जिस भैंस के दूध में होता है सबसे ज्यादा फैट, उसी से मुंह मोड़ रहे पशुपालक

लखनऊ। अत्यधिक घी उत्पादन के लिए जानी जाने वाली भदावरी भैंस से पशुपालक धीरे-धीरे मुंह मोड़ रहे है, जिससे इनकी संख्या लगातार घट रही है। सरकार भी इनके संरक्षण और संर्वधन पर काम कर रही है ताकि यह नस्ल विलुप्त न हो।

हमारे देश में भैंसों की 13 प्रमुख नस्लें हैं, भदावरी इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण नस्ल है जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के भदावर क्षेत्र में यमुना और चम्बल नदी के आस-पास के क्षेत्रों में पायी जाती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो द्वारा इस नस्ल का पंजीकरण किया गया है। भदावरी भैंस के दूध में वसा का प्रतिशत देश में पायी जाने वाली भैंस की किसी भी नस्ल से अधिक होता है।

"भदावरी की तुलना में मुर्रा भैंस पशुपालक ज्यादा पालते हैं क्योंकि वह ज्यादा दूध देती है। लेकिन भदावरी खासियत यह है कि इसमें बहुत ज्यादा होता है। इसके संरक्षण के लिए भी कार्य किया जा रहा है। इनके सीमन का कैलेक्शन करके चंबल और इटावा के जिलों में भेजते है।" मध्य प्रदेश राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम में कार्यरत डॉ एच.बी भदौरिया ने बताया।

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इस नस्ल की भैंस के दूध में औसतन 8.5 प्रतिशत वसा पायी जाती है जबकि अन्य भैंस के दूध में वसा का स्तर अमूमन छह से सात फीसदी और गायों में साढ़े चार फीसदी पाया जाता है। वहीं मौसम के उतार-चढ़ावों को सामान्य रूप से झेल लेने वाली भैंस की खुराक भी कम है।

उत्तर प्रदेश पशुधन विकास परिषद् के पशु प्रजनन प्रकोष्ठ अधिकारी डॉ के.के. चौहान बताते हैं, ''पशुपालकों का मुर्रा नस्ल की तरफ झुकाव इनकी संख्या घटने का प्रमुख कारण है। अगर कोई पशुपालक घी बनाने का कारोबार शुरू करना चाहते है उनके लिए यह भैंस उपयुक्त है। प्रदेश में कई प्रक्षेत्र है जहां इनका संरक्षण किया जा रहा है।''

इस नस्ल के पशुओं में ग्रामीण क्षेत्रों में भदावरी, भूरी, जनेऊ वाली और सुअरगोड़ी आदि नामों से जाना जाता है। इनका शारीरिक आकार मध्यम, रंग तांबिया और शरीर पर बाल कम होते है। टागें छोटी और मजबूत होती है। घुटने से नीचे का हिस्सा हल्के-पीले सफेद रंग का होता है। गर्दन के निचले भाग पर दो सफेद धारियां होती हैं जिन्हे कंठ माला या जनेऊ कहते हैं। सींग तलवार के आकार के होते हैं। इस नस्ल के वयस्क पशुओं का औसत शरीर भार 300-400 किग्रा होता है। छोटे आकार और कम वजन के कारण इसे कम संसाधनों में छोटे किसानों/पशुपालकों, भूमिहीन कृषकों द्वारा आसानी से पाला जा सकता है।

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दुग्ध उत्पादन

भदावरी भैंस औसतन 5 से 7 किलो दूध प्रतिदिन देती है, लेकिन अच्छे प्रबंधन द्वारा 8 से 10 किलो दूध प्रतिदिन प्राप्त किया जा सकता है। भदावरी भैंसों से एक ब्यांत (208 से 300 दिन) में लगभग 1400 से 2000 किग्रा दूध प्राप्त होता है।


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