एमएसपी का मकड़जाल: किसानों को एक दिन में 2 करोड़ रुपए का नुकसान

गांव कनेक्शन की पड़ताल में आश्चर्यजनक खुलासा, सरकार की तय की गयी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं हो रही फसलों की खरीदी

एमएसपी का मकड़जाल: किसानों को एक दिन में 2 करोड़ रुपए का नुकसान

लखनऊ। रबी की फसलों के लिए गेहूं समेत 21 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाते हुए सरकार ने कहा था कि किसानों की आमदनी दोगुनी करने की दिशा में ये ऐतिहासिक कदम है। इससे पहले जुलाई में खरीफ फसलों का भी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया गया था। लेकिन अगर आंकड़ों की मानें तो किसानों को प्रतिदिन करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा है।

देशभर की मंडियों का भाव बताने वाली सरकार की वेबसाइट एगमार्कनेट डॉट जीओवी डॉट इन के अनुसार मौजूदा समय की एक दो जिंसों को छोड़ दिया जाए तो मंडी में किसी भी फसल की एसएसपी पर खरीदी नहीं हो रही। गांव कनेक्शन ने जब इस वेबसाइट को खंगाला तो आश्चर्यजनक आंकड़े सामने आए।

मध्य प्रदेश, छिंदवाड़ा के मक्का किसान सुशील बोवचे 10 अक्टूबर को लगभग दो कुंतल उपज लेकर गल्ला मंडी पहुंचे तो उन्हें एक कुंतल के एवज में 1400 रुपए ही मिला, जबकि सरकारी कीमत 1700 रुपए है। सुशील कहते हैं "मुझे तो पता चला था कि मक्का का दाम 1700 रुपए कुंतल है, लेकिन यहां तो इतना पैसा मिला ही नहीं। दो कुंतल के पीछे 600 रुपए का नुकसान हो गया, अभी तो भावांतर का भी कुछ अता-पता नहीं है। फायदे की तो बात ही मत करिए।"

गांव कनेक्शन ने वेबसाइट एगमार्कनेट डॉट जीओवी डॉट इन पर 10 अक्टूबर का भाव देखा तो पता चला कि एमएसपी और वास्तविक भाव में भारी अंतर है। सिर्फ 10 अक्टूबर को ही किसानों को अपनी फसल के एवज में 20253513 (दो करोड़, दो लाख, तिरपन हजार, पांच साै तेरह रुपए ) का नुकसान उठाना पड़ा।

शुरुआत धान से करते हैं। धान की आवक मंडियों में शुरू हो चुकी है। सरकार ने धान की एमएसपी में 200 रुपए का बढ़ोतरी की थी। मौजूदा कीमत 1750 रुपए प्रति कुंतल है। 10 अक्टूबर को देशभर की मंडियों में धान की कुल खरीदी 111922 कुंतल हुई। अलग-अलग मंडियों के मॉडल प्राइज के औसत के अनुसार किसानों को एक कुंतल के बदले 1737 रुपए दिया गया। मतलब किसानों को प्रति कुंतल 13 रुपए का नुकसान हुआ। अब अगर 13 रुपए को 111922 कुंतल के साथ गुणा करेंगे कुल नुकसान होगा 1454986 रुपए (साढ़े चौदह लाख रुपए से ज्यादा)। ध्यान रहे ये नुकसान महज एक दिन और एक फसल का है, यहां महीने और साल की कोई बात ही नहीं हो रही। दूसरी तरफ कई स्थानीय मंडियों में आढ़ती धान को १४०० -1500 रुपए में खरीद रहे। यहां नुकसान का आंकड़ा काफी बढ़ जाएगा।

किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था लागू की गयी है। अगर फसलों की कीमत गिर जाती है, तब भी सरकार तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है, इसीलिए ये व्यवस्था लागू की गयी है। इसके जरिये सरकार उनका नुकसान कम करने की कोशिश करती है।

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मंडियों में मक्के की आवक इस समय जोरों पर है। देश की मंडियों में 10 अक्टूबर को 1371 रुपए प्रति कुंतल के औसत से मक्के की खरीदी गयी। मक्का किसानों को भी एक कुंतल के पीछे 329 रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। यानी कि इस तारीख को देशभर के मक्का किसानों को 2873486 रुपए का घाटा सहना पड़ा। भावांतर योजना काफी दिनों से बंद है। आगामी सीजन में वो फिर शुरु होगी।

मध्य प्रदेश किसान खेत मजदूर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष (कार्यवाहक) केदार शंकर सिरोही कहते हैं " सरकार अपनी नीतियों को सही से लागू नहीं कर पा रही है। एमएसपी बढ़ा देने मात्र से किसानों का लाभ नहीं होने वाले। मंडियों में बिचौलिए सक्रिय हैं, उन्हें रोकने के लिए सरकार के पास पर्याप्त लोग ही नहीं है। भाव कम करके व्यापारी अनाज खरीद लेते हैं। बड़ी-बड़ी कपंनियां ट्रेडिंग कर ही क्यों रहीं हैं, जाहिर सी बात है कि उन्हें मोटा फायदा दिख रहा है।"

10 अक्टूबर को मंडियों में बाजरा की खरीदी 1402 रुपए प्रति कुंतल की दर पर हुई। वेबसाइट के अनुसार इस दिन 1402 रुपए प्रति कुंतल की दर से 1049 कुंतल बाजरा की खरीदी हुई जबकि सरकार ने बाजरा का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1950 रुपए तय कर रखा है। इस हिसाब से किसानों को 574853 रुपए का नुकसान उठाना पड़ा।


छिंदवाड़ा के मंडी अध्यक्ष शेषराव यादव कहते हैं " सरकार की तय की हुई दरों पर व्यापारी उपज खरीदते ही नहीं। किसानों को उनकी नुकसान का भरपाई भावांतर और बोनस के माध्यम से कर दिया जाता है। व्यापारी दाम बढ़ने ही नहीं देते। अब उड़द की कीमत 5600 रुपए है लेकिन मेरे यहां 4000 रुपए से ज्यादा भाव बढ़ता ही ही। मंडी व्यापारियों के हिसाब से चलती है।"

इसी तरह 1979 की दर से 743 कुंतल ज्वार की खरीदी मंडी में होती है कि जबकि इसका एमएसपपी 2430 रुपए है, इस हिसाब से देशभर के किसानों को 335093 रुपए का नुकसान हुआ। रागी का हाल भी कुछ ऐसा ही है। सरकार भले ही मोटे अनाज का उत्पादन बढ़ाने की बात कर रही हो लेकिन अगर किसानों को ऐसे नुकसान होता रहा तो मुश्किल है कि मोटे अनाज का उत्पादन बढ़े। दस अक्टूबर को देश की मंडियों में 2151 की औसत से 383 कुंतल रागी की खरीदी हुई जबकि इसका एमएसपी 2897 रुपए प्रति कुंतल है, किसानों को 746 रुपए की दर से 285418 रुपए का नुकसान हुआ।

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देशभर में एमएसपी सत्याग्रह चलाने वाले किसानों के संगठन स्वराज अभियान के नेता योगेंद्र यादव कहते हैं "एमएसपी मजाक है। देश में ऐसी कोई मंडी ही नहीं है जिस पर किसान सरकार की तय हुई एमएसपी पर अपनी पूरी फसल बेच सके। एमएसपी बढ़ाने को लेकर बहस हो सकती है पर मौजूदा हालात में कॉटन को छोड़कर किसानों को हर फसल के दाम एमएसपी से बहुत कम मिल रहे हैं। मौजूदा समय में एमएसपी के दाम मिल जाएं यही बहुत है।"

दलहन में अरहर (तुअर) और उड़द की बिक्री सरकार की तय एमएसपी से ज्यादा कीमत पर हो रही है। 5675 एमएसपी वाले तुअर की बिक्री 5995 जबकि उड़द की बिक्री 5775 रुपए प्रति कुंतल पर हुई जबकि इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य 5600 रुपए है।

फिलहाल सरकार ने कुल 25 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है। लेकिन अपनी फसल इन दरों से कम में बेचने को मजबूर हैं। सरकार ने मूंग की एमएसपी 6975 रुपए तय की है जबकि देश की मंडियों में 10 अक्टूबर को 5997 रुपए प्रति कुंतल के हिसाब 137 कुंतल खरीदी हुई। एक कुंतल के पीछे 978 रुपए के हिसाब से 133986 रुपए का नुकसान किसानों को हुआ।

ऑल इंडिया दाल मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश अग्रवाल ने बताया कि देश में दाल का उत्पादन खपत से ज्यादा है, इसलिए बाजार में दाल की कीमतें कम हैं। अग्रवाल ने कहा कि जब तक दाल निर्यात के उपाय नहीं किए जाएंगे तब तक कीमतों में सुधार नहीं होगा।

इंदौर के दलहन व्यवसायी वीएस भाटिया कहते हैं "किसान अपनी जरूरतों के अनुसार फसल बेचते हैं, इसलिए वे सरकारी खरीद का इंतजार नहीं करते हैं।" उन्होंने कहा कि दलहन बाजार ठंडा पड़ा हुआ है। लिहाजा किसानों को मजबूरन कम भाव पर अपनी फसल बेचनी पड़ रही है।"

मूंगफली का भाव बाजार। 10 अक्टूबर का।

सरकार तिलहनी फसलों की पैदावार में देश को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में कृषि आयुक्त एसके मल्होत्रा ने राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन में तिलहनी फसलों का उत्पादन पिछले साल की तुलना में 60 लाख टन बढ़ाने की बात कही थी। देश में बड़े पैमाने पर खाद्य तेल की कमी है, जिसके कारण बड़े पैमाने पर इसका आयात किया जाता है। यह सिलसिला लंबे समय से जारी है। सरकार ने भले ही लक्ष्य बढ़ा दिया हो लेकिन उसके किसानों की हालत ठीक नहीं है।

मध्य प्रदेश, देवास के रहने वाले किसान अरुण बताते हैं "इस महीने हमारे यहां मंडियों में सोयाबीन की कीमत 2,450 से 3,016 रुपए से बढ़ ही नहीं रही। बारिश के बाद वैसे ही फसल का नुकसान हुआ है, ऐसे में मंडी से भी घाटा ही हो रहा है।"

सरकार ने सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3399 रुपए तय किया है। लेकिन 10 अक्टूबर को मंडियों में इसकी खरीदी 2924 रुपए की दर से हुई। कुल आवक 21133 कुंतल रही इस हिसाब एमएसपी और खरीदी का औसत देखेंगे तो किसानों को 10038175 रुपए का नुकसान हुआ। मूंगफली और सूरजमुखी का हाल भी कुछ ऐसा ही रहा। 4890 रुपए एमएसपी वाली मूंग की खरीदी 4155 रुपए प्रति कुंतल के हिसाब से हुई। 5360 कुंतल के आवक में किसानों को 3939600 रुपए का घाटा हुआ जबकि सूरजमुखी का एमएसपी 5389 रुपए है बावजूद इसके 357 कुंतल उपज की 3659 रुपए प्रति कुंतल के हिसाब से हुई, मतलब यहां भी किसानों को 617616 रुपए का नुकसान हुआ।

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देश के जाने माने खाद्य एवं निर्यात नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा गांव कनेक्शन के लिए लिखे अपने एक लेख में कहते हैं " किसान को सबसे ज्यादा सदमा तो तब लगता है जब अनुकूल मौसम और भरपूर फसल होने के बाद भी बाजार में उसकी उपज को वाजिब दाम नहीं मिलते। यह ज्यादा बड़ी त्रासदी है। खेती की सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि हर बार जब भी किसान फसल की बुआई करता है, उसे इस बात का अहसास तक नहीं होता कि दरअसल वह घाटे की फसल बो रहा है।"

तुअर और उड़द के अलावा कॉटन इस सीजन की एक और ऐसी फसल जिसकी खरीदी एमएसपी दर से ज्यादा हुई। सरकार ने कॉटन के लिए 5150 रुपए एमएसपी तय किया है जबकि मंडियों में ये 5254 रुपए प्रति कुंतल बिकी।

सूरजमुखी का भाव। 10 अक्टूबर के हिसाब से

नागपुर कपास कारोबारी राजेश मोकदम ने बताया कि हमारे यहां कपास का भाव समर्थन मूल्य से ज्यादा है। मंडी में नरमा कपास का भाव 5,200 रुपए प्रति क्विंटल रहा। केंद्र सरकार ने मीडियम स्टैपल कपास का एमएसपी 5,150 रुपए प्रति क्विंटल तय किया हुआ है।

ऊपर दिए गए आंकड़े सरकार की अधिकारिक वेबसाइट से प्राप्त आंकड़ों के हैं। जबकि सरकार की इसी वेबसाइट पर धान का रेट 1737 रुपए दिखा रहा था, मंडी आने वाले किसानों को पूरा भाव भी मिल रहा था, लेकिन इसी दिन उत्तर प्रदेश में लखनऊ जिले के जमखोनवा गांव के किसान ओम प्रकाश मिस्त्र ने अपना मोटा धान 1200 रुपए क्विंटल बेचा था। ऐसे में आढ़तियों को बेची जाने वाली फसलों के आधार पर आंकड़ों का अनुमान लगाया जाए तो ये रोजाना के कई करोड़ का होगा। कई रिपोर्ट में माना जा चुका है कि एमएसपी का फायदा मात्र कुछ फीसदी किसानों को ही मिलता है।

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