वजन वाली पेटियों की। ऐसे में प्रति पेटी रेट में पचास या सौ रूपए ज्यादा रेट दे कर बागवानों को ठग दिया जाता है। बागवानों के पास अपनी फसल बेचने के लिए कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है। बागवान पिछले कई वर्षों से केंद्र सरकार से सेब को विशेष श्रेणी उत्पाद घोषित करने की मांग उठा रहे हैं लेकिन केंद्र सरकार इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रही है।

चंडीगढ़ में सेब आढ़ती बृजमोहन बताते हैं, "पहले के मुकाबले अब काफी समस्याएं सुलझ गई हैं, किसानों के सामने खराब सड़क की दिक्कत बरसात के चलते हैं। ये सही है कि कश्मीर का सेब 15 किलो के आसपास पैकिंग में आता है जबकि हिमाचल में 27-28 किलो की पैकिंग होती है लेकिन इससे किसी दिकक्त के बारे में मुझे जानकारी नहीं।'

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