वीडियो में देखें कैसे गाय-भैंस की डकार से हो रहा पर्यावरण को नुकसान

Diti BajpaiDiti Bajpai   21 July 2018 7:50 AM GMT

लखनऊ। इंसानों में आने वाली डकार पाचन क्रिया सही होने का संदेश देती है, लेकिन जुगाली करने वाले जानवरों (गाय, भैंस, भेड़, बकरी) की डकार से जो मिथेन गैस निकलती है, वो वायुमंडल को नुकसान पंहुचा रही है। जुगाली करने वाले इन जानवरों की डकार को कम करने के लिए कई देशों के वैज्ञानिक काम भी कर रहे हैं।

दुनिया भर में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का करीब एक तिहाई हिस्सा जुगाली करने वाले जानवरों से आता है। नासा ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा भी किया है कि गाय साल भर में केवल डकार के कारण 80 से 120 किलो मिथेन गैस निकालती है, जो कोई एक कार साल भर में इतना ही प्रदूषण उत्सर्जित करती है। ऐसे में देश के कई संस्थानों में गाय-भैंस में आने वाली डकार को कम करने के लिए शोध हो रहा है।

बरेली स्थित भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एलसी चौधरी 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, ''जुगाली करने वाले जानवर गाय-भैंस से सबसे ज्यादा मिथेन गैस का उत्सर्जन होता है। भेड़ और बकरी भी जुगाली करते हैं, लेकिन बड़े पशुओं की अपेक्षा ये कम गैस उत्सर्जित करते हैं। मिथेन गैस बनाना पशु के पेट में आवश्यक भी है क्योंकि पशु का पाचन पूरा नहीं हो पाएगा।''

मिथेन एक ग्रीनहाउस गैस है। इस गैस को धरती के लिए मुसीबत माना जा रहा है। ग्रीनहाउस गैस उन्हें कहा जाता है, जो सूरज की गरमी सोखते हैं और धरती को गर्म करते हैं। नेशनल एयरोनोटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) ने अपनी रिपोर्ट में बताया हैं कि गायों के डकार में बड़ी मात्रा में हानिकारक मिथेन गैस निकलती है, जो धरती को नुकसान पंहुचा रही है।

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किसानों को भी जागरूक होना पड़ेगा

''लगभग दो दशकों से हमारे यहां रिसर्च चल रही है। एंटीमिथेन और मीथेनसपरेशन जैसे प्रोडेक्ट भी तैयार किए हैं, लेकिन इसके लिए किसानों को भी जागरूक होना पड़ेगा। मेले और गोष्ठियों में हम किसानों को ऐसे पौधों की पत्तियों (पकाड़, गूलर) को खिलाने के लिए बताते हैं, जिनके खाने से गाय-भैंस कम मिथेन गैस को उत्सर्जित करती हैं। अगर आहार के साथ भी उन पत्तियों को दिया जाए तो भी असर होता है।'' डॉ चौधरी ने बताया, '' एक गाय भैंस का वजन 400 किग्रा तक होता है। अगर वो 10 किलो खाती है, तो 350-400 लीटर मिथेन गैस बनाती है, जो बहुत नुकसानदायक है।''

16 फीसदी हिस्सा केवल मिथेन गैस का

संयुक्त राष्ट्र के क्लाइमेट चेंज के इंटरगवर्नमेंटल पैनल के अनुमान के मुताबिक, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में लगभग 16 फीसदी हिस्सा केवल मिथेन गैस का होता है। न्यूजीलैंड में करोड़ों डॉलर केवल इस शोध पर खर्च कर रहे हैं कि किस तरह से एक वैक्सीन से पशुओं में डकार आना कम किया जा सके। वहीं जर्मनी के वैज्ञानिक अनुवांशिक रूप से संशोधित एक ऐसी गाय का प्रजनन कर रहे हैं जो कि कम मिथेन उत्सर्जित करे।

पशुपालकों को भी होता है नुकसान

मिथेन गैस को कम करने के उपाय के बारे में डॉ. चौधरी आगे बताते हैं, ''किसानों को मिथेन गैस को कम करने में कोई रुचि नहीं है। इस पर सरकार को नीति बनानी चाहिए। संस्थानों द्वारा बनाए गए प्रोडेक्ट को सस्ती दरों या सब्सिडी देकर किसानों तक पंहुचाना चाहिए। अगर मिथेन गैस कम बनेगी तो ऊर्जा जानवरों के उत्पादन में लगेगी, उसका वजन बढ़ेगा, दूध उत्पादन बढ़ेगा। इससे पशुपालकों को भी नुकसान होता है।''

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दूसरी ओर, जर्नल ऑफ एनिमल साइंस के मुताबिक, गायें प्रतिदिन 250 से 500 लीटर मिथेन गैस वायुमंडल में उत्सर्जित करती हैं, जो बहुत ज्यादा है। मिथेन गैस को लेकर महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने भी अपने एक प्रकाशित लेख में लिखा है कि भारत क्लाइमेट को बिगाड़ने वाला 'मेन प्लेयर' है।

बढ़ती संख्या हमारी धरती को नुकसान पहुंचा रही

भारत, चीन और ब्राज़ील तीनों देश मीट और डेरी के सबसे बड़े उत्पादक है। ब्राज़ील और भारत तो पूरे विश्व के तीन सबसे बड़े बीफ उत्पादक देशों में शामिल हैं। भारत तो पूरे विश्व में दूध का सबसे उत्पादक भी है। भारत में इतना दूध का उत्पादन होता है, जितना पूरे यूरोपियन यूनियन के देशों को मिलाकर भी नहीं होता। हम तीनों देश वायुमंडल में उत्सर्जित किये जाने वाले कुल मिथेन का 70 फीसदी उत्पादन करते हैं। जानवरों की बढ़ती संख्या हमारी धरती को नुकसान पहुंचा रही है।

उन्होंने आगे लिखा हैं, जानवरों की बढ़ती संख्या मिथेन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है ही, उसके साथ साथ एक और वजह है मिथेन उत्पादन की है, और वो है जानवरों का एंटीबायोटिक्स निकालना। विश्व का 80 प्रतिशत एंटीबायोटिक्स पशुधनों को खिलाया जाता है।

एंटीबायोटिक्स ट्रीटमेंट भी बढ़ा रही मुश्किलें

कोलोराडो विश्वविद्यालय में एक रिसर्च में पता चला है, जानवरों को एंटीबायोटिक्स ट्रीटमेंट दिए जाने के बाद उनमें मिथेन उत्सर्जन की क्षमता दोगुनी बढ़ गई है। जैसे मान लीजिए की एक गाय का मिथेन उत्सर्जन 500 लीटर है तो उसको एंटीबायोटिक्स खिलाने के बाद उसका मिथेन उत्सर्जन बढ़ कर 1000 लीटर प्रति दिन हो जाएगा।

समस्या को बताते हुए मेनका ने ये भी बताया है कि आज मीट और डेरी उद्योग वाले व्यवसायी केवल अपना मुनाफा बढ़ाना चाहते हैं। ये जानवरों के अच्छे रख-रखाव पर खर्च कम और घटिया एंटीबायोटिक्स पर ज्यादा खर्च करना चाहते हैं, जिससे उन्हें मारने से पहले ज्यादा कमाने के लिए जिंदा रखा जाये। ये लोग उन गायों में पैसा लगाने में ज्यादा भरोसा रखते हैं, जो अनुवांशिक रूप से संशोधित होते हैं और बड़े और मोटे ताजे होते हैं।

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क्या हो सकते हैं उपाय

मिथेन गैस को कम करने के बारे में मेनका ने अपने लेख में लिखा हैं कि जानवरों के पालन पोषण में एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल पर रोक मिथेन के उत्पादन में कमी लाएगा। लेकिन ये तभी संभव है जब पशुओं को अच्छे से रखा जाएगा, उन्हें अच्छा खाना दिया जाएगा, उन्हें स्वस्थ्य रखा जाएगा और खुले में विचरण करने दिया जाएगा। सबसे अच्छा तरीका है मिथेन कम करने का है कि मीट खाना बंद कर दिया जाए। ऐसे में अगर मांग में कमी आएगी तो आपूर्ति में भी कमी आएगी।

वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले मिथेन कम देर तक ठहरता है। ऐसे में अगर हम इसका उत्सर्जन बंद कर दें तो ये 4-9 सालों में हमारे वायुमंडल से गायब हो जाएगा और ग्लोबल वार्मिंग रुक जाएगी। लेकिन ये सब निर्भर करता है कि आप खाते क्या हैं और अपने जीवन की कितनी चिंता करते हैं।

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