अखंड भारत का नारा लगाना बन्द कर दिया

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कुछ दिन पहले टीवी पर मुस्लिम नेताओं के बयान सुने, उनमें से एक था ‘‘हम कहां जाएंगे‘‘। आप कहीं नहीं जाएंगे लेकिन प्रजातंत्र में समय के साथ चलने में आसानी रहेगी। मुगल काल में इस्लाम का भारत में जो दर्ज़ा था वह अंग्रेजों की हुकूमत में नहीं रहा और बटवारे के पहले जो ताकत थी वह विभाजित भारत में नहीं रही। 

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने मुहम्मद अली जिन्ना को यह बात समझाने की कोशिश की थी कि बटवारे के बाद भारत में मुस्लिम आबादी और भी कम हो जाएगी लेकिन जिन्ना की समझ में नहीं आया। जिन्हें विश्वास नहीं वे मौलाना आजाद की किताब ‘‘इंडिया विन्स फ्रीडम‘‘ जरूर पढ़ें। जनसंघ और आरएसएस के लोग अखंड भारत का नारा बुलन्द करते रहे परन्तु यह नारा तो मुसलमानों को लगाना चाहिए था। सोचकर देखिए यदि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की पूरी आबादी अखंड भारत के रूप में होती तो मज़हबी आबादी का सन्तुलन क्या होता। अब जो भारत बचा है उसे हिन्दू और मुसलमान मिलकर अखंड रहने दें उसी में कल्याण है।

कुछ हिन्दुओं को हिन्दू राष्ट्र बनाने की जल्दी है। उन्होंने आगरा में धर्म परिवर्तन का आयोजन किया, पिछले साल इसे घर वापसी कहा गया था और बहुत पहले कुछ लोगों ने इसे शुद्धिकरण कहा था। इसकी आवश्यकता नहीं है और न इससे अखंड भारत का सपना पूरा होगा। महात्मा गांधी के न चाहते हुए भी नेहरू बाजी हार गए, विभाजन हो गया। बाद में पाकिस्तान का भी विभाजन हुआ। अब बचे हुए भारत को खंडित होने से बचाने की आवश्यकता है।

अभी तक हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रास्ता अखंड भारत की ओर चल रहा है। उन्होंने दादरी की घटना को दर्दनाक और पाकिस्तानी गायक का विरोध और कुलकर्णी का अपमान गलत बताया। माना कि प्रधानमंत्री ने भत्र्सना करने में देर लगाई, साक्षी महराज जैसे लोगों तक अपनी नाराजगी पहुंचाने में देर की। फिर भी महत्वपूर्ण यह है कि सामाजिक दरारों को चौड़ा होने से रोकने के लिए सरकार ने क्या किया? दरारें हमेशा रही हैं लेकिन उन्हें इतना चौड़ा न होने दिया जाए कि समाज के खंड हो जाएं।

उग्र हिन्दूवादियों को समझ लेना चाहिए कि मुसलमानों और ईसाइयों के माथे पर हिन्दू टीका लगा देने भर से न तो हिन्दू धर्म की ताकत बढ़ेगी और ना ही हमारा देश अखंड भारत बनेगा। यदि सनातन मूल्यों से प्रभावित होकर कोई मुसलमान उन मूल्यों को स्वीकार करे तो सूफी सोच विकसित होगी। यदि सनातन धर्म के श्रेष्ठ मूल्यों को व्यवहार में लाकर, तर्क द्वारा पूरे देश के मुस्लिम समाज को सन्तुष्ट किया जा सके तो रहीम और रसखान पैदा होंगे। कम लोग जानते होंगे कि रहीम और तुलसीदास में प्रगाढ़ मित्रता थी इसलिए सोचना यह है कि आप को अखंड भारत चाहिए अथवा धर्मान्तरण का ढकोसला। कहीं आप जिन्ना का अधूरा काम तो पूरा नहीं कर देंगें।

जिन्ना ने भारत की धरती बांटने के पहले भारतवासियों के दिल बांट दिए थे। अतिउत्साही हिन्दूवादी लोगों को भ्रम होगा कि नरेन्द्र मोदी की ताकत इनके कारण बढ़ रही है। जिस दिन मोदी, धर्म के आधार पर जनता को गोलबन्द करने की कोशिश करेंगे या फिर जातियों के बीच लकीरें खीचेंगे अथवा भाषाई वर्चस्व के विषय में सोचेंगे उसी दिन उनकी स्वीकार्यता घटने लगेगी। मोदी को यह बात हम सबसे बेहतर मालूम है। जब मोदी भारतीय संविधान की बात करते हैं जिसे बनाने में मौलाना आज़ाद जैसे विद्वानों का बड़ा सहयोग था तो इसमें खामी नहीं हो सकती। उच्चतम न्यायालय भी इसके पालन पर जोर देता है। समान नागरिक संहिता इस संविधान का अंग है।

समान नागरिक संहिता का यह मतलब कतई नहीं कि देश पर हिन्दू तौर तरीकों और मान्यताओं को थोप दिया जाएगा। जहां हिन्दू धर्म में तमाम कमियां आ गई हैं वहीं इस्लाम में तमाम ऐसी बातें हैं जिन्हें हिन्दू समाज स्वीकार करेगा। उदाहरण के लिए पिता की सम्पत्ति में लड़कियों का हिस्सा अब जाकर संविधान में स्वीकार किया गया है जब कि इस्लाम में यह कब से शामिल है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘हे प्रभु! मुझे इस्लाम का शरीर, ईसाई का दिल और हिन्दू का दिमाग दो। दिल, दिमाग और शरीर को अलग-अलग दिशाओं में काम न करने दिया जाए, उन्हें तारतम्य से चलना होगा।

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