अम्बेडकर के विचारों का भारत, एक राष्ट्रवादी देश होता

अम्बेडकर के विचारों का भारत, एक राष्ट्रवादी देश होताgaoconnection

हम में से बहुतों के ध्यान में आता होगा कि जब देश गुलाम था, हिन्दू समाज में अछूतों, हरिजनों और दलितों को स्कूल में अलग बैठना पड़ता था और उनके पास आगे बढ़ने के साधन भी नहीं थे तो बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर ने दुनिया में अपने ज्ञान का डंका कैसे बजा दिया। कुछ लोग जानते होंगे गुजरात की बड़ौदा रियासत के महाराजा गायकवाड़ ने अपनी रियासत में बहुविवाह प्रतिबंधित कर रखा था, शिक्षा निःशुल्क और सर्वशिक्षा थी, कोई अछूत नहीं था और महाराजा ने हरिजनों के रहने और शिक्षा की व्यवस्था कर रखी थी। ऐसे महाराजा गायकवाड़ ने अम्बेडकर को अपने खर्चे से न्यूयॉर्क की कोलम्बिया यूनिवर्सिटी भेजकर उच्च शिक्षा ग्रहण करने का अवसर दिया।

अम्बेडकर भारतीय संविधान निर्माता और कानून के ज्ञाता होने के साथ-साथ एक पक्के राष्ट्रवादी थे और इतिहासकार दुर्गादास ने अपनी पुस्तक ‘‘इंडिया फ्रॉम कर्ज़न टु नेहरू एंड आफ्टर” में पृष्ठ 236 पर लिखा भी है ‘‘ही वाज़ नेशनलिस्ट टु द कोर।” उनका एक बयान कि बकरियों की बलि चढ़ाई जाती है, शेरों की नहीं, बहुत कुछ कहता है। उनकी सबसे बड़ी चिन्ता थी भारत के दलितों और अछूतों की बेड़ियां काटना, समाज में उन्हें सम्मान दिलाना। इस विषय पर उन्होंने किसी से समझौता नहीं किया। हिन्दू कोड बिल के माध्यम से पूरे हिन्दू समाज से गैर बराबरी समाप्त करना उसी प्रयास का अंग था। अम्बेडकर का मानना था कि आर्य बाहर से नहीं आए थे और हरिजन आर्य हैं। 

जब 1932 में अंग्रेजी हुकूमत हिन्दू समाज को बांटना चाहती थी तो हरिजनों के लिए अलग मतदाता सूची और मतदान व्यवस्था करके अम्बेडकर ने मदनमोहन मालवीय और गांधी जी से सहमति जताते हुए समझौता किया था। गांधी जी ने इसके विरोध में यरवदा जेल में भूख हड़ताल आरम्भ कर दी थी और सच कहें तो उन्होंने अपनी जान की बाजी लगा दी थी आमरण अनशन करके। अम्बेडकर को भी समाज का इस प्रकार बंटना बर्दाश्त नहीं था और उन्होंने दलितों के हितों की रक्षा करते हुए हिन्दू एकता को बनाए रखा । गांधी जी के साथ एक समझौता किया जिसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। अम्बेडकर ने हिन्दू कट्टरता से खिन्न होते हुए भी इस्लाम अपनाने के विषय में नहीं सोचा बल्कि बौद्ध बन गए। वह सवर्ण विरोधी भले हों लेकिन हिन्दू विरोधी या इस्लाम के पक्षधर नहीं थे। वह सच्चे अर्थों में सेक्युलरवादी थे।

आजादी के बाद भारत का स्वरूप क्या होगा इस बात को लेकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग ले रहे नेताओं के विचार अलग-अलग थे। मुहम्मद अली जिन्ना ने मन बना लिया था कि मुसलमानों को अपना अलग देश चाहिए, चाहे जो कीमत चुकानी पड़े। महात्मा गांधी का निश्चित मत था कि भारत का बंटवारा किसी हालत में नहीं होना चाहिए चाहे जिन्ना को पूरे भारत का प्रधानमंत्री क्यों न बनाना पड़े। अम्बेडकर का सोचना था कि बंटवारा हो लेकिन दंगे और खूनखराबा हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त होना चाहिए।

जवाहर लाल नेहरू, मुहम्मद अली जिन्ना और वायसराय माउन्टबेटन ने राउन्ड टेबल कान्फ्रेंस में पाकिस्तान निर्माण को स्वीकार कर लिया। बंटवारे के बाद जिन्ना को पता था कि पाकिस्तान इस्लामिक देश होगा लेकिन नेहरू तो पाकिस्तान देकर भी भारत में ऐसी व्यवस्था चाहते थे जैसे बंटवारा हुआ ही नहीं। तब नेहरू ने बंटवारा क्यों स्वीकार किया? कहते हैं गांधी जी बहुत नाराज हुए थे तो नेहरू ने तब कहा था, ‘बापू आपने मुझे भेजा ही क्यों था राउन्ड टेबल में।’ एक आदमी जो भारत का बंटवारा रोकने में गांधी जी की मदद कर सकता था, वह थे नेता जी सुभाषचन्द्र बोस लेकिन उन्हें तो कांग्रेस ने कब का अलग-थलग कर दिया था और वह देश छोड़ गए थे।

शांत होकर सोचा जाए कि पाकिस्तान बना ही क्यों था तो एक ही उत्तर होगा कि हिन्दू और मुसलमान एक देश में एक साथ नहीं रह सकते थे, ऐसा जिन्ना ने कहा था। हिन्दू और मुसलमानों के बीच खूनी दंगे होते रहते थे और अम्बेडकर इन दंगों का हमेशा-हमेशा के लिए हल चाहते थे। वह कुशाग्र बुद्धि और व्यावहारिक सोच के व्यक्ति थे। अम्बेडकर ने दुनिया का इतिहास देखा और पढ़ा था। दुनिया के अन्य देशों से सीख लेकर ग्रीस, टर्की और बुल्गारिया का उदाहरण देते हुए उन्होंने आबादी की अदला बदली के पक्ष में विचार रखे थे। उन्होंने यह बात अपनी पुस्तक ‘‘पाकिस्तान ऑर दि पार्टिशन आफ इंडिया” में लिखी है।

यदि अम्बेडकर की बात मान ली जाती तो क्या भारत में केवल गैर मुस्लिम और पाकिस्तान मे केवल मुस्लिम होते। तो क्या भारत एक हिन्दू राष्ट्र होता? नहीं यह अम्बेडकर का हिन्दू देश होता, संघ का हिन्दू राष्ट्र नहीं। हिन्दू समाज ऐसा नहीं होता जिसमें गाँव के तालाब से भी पानी लेने में दलितों को कठिनाई होती जैसी स्वयं उन्हें हुई थी। समाज का छुआछूत, ऊंच-नीच और पोंगापंथी विचार नहीं होते। उन्हें हिन्दू धर्म से कठिनाई नहीं थी, उसकी विकृतियों से कठिनाई थी। अम्बेडकर को हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख धर्मों में अनेक समानताएं लगती थीं और उन्होंने स्वयं बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। बौद्ध धर्म की बहुत प्रशंसा तो स्वामी विवेकानन्द ने भी की थी।

बंटवारे के बाद पूर्वीं बंगाल को पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिम में पश्चिमी पंजाब को पश्चिमी पाकिस्तान कहा गया। दोनों जगह दंगे और खूनखराबा होता रहा। नेहरू ने पश्चिमी पाकिस्तान जाकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के साथ एक पैक्ट किया जिसे नेहरू-लियाकत पैक्ट के नाम से जाना जाता है लेकिन पूर्वी पाकिस्तान के हिन्दुओं की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं सोची। श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने नेहरू के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। अम्बेडकर ने 1951 तक मंत्रिमंडल में रहकर काम किया। उन्हें बंटवारे के बाद भी खूनखराबा देखकर तकलीफ तो होती होगी लेकिन उनके प्रस्ताव को किसी ने माना नहीं था अन्यथा शायद इतनी लाशें न बिछतीं और इतना खून न बहता।

नेहरू और जिन्ना ने मिलकर बंटवारे का जो भी फॉर्मूला लगाया होगा उसके अनुसार भारत का एक चौथाई भाग पाकिस्तान को गया शायद इसलिए कि मुसलमानों की आबादी देश की एक चौथाई थी। अब तक जिन्ना की समझ में आ गया होगा कि पाकिस्तान बनने से मुसलमानों की समस्याएं हल नहीं होंगी। बंटवारे के बाद भी दंगे समाप्त नहीं हुए और आज भी होते रहते हैं। जिन्ना को चिन्ता हुई कि भारत में बचे मुसलमानों की सुरक्षा कैसे हो, शायद उसकी चिन्ता नेहरू को कहीं अधिक थी। अम्बेडकर ने अपने त्यागपत्र के भाषण में यह बात खुलकर कही थी। पाकिस्तान में छूट गए हिन्दुओं और विशेषकर दलितों का जिक्र करते हुए कभी नेहरू को न सुना न पढ़ा।

अम्बेडकर ने बड़े स्पष्ट शब्दों में दलित समाज से कहा था कि जिन्ना को इसलिए अपना मत समझो कि वह हिन्दू विरोधी हैं। जब जरूरत होती है तब दलितों को हिन्दुओं से अलग मान लेते हैं और जब जरूरत नहीं तो उन्हें हिन्दुओं के साथ मान लेते हैं। मत समझो कि वे तुम्हारे मित्र हैं। उन पर विश्वास मत करो। अम्बेडकर ने पाकिस्तान में छूट गए दलितों से कहा था, जैसे भी हो सके भारत आ जाओ। दलितों के संरक्षक और कानूनमंत्री होने के नाते भी उन पर यह जिम्मेदारी थी।

अम्बेडकर और नेहरू में गहरे मतभेद हो गए थे और उन्होंने 1951 में कैबिनेट से त्यागपत्र दे दिया था। त्यागपत्र देने के बाद उन्होंने जो भाषण दिया था उसमें जो कारण बताए उनमें प्रमुख थे मुसलमानों की सुरक्षा की बहुत चिन्ता और दलितों की सुरक्षा के विषय में चिन्ता न होना, नेहरू सरकार में दलितों को नौकरियों में भेदभाव, विदेश नीति जिसने भारत को अलग-थलग कर दिया, बंगाल के हिन्दुओं की दुर्दशा और सबसे महत्वपूर्ण था हिन्दू कोड बिल को 1951 में पास न कराना। महिलाओं को पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा देने को लेकर मतभेद था। नेहरू का सोचना था समाज इसके लिए तैयार नहीं है। यह प्रावधान अब इक्कीसवीं सदी में जाकर पूरा हुआ है।

अम्बेडकर वास्तव में महात्मा गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना दोनों के विचारों से असहमत थे। वह समान नागरिक संहिता के पक्षधर थे और कश्मीर के मामले में धारा 370 का विरोध करते थे। अम्बेडकर का भारत आधुनिक, वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत विचारों का देश होता। नेहरू से मतभेद के कारण उन्होंने कैबिनेट से त्यागपत्र देकर 1952 का चुनाव लड़ा था लेकिन अहसान फरामोश लोगों ने अम्बेडकर का साथ नहीं दिया और वे हार गए। उनका जीवन इस बात का सबूत है कि आरक्षण की बैसाखी के बिना भी आगे बढ़ा जा सकता है, बस संघर्ष करने की क्षमता चाहिए।

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