अलसी अच्छे मुनाफे की तिलहनी फसल

अलसी अच्छे मुनाफे की तिलहनी फसल

लखनऊ। अलसी की खेती में अच्छा मुनाफा है यह 4000 से 5000 रुपए प्रति कुंतल तक बिकती है। अलसी में ओमेगा-3 पाया जाता है जिसका उपयोग दवाई, तैलीय उत्पाद आदि बनाने में होता है। इसकी खेती में नमी का बहुत महत्व है।

अलसी की खेती पर शोध कर चुके चंद्र शेखर आज़ाद कृषि विश्वविद्यालय के डॉ आरएल श्रीवास्तव बताते हैं, "अलसी की बुआर्ई के लिए उपयुक्त समय अक्टूबर नवम्बर है लेकिन अभी भी इसकी बुवाई कर सकते हैं। ये फसल ऐसी जगहों के लिए ज्यादा उपयोगी है जहां पानी की कमी है। इसे बोने के लिए ज्यादा नमी की आवश्यकता होती है।" अलसी उत्तर प्रदेश में ज्यादातर बुंदेलखंड क्षेत्र में बोई जाती है क्योंकि वहां पानी की कमी है। 

श्रीवास्तव आगे बताते हैं, "इसकी बुवाई में गहराई रखनी चाहिए, बुवाई के लिए दोपहर के बाद का समय उपयुक्त होता है। एक हेक्टेयर में 30 किलो तक बीज लगता है अगर कतारों के बीच की दूरी 30 सेमी तथा पौधों के बीच दूरी चार से पांच सेमी रखी जाए तो पैदावार अच्छी होती है।"

अलसी का महत्व ओमेगा-3 की वजह से बढ़ रहा है, ये अलसी से मिलता है जो कि मस्तिष्क के विकास के लिए बहुत उपयोगी है। इसके अलावा ओमेगा-3 बॉडी टॉनिक, हेल्थ टॉनिक, बच्चों के विकास तथा कैंसर में बहुत उपयोगी है।

भूमि का चुनाव 

अलसी के लिए काली दोमट चूना युक्त अच्छे जल निकास वाली भूमि उपयुक्त पाई गई है। इसके लिए न क्षारीय भूमि न अम्लीय भूमि हो। 

बीजोपचार   

तीन ग्राम सेरेमान या थायरम से बीजोपचार करेंं। बावस्टीन 1.5 ग्राम 2.5 ग्राम थायरम या टापसिन एम 2.5 ग्राम प्रति किलो के हिसाब से बीजोपचार करना चाहिए।

जैविक खाद

सिंचित अलसी के लिए 2.5 टन नाडेप कम्पोस्ट व 400 ग्राम पीएसबी कल्चर या 1.5 टन वर्मी कम्पोस्ट एवं 400 ग्राम पीएसबी कल्चर डालकर अलसी फसल के किसान बिना रासायनिक खाद डाले भरपूर उत्पादन ले सकते हैं। 

रासायनिक खाद 

अलसी की फसल को  स्थिति अनुसार बारानी में 16 किलो नाइट्रोजन, 8 किलो स्फुर तथा 4 किलो पोटाश प्रति एकड़ देना चाहिए। उतेरा पद्धति में 6.8 किलो नाइट्रोजन, 4 किलो स्फुर तथा 2 किलो पोटाश प्रति एकड़ देना चाहिए। सिंचित अलसी में 24 किलो नाइट्रोजन, 2 किलो स्फुर तथा 6 किलो पोटाश प्रति एकड़ देना चाहिए। सिंचित अवस्था में बुआई के समय नाइट्रोजन की आधी मात्रा दें तथा शेष मात्रा प्रथम सिंचाई पर दें। 

गंधक की कमी हो तो 8 किलोग्राम प्रति एकड़ अथवा सिंगल सुपर फास्फेट खाद से स्फुर की मात्रा की पूर्ति करें।

फसल पद्धतियां एवं प्रजातियां

अलसी की बारानी, उतेरा एवं सिंचित फसल बोई जाती है। जलवायु के अनुरुप अलसी की विभिन्न जातियाँ विकसित की गई है।  

सिंचाई एवं खरपतवार नियंत्रण

सिंचित अलसी में दो सिंचाई पर्याप्त होती है जो बोवाई के 35 एवं 65 दिन बाद देने से अलसी फसल का भरपूर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। बोने के 35 से 40 दिन बाद तक फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना जरूरी है। 

खरपतवार नियंत्रण के लिए चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए 2.4 डी सोडियम साल्ट 200 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ एवं सकरी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए आइसो प्रोटूरान 300 ग्राम प्रति एकड़ 200 से 250 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। 

पौध संरक्षण

अलसी की फसल मे देरी से बुवाई करने पर कलिका मक्खी का प्रकोप बहुत अधिक होता है। जिससे कभी-कभी बहुत ही कम उपज मिलती है। प्रौढ़ मक्खी फूल की कलियों में अंडे देती है। इसकी इल्ली कली के भीतर जननांगों को खा जाती है। जिससे अलसी फसल में प्रजनन नहीं होता है तथा कली बिना बीज बने ही सूख जाती है।

रोग एवं नियंत्रण 

अलसी में गेरूआ रोग से अधिक हानि होती है। गेरूआ रोग में पत्तियों पर चमकीले पीले रंग के चूर्णी धब्बे दिखाई देते है जो शीघ्र ही सभी पत्तियों पर फैल जाते हैं। तने पर कत्थई या काले रंग के चकत्ते दिखाई देते हैं । इनके कारण पौधे सूखने लगते हैं तथा कभी-कभी पूरी फसल नष्ट हो जाती है।  

नियंत्रण 

बुवाई पूर्व बीज थायरम या मोनोमान द्वारा उपचारित करें।

कलिका मक्खी नियंत्रण 

कलिका मक्खी के नियंत्रण के लिए एक ही खेत में बार-बार अलसी की फसल न लें। जुताई कर खेत को खुला धूप में छोड़ दें । बोवाई 10 से 15 दिन पहले करने पर कलिका मक्खी का प्रकोप कम होता है। 

उचित किस्में जैसे जवाहर-23, लक्ष्मी-27, किरण, जवाहर-9, नीला गरिमा, मुक्ता आदि लगाएं। निरोधक जातियां जैसे आर-575, 552, टी-397 एलएस 73.25 बोयें। मेनकोजेव या डाइथेन एम-45 का 800 ग्राम प्रति एकड़ की दर से 15 दिन के अन्तर से 2-3 छिड़काव करें।

अलसी का उकटा रोग 

उकटा निरोधक जातियां जैसे जवाहर-23-10, जवाहर 552, एलएनएस 62 आदि बोएं।

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