अंधविश्वास को दूर कर बचाई हज़ारों ज़िंदगियां

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नई दिल्ली। हाल ही में आई एक खबर के अनुसार देश के अस्पतालों और घरों में रोजाना मरने वाले नवजातों और गर्भवती महिलाओं की जानकारी केंद्र सरकार के पास नहीं है। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय स्वास्थ सचिव ने आरजीआई को जल्द से जल्द आंकड़े उपलब्ध कराने को कहा है ताकि वर्तमान समय की परिस्थिति को जाना जा सके। 

ये सच है कि चिकित्सा क्षेत्र में कई आविष्कार होने के बाद भी हमारे देश मे रोज न जाने कितनी महिलाओं की प्रसव के दौरान और नवजात शिशुओं की सही देखभाल न होने के कारण मृत्यु हो जाती है लेकिन उत्तर प्रदेश के अमेठी जिला मे दो गाँव- पारसवान जिसकी कुल आबादी 1462 और नारायणी गाँव जहां की कुल आबादी 5024 है। ऐसे गाँव हैं, जहां पिछले तीन वर्षों में न तो किसी महिला ने प्रसव के समय अपनी जान गंवाई न ही किसी नवजात शिशु की जान लापरवाही के कारण गई।

दूसरे शब्दों मे कहें तो दोनों गाँव को मातृ मृत्यु मुक्त गाँव बनने के पीछे कारण है गाँव में चलने वाली आरती स्वयं सहायता समूह की मंजू और मीरा की कड़ी मेहनत, जो शुरू से अपने समूह के लिए तो सक्रिय थीं। साल 2005- 2006 के बीच दोनों ने जब समूह की महिलाओं को बचत परियोजनाओं के बारे जानकारी देने का निर्णय लिया ताकि समूह के सभी सदस्य की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके। लेकिन कुछ दिनों बाद समूह को ऐसा महसूस हुआ कि बचत के अधिकतर पैसे या तो समूह के सदस्य पर या समूह के परिवार वालों पर उनके खराब स्वास्थ्य के कारण खर्च हो रहा है।

कारणवश समूह ने स्वास्थ्य के क्षेत्र मे काम करने का निश्चय किया । परिणामस्वरुप पब्लिक हेल्थ फांउडेशन ऑफ इंडिया, पोपुलेशन काउन्सिल और सेंटर फॉर ग्लोबल हेल्थ एण्ड डेवलपमेंट,इन सब परियोजनाओं ने मिलकर वर्ष 2010 मे सामुदायिक गतिशीलता परियोजना उत्तर प्रदेश सामुदायिक गतिशीलता परियोजना (UMPMP)  के अंतर्गत आरती समूह को स्वास्थ्य संबधित मुद्दों पर कार्य करने के लिए सहयोग दिया। अतः स्वास्थ्य के अन्य मुद्दों पर अच्छा काम करने के बाद जब मंजू और मीरा को आशा कार्यकर्ता का पद दिया गया तो दोनों ने गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों के स्वास्थ्य पर काम करने का निश्चय लिया। लेकिन गाँव के बड़े बुजुर्गो द्वारा गर्भवती महिलाओं के प्रति भेदभाव के रवैये और सोच को बदलना बहुत मुश्किल था।

                                              

दरअसल मान्यता ये थी कि बच्चे के जन्म के साथ ही बुरी आत्माओं का भी प्रवेश घर में हो सकता है इसलिए प्रसव के बाद मां और बच्चे को एक अलग कमरे में रखा जाता था और शुद्धिकरण के लिए गाय के सूखे गोबर को कुछ दिनों तक कमरे में जलाया जाता था ताकि उसके धुएं से मां-बच्चे की शुद्धिकरण के साथ साथ बुरी आत्मा से भी घर को मुक्त किया जा सके। मान्यता ये थी कि प्रसव के बाद महिला का शरीर अपवित्र हो जाता है इसलिए शुरू के तीन दिनों तक मां को बच्चे को दूध पिलाने से भी मना कर दिया जाता था। ये एक ऐसी धारणा थी जिसे समाप्त करना मंजू और मीरा के लिए आसान नहीं था लेकिन उन्होंने अपनी कोशिश को जारी रखा और महिलाओं और नवजात शिशु को सुरक्षा देने के लिए सबसे पहले महिलाओं को ही गर्भवस्था से लेकर प्रसव तक की अवधि मे बरती जाने वाली सावधानियों के प्रति जागरूक करना शुरु किया।

 इस जागरुकता अभियान को प्रभावशाली बनाने के लिए मीरा और मंजू ने सहारा लिया रंग बिरंगे चित्रों वाली छोटी छोटी किताबों के साथ साथ कुछ वीडियो का जिसे देखने पर ये आसानी से स्पष्ट हो जाता था कि नवजात शिशु के लिए मां के पहले दूध का क्या महत्व होता है। मंजू और मीरा ने इस जागरुकता अभियान मे सबसे महत्वपूर्ण पक्ष रखा कंगारु मदर केयर (KMC) की प्रक्रिया को जिसके अनुसार बच्चे के जन्म के साथ ही मां, बच्चे को कुछ देर तक अपने छाती से लगाकर बच्चे को अपने शरीर की गर्मी देती है। चिकित्सा क्षेत्र में इस प्रक्रिया को महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इस प्रक्रिया के बाद बच्चे की शारीरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है और भविष्य में होने वाली कई बीमारियों से वह सुरक्षित हो जाता है। 

मंजू और मीरा ने  गाँव की महिलाओं को इन बातों के लिए जागरुक किया और परिणामस्वरुप धीरे धीरे गर्भवती महिला के प्रति लोगों का रवैया और सोच दोनो बदलने लगी। अब उस गाँव में महिला और उसके बच्चे के साथ जन्म के बाद अपवित्रता के नाम पर कोई बुरा बर्ताव नहीं होता।  

ऊषा राय

साभार- ( चरखा फीचर्स) 

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