अंग्रेजी हटाओ नहीं अंग्रेजी सिखाओ की जरूरत

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कहते हैं यदि विरोधी से जीत नहीं सकते तो उसकी पार्टी में शामिल हो जाओ। यही हालत गाँवों में अंग्रेजी भाषा की है जिसके वर्चस्व को नेता लोग घटने नहीं देंगे तो अपने को बदलो और अंग्रेजी सीखो। नेता लोग यह भी आसानी से होने नहीं देंगे क्योंकि उनका खेल बिगड़ जाएगा।

मैकाले जितना अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व नहीं स्थापित कर सका उससे कहीं अधिक पिछले 70 साल में विदेशों में पढ़े नेताओं ने कर दिखाया और गरीबों से ‘अंग्रेजी हटाओ’ का नारा लगवाते रहे।  

गाँव वालों को सरकारी स्कूलों का ही सहारा है जहां अंग्रेजी की कौन कहे, ठीक हिन्दी भी नहीं सिखाते। उत्तर प्रदेश सरकार ने गाँवों में अंग्रेजी स्कूल खोलने की बात की थी लेकिन आगे बढ़ी नहीं। यदि गंभीर इरादा हो तो गर्मी की छुट्यिों में मौजूदा अध्यापकों में से ही अंग्रेजी अध्यापक तैयार किए जा सकते हैं। साइंस, गणित और कम्प्यूटर के अध्यापकों की बेहद कमी है गाँवों के स्कूलों में, उसका निदान क्या है यह सोचने की फुरसत नहीं शिक्षा विभाग को।

कुछ समय पहले उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि सरकारी अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ें जिससे इन स्कूलों का स्तर सुधरेगा। किसी ने नहीं माना तब उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका डाली गई है। मैं नहीं समझता इसका भी कोई असर होगा। इससे बेहतर होगा कि गाँवों के स्कूलों में विधिवत अंग्रेजी पढ़ाई जाए और इस योग्य बनाया जाए कि अधिकारियों को अपने बच्चे यहां भेजने में शर्मिन्दगी न महसूस हो। अंग्रेजी छोड़ने या इसमें कमजोर होने का मतलब है बच्चों के भविष्य से खिलवाड़।

 सिविल सेवाओं की परीक्षा में अंग्रेजी का दबदबा है, जिससे उत्तर भारत के नौजवान निराश और आन्दोलित होते हैं। अंग्रेजी पर शहरों के मुट्ठीभर सम्भ्रान्त लोगों का कब्जा है और देश की 70 प्रतिशत आबादी वाले गाँवों के पढ़े-लिखे लोग भी इसमें कमजोर हैं। प्रशासनिक सेवाओं और तकनीकी विषयों की परीक्षाएं अंग्रेजी में होने के कारण गाँव-देहात और कस्बों के छात्र अपने हक के लिए इन्तजार करते रहे हैं। यह नेताओं की तरकीब थी कि हल चलाने वालों के बच्चे जीवनभर हल ही चलाते रहें। यदि गाँव के लोग व्यवस्था नहीं बदल सकते तो अपने को बदलें। 

भारत की औपचारिक भाषाओं में अंग्रेजी का नाम सम्मिलित नहीं है फिर भी उसका वर्चस्व है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने दक्षिण भारत के लोगों से वादा किया था कि जब तब वे चाहेंगे देश में अंग्रेजी भाषा बनी रहेगी हम उसी वायदे से बंधे है। आजादी के बाद, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, राममनोहर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय जैसे नेताओं ने अंग्रेजी के वर्चस्व का विरोध किया था। साठ के दशक में ही सरकारी कामकाज के लिए दो औपचारिक भाषाएं निश्चित की गई, हिन्दी और अंग्रेजी। हिन्दी नाम की और अंग्रेजी काम की भाषा रहीं।

निहित स्वार्थ के कारण हमारे नेताओं और नौकरशाहों ने क्षेत्रीय भाषाओं को पास नहीं फटकने दिया वर्ना देश के दलित, फटीचर, किसान सब प्रशासनिक कुर्सी के दावेदार बन जाते। 

गाँव वालों के सामने अंग्रेजी का बैरियर खड़ा कर दिया। अपने बच्चों को अंग्रेजी में पारंगत कराते रहे। देश के नेताओं ने अपने बच्चों को विदेशों में अंग्रेजी पढ़ाकर देश में अंग्रेजी का दबदबा जारी रखा। उदाहरण बहुत हैं पर देश के प्रथम परिवार को ही लीजिए पंडित नेहरू विलायत में पढ़े थे, उनकी पुत्री इन्दिराजी विलायत में पढ़ी थीं और इन्दिराजी के पुत्र और बहुएं भी विलायत में पढ़ें। उनसे हिन्दी के पक्ष में कोई उम्मीद करना नादानी होगी। सब जानते हैं कि मौलिक शोध मातृभाषा में ही होता है। जापान, चीन, फ्रांस, इजराइल और जर्मनी जैसे देश अपनी भाषाओं में रिसर्च करके, दर्जनों नोबल पुरस्कार विजेता पैदा कर सकते हैं तो भारत क्यों नहीं। 

लेकिन राजनेताओं का खेल चलता रहेगा इसलिए अब गाँव के लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने के लिए पैसा खर्च करने को तैयार हैं, उन्हें प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं और सरकारी स्कूलों को त्याग रहे हैं। शायद यही ठीक है, अन्यथा गाँव के लोग जीवनभर वंचित ही रहेंगे। इस प्रक्रिया में देर लगेगी परन्तु गाँव वालों को अपना हक उसी भाषा में मांगना होगा जो भाषा हक देने वाले समझते हैं।  

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